0 अशोक त्रिपाठी,बस्तर में वर्ष 1998 से लेकर वर्ष 2003 तक मुझे कई बार बस्तर जाने का अवसर मिला था. रायपुर जगदलपुर मुख्य म...
0 अशोक त्रिपाठी,बस्तर में
वर्ष 1998 से लेकर वर्ष 2003 तक मुझे कई बार बस्तर जाने का अवसर मिला था. रायपुर जगदलपुर मुख्य मार्ग की सड़क उस समय भी काली- चमचमाती दिखती थी और जिस पर लॉन्ग रूट की बसें तथा दूसरे वाहन फर्राटा मारते भागते दिखते थे. कभी उस रास्ते पर सुबह 7 से 10 बजे और शाम को 4 से 7 बजे के अंतराल में जाना होता था तो रास्ते पर जगह-जगह स्थानीय ग्रामीण,परंपरागत वेशभूषा में एक बड़े झुंड में जिसमें महिलाये भी बड़ी संख्या में होती थी और उनमें से कई अपने बच्चों को गोद में लिए होती थी और इनकी संख्या 15 से लेकर 25 तक होती थी,पैदल एक बड़ा रास्ता तय करते दिख जाती थी.यह रास्ता बड़ा लंबा कठिन होता था.कई कई किलोमीटर दूर का.अब भले ही सच जैसा ना लगे लेकिन,यह सच है कि इसमें चलने वाले कई लोगों के पैरों में जुते-चप्पल तक नहीं होते थे.लेकिन झुंड में शामिल सभी ग्रामीणों के चेहरे पर एक आत्मविश्वास होता था,निडरता होती थी,लक्ष्य को तय करने की दृढइच्छा शक्ति दिखती थी.और वे सब,एक.नई उम्मीद के साथ अपने लक्ष्य,अपनी मंजिल की ओर बढ़े चलते जाते थे. ऐसे झुंडों में से कई झुंड के लोग लोग सुबह वनों में काम करने जाते थे और वहां से शाम को वापस लौटते थे.तब बस्तर की रातें काफी गहरी और काली होती थी.मुख्य मार्गो पर भी इतना अंधेरा होता था कि दूर-दूर तक कभी कहीं कोई नजर नहीं आता था.उस समय जो भी लोग यहां रहे हैं या आते-जाते रहे होंगे उन्होंने यहां के रहवासियों की कठिन दिनचर्या को जरूर देखा होगा और उसके साथ यहां के परिश्रमी जनजीवन को महसूस किया होगा. कहते हैं कि आगे बढ़ने का लक्ष्य हो और साथ ही कड़ा परिश्रम करते रहें, तो ऊंचाइयों को छूने में देर नहीं लगती. अब सघन वनों से आच्छादित बस्तर में काम की तलाश में पैदल भटकते ग्रामीणों के झुंड शायद ही कहीं नजर आएंगे. पिछले वर्षों में बस्तर ने विकास की नई ऊंचाइयों को स्पर्श किया है.वास्तव में अब "बस्तर" अब नमक तेल लेकर काजू- किशमिश दे देने वाला बस्तर नहीं रह गया है.जल,जंगल और जमीन को सुरक्षित रखने की अपनी प्रतिबद्धता के साथ बस्तर विकास की ओर धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया है. बस्तर को प्रकृति ने ईश्वर ने इतना सब कुछ दिया है कि वह प्रत्येक मामलो खनिज,वन संपदा, सस्ता श्रम उपजाऊ जमीन में दूसरों क्षेत्र से बहुत-बहुत आगे है.
बस्तर को छत्तीसगढ़ प्रदेश ही नहीं,भारत देश का आन बान और शान कहा जा सकता है. यहां पूजा- पाठ,जीवन पद्धति, सामान्य दिनचर्या, सामाजिक रीति रिवाज,आम रहन-सहन प्रत्येक मामलों में संपूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति नजर आती है.
बस्तर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक विरासत और आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में चित्रकोट जलप्रपात, कुटुम्सर गुफा, तीरथगढ़, और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान शामिल हैं। इसके अलावा, दंतेवाड़ा और बारसूर इस क्षेत्र के प्रमुख ऐतिहासिक व पौराणिक तीर्थ स्थल हैं।बस्तर क्षेत्र (जगदलपुर और इसके आसपास) में घूमने के लिए प्रमुख स्थानों को श्रेणियों में नीचे विभाजित किया गया है:प्रमुख तीर्थ एवं ऐतिहासिक स्थलमाँ दंतेश्वरी मंदिर (दंतेवाड़ा): जगदलपुर से लगभग ८४ किमी दूर स्थित यह मंदिर पूरे बस्तर क्षेत्र की आस्था का मुख्य केंद्र है। यह देश के प्राचीन शक्तिपीठों में से एक है।बारसूर (Barsoor): ऐतिहासिक स्मारकों के लिए प्रसिद्ध, यहाँ ग्यारहवीं सदी के प्रसिद्ध बत्तीसा मंदिर, मामा-भांजा मंदिर और चंद्रादित्य मंदिर मौजूद हैं। यहाँ की ऐतिहासिक मूर्तिकला दर्शनीय है।ढोलकल गणेश (Dholkal): बैलाडिला की पहाड़ियों के बीच समुद्र तल से लगभग ३००० फीट की ऊँचाई पर स्थित यह एक प्राचीन और रहस्यमयी गणेश प्रतिमा है। प्रमुख जलप्रपात और प्राकृतिक स्थलचित्रकोट जलप्रपात (Chitrakote): जगदलपुर से लगभग ३५ किमी दूर स्थित यह इंद्रावती नदी पर बना भारत का सबसे चौड़ा जलप्रपात है। इसे "भारत का नियाग्रा" भी कहा जाता है।तीरथगढ़ जलप्रपात (Tirathgarh)कांगेर घाटी में स्थित यह झरना लगभग ३०० फीट की ऊँचाई से सीढ़ीनुमा चट्टानों से गिरता है।अन्य प्रमुख झरने: तामड़ा घूमर, चित्रधारा और कांगेर धारा यहाँ के अन्य खूबसूरत झरने हैं. गुफाएं और वन्यजीवकुटुम्सर और कैलाश गुफा (Kotumsar & Kailash Caves) कांगेर वैली के घने जंगलों में स्थित ये गुफाएं चूना पत्थर के अद्भुत प्राकृतिक संरचनाओं के लिए जानी जाती हैं।धुड़मारास यह गाँव हाल ही में अपनी जैव-विविधता और बंबू राफ्टिंग के लिए वैश्विक मानचित्र पर उभरा है।कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान (Kanger Valley National Park): जैव विविधता से भरपूर इस पार्क में दुर्लभ जीव-जंतु, प्राकृतिक गुफाएं और जलप्रपात शामिल हैं। स्थानीय आकर्षणबस्तर पैलेस जगदलपुर शहर के केंद्र में स्थित यह शाही महल बस्तर के राजाओं का निवास स्थान था।दलपत सागर जगदलपुर में स्थित यह छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक है, जहाँ नौका विहार का आनंद लिया जा सकता है।
कभी माओवाद के आतंक और भय के कारण वीरान पड़े बीजापुर जिले के सुदूर वनांचल अब विकास, विश्वास और नई उम्मीदों की मिसाल बनते जा रहे हैं। नक्सलवाद से मुक्ति के बाद जिले के अंदरूनी क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन तेजी से पटरी पर लौट रहा है। इसका सबसे जीवंत उदाहरण उसूर ब्लॉक के आवापल्ली क्षेत्र अंतर्गत पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के साप्ताहिक बाजार हैं, जहां लगभग चार दशकों बाद फिर से रौनक लौट आई है।
एक समय ऐसा था जब इन क्षेत्रों में भय और असुरक्षा के कारण ग्रामीणों की आवाजाही लगभग बंद हो चुकी थी। माओवाद के प्रभाव के चलते यहां के पारंपरिक साप्ताहिक बाजार पूरी तरह ठप पड़ गए थे। लेकिन अब नक्सल मुक्त वातावरण बनने के बाद बाजारों में फिर से चहल-पहल दिखाई देने लगी है। ग्रामीण, व्यापारी और आदिवासी बड़ी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं, जिससे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिली है।
बस्तर की पहचान हैं साप्ताहिक हाट-बाजार- बस्तर अंचल केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खनिज संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि वनोपज आधारित समृद्ध परंपराओं के लिए भी देशभर में जाना जाता है। यहां के साप्ताहिक हाट-बाजार स्थानीय संस्कृति, सामाजिक जीवन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। बीजापुर जिला चारों ओर से घने वनांचलों से घिरा हुआ है, जहां आदिवासी समुदाय का जीवन जंगल और वनोपज पर आधारित है। इमली, महुआ, टोरा, चिरौंजी, तेंदू जैसी बहुमूल्य वनोपज यहां के लोगों की आय का प्रमुख स्रोत हैं। ग्रामीण इन उत्पादों का संग्रहण कर साप्ताहिक बाजारों में विक्रय करते हैं तथा बदले में दैनिक जरूरत की वस्तुएं खरीदते हैं।
इन बाजारों का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक मेल-मिलाप, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामुदायिक जीवन का भी केंद्र होते हैं।
चार दशकों तक सन्नाटा, अब लौट रही जीवन की रफ्तार- उसूर ब्लॉक के पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के साप्ताहिक बाजार कभी आसपास के अनेक गांवों की आर्थिक धुरी हुआ करते थे। लेकिन माओवादी गतिविधियों और असुरक्षा के माहौल ने इन बाजारों की रौनक छीन ली। धीरे-धीरे यहां व्यापार बंद हो गया और क्षेत्र आर्थिक रूप से प्रभावित होने लगा।
अब जब क्षेत्र पूरी तरह नक्सल मुक्त हो चुका है, तब वर्षों से बंद पड़े बाजारों में फिर से दुकानें सजने लगी हैं। ग्रामीण दूर-दराज के गांवों से बाजार पहुंच रहे हैं। महिलाएं वनोपज लेकर आ रही हैं तो छोटे व्यापारी दैनिक उपयोग की सामग्री बेचने पहुंच रहे हैं। बाजारों में फिर से स्थानीय बोली, पारंपरिक वेशभूषा और आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक दिखाई देने लगी है।
आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम- पुनः प्रारंभ हुए ये साप्ताहिक बाजार स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए आर्थिक संबल बनकर उभर रहे हैं। ग्रामीणों को अब अपने उत्पाद बेचने के लिए दूरस्थ क्षेत्रों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा है। इससे समय और संसाधनों की बचत हो रही है तथा स्थानीय स्तर पर आय के नए अवसर भी बढ़ रहे हैं। बाजारों के पुनर्जीवित होने से छोटे व्यापारियों, किसानों और वनोपज संग्राहकों को सीधा लाभ मिल रहा है। साथ ही क्षेत्र में परिवहन, छोटे व्यवसाय और अन्य आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिल रही है।
शांति और विकास का नया प्रतीक बन रहा बीजापुर- बीजापुर में लौटती बाजार संस्कृति यह दर्शाती है कि शांति स्थापित होने पर विकास की संभावनाएं किस प्रकार तेजी से आकार लेती हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बाजार जैसी मूलभूत सुविधाओं के विस्तार से अब वनांचल के गांव भी मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के बाजारों में लौटती रौनक केवल व्यापार की वापसी नहीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और समृद्ध भविष्य की वापसी का प्रतीक है। यह बदलता हुआ बीजापुर अब संघर्ष की नहीं, बल्कि विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है।
छत्तीसगढ़ आज ग्रामीण विकास के उस मुकाम पर खड़ा है, जहाँ नीतियाँ केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि ज़मीन पर ठोस बदलाव का माध्यम बन चुकी हैं। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने सुशासन को केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि कार्यशैली के रूप में अपनाया है। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), महात्मा गांधी नरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी योजनाओं के प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन ने छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण विकास का एक उभरता मॉडल बना दिया है।
प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के अंतर्गत बीते दो वर्षों में छत्तीसगढ़ में 8 लाख से अधिक पक्के आवासों का निर्माण पूर्ण होना, देश में सर्वाधिक है। यह उपलब्धि केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और गरिमापूर्ण जीवन की दिशा में एक बड़ा कदम है। मुख्यमंत्री श्री साय का मानना है कि आवास केवल छत नहीं, बल्कि सुरक्षा, स्थिरता और आत्मसम्मान का आधार है। यही कारण है कि राज्य सरकार ने आवास योजना को आजीविका से जोड़ा है। आवास हितग्राहियों को सेंटरिंग प्लेट एवं अन्य निर्माण की आपूर्ति कर 8 हजार से अधिक महिलाएँ ‘लखपति दीदी’ बन सकीं।
छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी चुनौती रहे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकार ने सुरक्षा के साथ-साथ विकास और विश्वास को समान महत्व दिया है। कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास योजनाओं के माध्यम से युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। आर-सेटी एवं प्रोजेक्ट उन्नति के जरिए आत्मसमर्पित नक्सलियों सहित 5 हजार से अधिक हितग्राहियों को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया गया है। वहीं, 3416 आत्मसमर्पित नक्सलियों और नक्सल पीड़ित परिवारों को आवास की स्वीकृति दी गई है। पीएम-जनमन आवास योजना के अंतर्गत विशेष पिछड़ी जनजातियों के लिए 33 हजार से अधिक आवासों की स्वीकृति इस दिशा में एक ऐतिहासिक पहल मानी जा रही है।
साय सरकार ने योजनाओं की निगरानी में आम नागरिक को सहभागी बनाकर पारदर्शिता को नई परिभाषा दी है। टोल-फ्री हेल्पलाइन, पंचायत स्तर पर क्यूआर कोड और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से कोई भी व्यक्ति विकास कार्यों की जानकारी सीधे प्राप्त कर सकता है। प्रधानमंत्री आवास योजना के हितग्राहियों को मनरेगा, उज्ज्वला, स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन और पीएम सूर्यघर जैसी योजनाओं से अभिसरण के माध्यम से जोड़ा गया है, जिससे समग्र लाभ सुनिश्चित हो रहा है।
‘मोर गांव मोर पानी’ महाभियान छत्तीसगढ़ की जल संरक्षण नीति का प्रतीक बनकर उभरा है। नरेगा के तहत दो वर्षों में 20 करोड़ से अधिक मानव दिवसों का सृजन हुआ है। जल संरक्षण के लिए 35 हजार से अधिक कार्य और 10 हजार से अधिक आजीविका डबरियों की स्वीकृति ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। युक्तधारा पोर्टल के माध्यम से जीआईएस आधारित योजना निर्माण में छत्तीसगढ़ ने देश के अग्रणी राज्यों में स्थान बनाया है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 2.82 लाख से अधिक स्व-सहायता समूहों से लगभग 30 लाख महिलाएँ जुड़ी हैं। ‘लखपति दीदी’ अभियान के माध्यम से अब तक 4.94 लाख महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। महिलाओं की आवाज़ को मंच देने के लिए ‘दीदी के गोठ’ रेडियो कार्यक्रम और उनके उत्पादों के विपणन हेतु ‘छत्तीसकला’ ब्रांड राज्य सरकार के नवाचारों के प्रमाण हैं।
प्रधानमंत्री जनमन योजना के अंतर्गत 2902 किलोमीटर सड़कों की स्वीकृति और 1064 किलोमीटर सड़कों का निर्माण पूर्ण होना, दूरस्थ और जनजातीय अंचलों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम है। प्रधानमंत्री जनमन योजना के अंतर्गत स्वीकृत सड़कों के निर्माण में छत्तीसगढ़ देश में अग्रणी राज्य है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के विभिन्न चरणों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में दशकों से अधूरी पड़ी 43 सड़कों को पूरा कर सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि विकास अब किसी क्षेत्र या वर्ग तक सीमित नहीं रहेगा।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का कहना है कि शासन का वास्तविक उद्देश्य आम नागरिक के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। आवास, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, जल संरक्षण और अधोसंरचना के समन्वित प्रयासों से छत्तीसगढ़ आज समावेशी और आत्मनिर्भर विकास की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। पारदर्शी, नवाचारी और जनोन्मुखी कार्यप्रणाली के कारण छत्तीसगढ़ अब केवल एक राज्य नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास का राष्ट्रीय मॉडल बन रहा है।
बस्तर के विकास की गाथा बस्तर के विकास की गाथा दशकों के संघर्ष और अभूतपूर्व बदलाव की एक प्रेरणादायक कहानी है। कभी नक्सलवाद और भय की छाया में रहने वाला यह आदिवासी बहुल क्षेत्र अब तेजी से प्रगति की राह पर आगे बढ़ रहा है। सुरक्षा और सुशासन के बेहतरीन संतुलन के साथ, अब यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार के नए आयाम स्थापित हो रहे हैं।बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी का विकासबस्तर के विकास में सबसे बड़ा परिवर्तन सड़कों और रेल नेटवर्क के विस्तार से आया है।सड़कें और पुल: सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों में दशकों से अधूरी पड़ी हजारों किलोमीटर सड़कों और पुलों का निर्माण पूरा किया जा चुका है।रेलवे विस्तार: जगदलपुर-रावघाट रेल लाइन और कोत्तवलसा-किरंदुल रेल लाइन का दोहरीकरण बस्तर के औद्योगिक और आर्थिक विकास को नई गति दे रहा है।कृषि और सिंचाई योजनाएंस्थानीय किसानों की आय को बढ़ाने और उन्हें सशक्त करने के लिए सिंचाई परियोजनाओं पर भारी निवेश किया गया है :बैराज और नहरें: इंद्रावती नदी पर मटनार और देऊरगांव बैराज जैसी वृहद सिंचाई योजनाओं से हजारों हेक्टेयर भूमि को पानी मिलने लगा है।सहकारी डेयरी नेटवर्क: आदिवासी परिवारों की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के सहयोग से बड़े पैमाने पर डेयरियों का गठन किया गया है।शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सुविधाएंबस्तर के अंतिम छोर तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए विशेष 'सेवा डेरे' स्थापित किए गए हैं।इन केंद्रों के माध्यम से ग्रामीणों को बैंकिंग, कौशल प्रशिक्षण, शिक्षा और आंगनवाड़ी जैसी बुनियादी सुविधाएं आसानी से मिल रही हैं।आपातकालीन सेवाओं के लिए 'डायल 112' का विस्तार पूरे संभाग में किया गया है।पर्यटन और स्थानीय संस्कृति का संरक्षणअब बस्तर की पहचान सिर्फ खनिज संपदा या नक्सल प्रभावित क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में भी उभर रहा है।चित्रकूट और तीरथगढ़ जैसे जलप्रपात और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं।बस्तर ओलम्पिक और स्थानीय हस्तशिल्प (महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा) को बढ़ावा देकर आदिवासी युवाओं और कला को वैश्विक मंच मिल रहा है।बस्तर के विकास की यह कहानी दर्शाती है कि कैसे शांति, विश्वास और मजबूत इरादों से एक ऐतिहासिक पिछड़े क्षेत्र को देश के सबसे विकसित जनजातीय क्षेत्रों में बदला जा रहा है।
कभी गोलियों की आवाज, बारूद विस्फोट और खौफ के साये से पहचाना जाने वाला बस्तर अब तेजी से बदल रहा है। जिन गांवों में शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता था, वहां अब बच्चों की पढ़ाई की आवाज सुनाई दे रही है। जिन रास्तों पर कभी सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ों की खबरें आती थीं, वहां अब सड़कें बन रही हैं, बिजली पहुंच रही है और विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। बस्तर की यह बदलती तस्वीर केवल सरकारी दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के जनजीवन में साफ महसूस की जा सकती है।
यह बदलाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में चल रही सुरक्षा और विकास की दोहरी रणनीति का असर है। राज्य सरकार का फोकस अब केवल बस्तर के लोगों का भरोसा जीतना और बस्तर को शिक्षा, रोजगार, पर्यटन और बुनियादी सुविधाओं से जोड़कर मुख्यधारा में लाने पर है।
अबूझमाड़ के रेकावया गांव में आजादी के बाद पहली बार स्कूल बन रहा है। यह सिर्फ एक भवन निर्माण नहीं, बल्कि उस उम्मीद का प्रतीक है जिसका इंतजार वर्षों से किया जा रहा था। नारायणपुर के दूरस्थ इलाकों में 50 से अधिक ऐसे स्कूल दोबारा खोले गए हैं, जहां कभी नक्सलियों के डर से ताले लटक गए थे। अब बच्चे बिना भय के पढ़ाई कर रहे हैं। बस्तर का चर्चित गांव पुवर्ती, जिसे कभी नक्सली गतिविधियों का मजबूत केंद्र माना जाता था, आज सड़क और बिजली से जुड़ चुका है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि अब विकास जंगलों और पहाड़ियों को पार करते हुए अंतिम छोर तक पहुंच रहा है।
नक्सल प्रभावित इलाकों में मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के लिए राज्य सरकार ने ‘नियद नेल्ला नार’ योजना शुरू की। इसके तहत 521 गांवों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार सुविधाओं का विस्तार किया गया। एक लाख से ज्यादा लोगों के आधार कार्ड बनाए गए, लगभग 60 हजार लोगों को आयुष्मान कार्ड मिले और बड़ी संख्या में राशन कार्ड तथा मनरेगा जॉब कार्ड वितरित किए गए। इन क्षेत्रों में 43 नई सड़कें बनाई गई हैं। मोबाइल नेटवर्क को मजबूत करने के लिए लगातार नए टावर लगाए जा रहे हैं। महिलाओं को महतारी वंदन योजना के तहत सीधे खातों में राशि मिलने से आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है।
पिछले ढाई वर्षों में नक्सल विरोधी अभियान में बड़ी सफलता मिली है। सुरक्षाबलों ने 500 से अधिक नक्सलियों को निष्प्रभावी किया है। वहीं नई पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर 2800 से ज्यादा नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जबकि 2037 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है। स्थानीय लोगों में सुरक्षा का भरोसा बढ़ाने के लिए 86 नए सुरक्षा कैंप खोले गए हैं। इन कैंपों की वजह से प्रशासन अब उन इलाकों तक पहुंच पा रहा है, जहां कभी जाना बेहद कठिन माना जाता था।
बीजापुर जिले का चिल्कापल्ली गांव बदलाव की नई मिसाल बन गया है। यहां आजादी के 77 साल बाद 26 जनवरी 2025 को पहली बार बिजली पहुंची। इसके बाद तेमेनार, पुसकोंटा और हांदावाड़ा जैसे गांवों में भी रोशनी पहुंची। जिन गांवों में कभी अंधेरा और डर एक साथ मौजूद थे, वहां अब सामान्य जीवन लौटता दिखाई दे रहा है।
राज्य सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में पुनर्वास को अहम हथियार बनाया है। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को तीन साल तक हर महीने 10 हजार रुपये की सहायता दी जा रही है। उन्हें जमीन, मकान और रोजगार के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है। इनामी नक्सलियों को घोषित इनाम की राशि भी दी जा रही है। इतना ही नहीं, अगर किसी संगठन के 80 प्रतिशत सदस्य एक साथ आत्मसमर्पण करते हैं, तो उन्हें अतिरिक्त लाभ भी मिलता है। नक्सल मुक्त गांवों में एक करोड़ रुपये तक के विकास कार्य कराए जा रहे हैं।
बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर यह है कि अब लोग लोकतंत्र पर भरोसा जता रहे हैं। फरवरी और मार्च 2026 में 368 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ विधानसभा का भ्रमण कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझा। यह इस बात का संकेत है कि हिंसा छोड़कर लोग संवाद और लोकतंत्र के रास्ते को अपना रहे हैं। बस्तर में सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी तेजी से सामान्य हो रहा है। बस्तर ओलंपिक में इस बार 3.91 लाख लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के युवा, दिव्यांग और आत्मसमर्पित लोग भी शामिल रहे।
बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों ने आदिवासी संस्कृति को नई पहचान दी है। वर्ष 2025 में 47 हजार कलाकार जुड़े थे, जबकि 2026 में इसे और बड़े स्तर पर 12 विधाओं में आयोजित किया गया। इससे बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत हुई है।
बस्तर में बुनियादी ढांचे के विकास को भी गति मिली है। वर्षों से अधूरी पड़ी 41 सड़कें पूरी की जा चुकी हैं। ताड़मेटला और कटेकल्याण-कापानार-नडेनार जैसी सड़कें अब तैयार हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 2500 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण प्रस्तावित है। 146 सड़क और पुल निर्माण कार्यों के लिए 1109 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा और दंतेवाड़ा में कई महत्वपूर्ण सड़क और पुल निर्माण कार्य पूरे हुए हैं। रेल कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन को मंजूरी दी गई है। 140 किलोमीटर लंबी इस परियोजना पर 3513 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके अलावा कोत्तवलसा-किरंदुल रेल लाइन के दोहरीकरण का काम भी तेजी से चल रहा है।
सिंचाई क्षेत्र में इंद्रावती नदी पर मटनार और देऊरगांव में 2024 करोड़ रुपये की लागत से बैराज और 68 किलोमीटर लंबी नहर निर्माण की योजना है। इससे लगभग 32 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलेगी। कांकेर का मेढकी बैराज, बीजापुर की मट्टीमारका डायवर्सन योजना और बस्तर का महादेवघाट बैराज भी स्वीकृत हो चुके हैं।
अब बस्तर की पहचान सिर्फ नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में नहीं रह गई है। चित्रकोट जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान और धुड़मारास गांव जैसे स्थान देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। होमस्टे और इको-टूरिज्म के जरिए स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है। युवाओं को अब गांव छोड़ने की जरूरत कम पड़ रही है। सरकार अब अबूझमाड़ और जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी विकसित करने की तैयारी कर रही है। साथ ही एग्रो-प्रोसेसिंग और वन आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर स्थानीय रोजगार बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
आज बस्तर का युवा बंदूक नहीं, बल्कि शिक्षा, खेल और रोजगार को अपना भविष्य मान रहा है। महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं, किसान नई खेती की ओर बढ़ रहे हैं और गांवों में उम्मीद की नई रोशनी दिखाई दे रही है। बदलते बस्तर की यह तस्वीर साफ संकेत देती है कि नक्सलवाद अब धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है।







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