समृद्ध वन संपदा,जल, खनिज संसाधनों से भरपूर बस्तर में लोगों की,अब प्रति व्यक्ति आय में भी हुई है काफी वृद्धि, धी...
समृद्ध वन संपदा,जल, खनिज संसाधनों से भरपूर बस्तर में लोगों की,अब प्रति व्यक्ति आय में भी हुई है काफी वृद्धि, धीरे-धीरे शहरीकरण भी बढ़ रहा, पर्यटकों की आमद भी बढ़ रही,तो निखर रहा है बस्तर का सौंदर्य,विकास का नया इतिहास लिखने की ओर आगे बढ़ रहा है बस्तर
अभी 5-6 दिन और हैं,तब तक यहां के बाजारों में 'साल बीज' बहुतायत में आते रहेंगे.और इसके बाद इसका सीजन खत्म होने लगेगा.बारिश शुरू होती है तो भीग जाने से यह बीज खराब होने लगते हैं.बीज संग्राहक इसका खतरा उठाना नहीं चाहते.और आसमान में काले बादल घिरते देखकर,वे सब इसे बेचने में जल्दबाजी क़र रहे है ताकि मानसून की धुआंधार बारिश आने के पहले उनका संग्रहित साल बीज पूरा बिक जाए.सरई बीज और आम की गुठलियों को बेचने वाले संग्राहक भी जल्दी-जल्दी बाजार पहुंच रहे हैं. ग्रामीण महिलाएं भी वनोपज लेकर पहुंच रही हैं.आप,चित्र में यह साल बीज की ढ़ेरी देख रहे हैं,ऐसी ढेरिया यहां,प्रत्येक बाजार में कई मोड़ों पर जगह=जगह दिख जाती है.(Sal and Sarai seeds give Bastar a distinct identity across the country and the world.)इन्हें यहां निजी आढ़तिया खरीद लेते हैं,और यह उन्हीं लोगों के द्वारा खरीद ली गई साल बीज की ढेरिया है.आढ़तियों की यहां काफी अधिक संख्या के चलते उनमे साल बीज को अधिक अधिक रेट पर खरीदने की प्रतिस्पर्धा भी रहती है.इससे बीज संग्राहक ग्रामीणों को थोड़ा फायदा मिल जाता है.बीज संग्राहको को अभी इसका ₹30 प्रति किलो के भाव से पैसा मिल जा रहा है,जिससे उन्हें संतोष है.बस्तर के बाजार, अभी साल बीज के साथ आम की गुठलियों,मक्का,सरई बीज से भी सजे हुए हैं.शहरी क्षेत्र में आपको ऐसा बाजार,शायद ही कहीं देखने को मिलेगा.इधऱ,यहां की सब्जी मंडियों में "बोडा"खूब छाया हुआ है.यह लोकप्रिय कंद,शहरों में तो शायद ही कहीं मिलता होगा.और शहर में रहने वाले लोगों ने तो इसका स्वाद,शायद ही चखा होगा.लेकिन जो लोग बस्तर क्षेत्र में कहीं रहे हैं और इसका स्वाद चखे होंगे वह जानते हैं कि यह कंद कितना लोकप्रिय है और कितना टेस्टी होता है"बोडा" यहां चार सौ से पांच सौ रू प्रति किलो की दर से बिक रहा है यहां के टमाटर,मुनगा,लौकी, भिंडीयों और विभिन्न तरह की हरी भाजियों को भी अपना,अलग स्वाद होता है.बताते हैं कि ये भाजियां,सुबह बाजार में आने के,कुछ घंटे के भीतर ही बिक जाती है.आप कुछ देर से बाजार पहुंचेंगे तो शायद यह भाजियां आपको ना ही मिले.पसंद करने वाले लोग इन्हें,हाथों-हाथ खरीद लेते हैं.जब हम बस्तर के विकास की बात करते हैं,आर्थिक प्रगति की बात करते हैं तो यहां के स्थानीय बाजारों की दशा और उसका महत्व का भी इसमें उल्लेख होना जरूरी है.बस्तर के विकास,प्रगति के बारे में 'मैं' लिख रहा हूं तो मैं कोशिश कर रहा हूं कि विकास की इस सबसे छोटी कड़ी से इसकी शुरुआत करूं.कहीं के भी स्थानीय बाजार वहां की प्रगति का एक तरह से आईना होते हैं.यहां के बाजारों में फिर से स्थानीय बोली,पारंपरिक वेशभूषा और आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक दिखाई देने लगी है। भीड़ बढ़ रही है तो इसे यहां के लोगों की आर्थिक,सामाजिक, मानसिक प्रगति के बढ़ते जाने की निशानी भी कहा जा सकता है.और बस्तर में तो साप्ताहिक बाजारों का सदियों पहले से विशेष महत्व रहा है.यहां होने वाले बदलाव हमें पॉजिटिव-नेगेटिव दोनों तरह के संकेत देते रहते हैं.यह सामाजिक मेल-मिलाप, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामुदायिक जीवन का भी केंद्र होते हैं।नए परिवेश में कहा जा सकता है कि अब तो यहां के बाजारों में भी सामान्य शहरी क्षेत्रों की तरह ही भीड जुटती है और लोग खरीदारी करते हैं. किसी भी तरह की अनिश्चितता,कोई आशंका सब खत्म होती दिख रही है.(Bastar is now emerging as a major hub for the production of nutritious and delicious green vegetables and fruits.)
जहां पहाड़,बादलों को छूते हैं और नदियां संगीत, कला और साहित्य को प्रेरित करती हैं,समृद्ध खेती किसानी,जीवन में नई खुशहाली, नई ऊर्जा का संचरण करती है,छत्तीसगढ़ का सघन जंगल वाला बस्तर क्षेत्र,अब प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के संभावनाओं की नई कहानी कह रहा है। इसने पिछले वर्षों में विकास की नई ऊंचाइयों को स्पर्श किया है(Over the past 10 years, the covered by dense forest areas our baster has witnessed a remarkable shift in its development landscape.)वर्ष 1998 से लेकर वर्ष 2003 तक मुझे,कई बार बस्तर जाने का अवसर मिला था.कहा जाए तो जंगली वृक्षों के सुगंध से युक्त वातावरण,हरियाली,जंगल, मनोरम दृश्य और कुछ नया सीखने की सोच,लोगों को,सहज ही इस क्षेत्र की ओर खींच ले आती हैं.जिस दौर की मैं बात कर रहा हूं,उस समय भी रायपुर-जगदलपुर मुख्य मार्ग की सड़क काली-चमचमाती दिखती थी और जिस पर लॉन्ग रूट की बसें तथा दूसरे वाहन फर्राटा मारते भागते दिखते थे.याद आता है कि,कभी उस रास्ते पर सुबह 7 से 10 बजे और शाम को 4 से 7 बजे के अंतराल में जाना होता था तो रास्ते पर जगह-जगह परंपरागत वेशभूषा में स्थानीय ग्रामीणों,का एक बड़ा झुंड,जिसमें महिलाये भी बड़ी संख्या में होती थी और उनमें से कई अपने बच्चों को भी गोद में लिए होती थी और इनकी संख्या 15 से लेकर 25 तक होती थी,पैदल एक बड़ा रास्ता तय करते दिख जाती थी.यह रास्ता बड़ा लंबा होता था तो स्वाभाविक रूप से कठिन भी होता था.कई-कई किलोमीटर दूर का रास्ता.नई पीढ़ी के लोगों को अब भले ही सच जैसा ना लगे लेकिन,यह सच है कि इसमें चलने वाले कई लोगों के पैरों में जुते-चप्पल तक नहीं होते थे.लेकिन झुंड में शामिल सभी ग्रामीणों के चेहरे पर एक आत्मविश्वास होता था,निडरता होती थी,एक निरंतर एकजुटता होती थी.उनमे लक्ष्य को तय करने की दृढइच्छा शक्ति दिखती थी.और वे सब,एक.नई उम्मीद के साथ अपने लक्ष्य,अपनी मंजिल की ओर बढ़े चलते जाते थे.ऐसे झुंडों में से कई झुंड के लोग लोग सुबह वनों में काम करने जाते थे और शाम को, वहां से लौटते थे.तब बस्तर की रातें काफी गहरी और काली होती थी.मुख्य मार्गो पर भी इतना अंधेरा होता था कि दूर-दूर तक कभी कहीं कोई नजर नहीं आता था.उस समय से जो भी लोग यहां रहे हैं या आते-जाते रहे होंगे,उन्होंने यहां के रहवासियों की कठिन दिनचर्या को जरूर देखा होगा और उसके साथ यहां के परिश्रमी जनजीवन को महसूस किया होगा.कहते हैं कि आगे बढ़ने का लक्ष्य हो और कड़े परिश्रम से पीछे ना हटे,तो सफलता,स्वयं पास आने लगती है.अब तस्वीर बदली है.यहां के विकास परिदृश्य में उल्लेखनीय बदलाव आया है।कभी दूरस्थ और एकांत माना जाने वाला यह इलाका अब सुगम्यता,संपर्क और बढ़ते अवसरों से समृद्ध हो रहा है।(Even when viewed from a distance, one can certainly sense a remarkable shift in the development landscape here.)स्वच्छता, आवास, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा तक पहुंच में हुई महत्वपूर्ण प्रगति ने जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया है।सघन वनों से आच्छादित बस्तर में काम की तलाश में पैदल भटकते ग्रामीणों के वे झुंड,अब शायद ही कहीं नजर आएंगे. पिछले वर्षों में बस्तर ने विकास की नई ऊंचाइयों को स्पर्श किया है.अब यह पूरा क्षेत्र सिर्फ वनोपज आधारित उत्पादों के लिए ही नहीं,वरन लोहा,टीना और लौह अयस्क के वृहत उत्पादन के लिए भी पहचाने जाने लगा है तथा बड़ा व्यापारिक केंद्र बनने की ओर बढ़ रहा है. नमक तेल लेकर काजू- किशमिश दे देने वाला अब वह पुराना "बस्तर" काफी कुछ बदल गया है. लोगों की जागरूकता बढ़ी है. शिक्षा बढ़ी है.नई चेतना जगी है.बस्तर को उस समय शायद,किसी की काली नजर लग गई थी जब वह तथाकथित नक्सलवाद की कठिन हिंसा से जूझ रहा था,अब उससे भी उबऱने में भी सफलता मिली है.और उससे उबरकर यह क्षेत्र धीरे-धीरे जल,जंगल और जमीन को सुरक्षित रखने की अपनी प्रतिबद्धता के साथ विकास की ओर चल पड़ा है.बस्तर को प्रकृति ने ईश्वर ने इतना सब कुछ दिया है कि वह प्रत्येक मामलो खनिज,वन संपदा,सस्ता श्रम,उपजाऊ जमीन में दूसरों क्षेत्र से बहुत-बहुत आगे है. (Where hills reach up to meet the clouds,That Bastar is now poised to scale new heights in every sphere—be it education, healthcare, sports, or mineral productivity.) और कहते हैं कि इसी वजह से भी इस काली नजर लग गई थी.
बस्तर को छत्तीसगढ़ प्रदेश ही नहीं,समूचे भारत देश का आन बान और शान कहा जा सकता है. यहां आम जनजीवन में,पूजा- पाठ,जीवन पद्धति, सामान्य दिनचर्या,सामाजिक- पारिवारिक रीति रिवाजों में,प्रत्येक मामलों में भारतीय संस्कृति की वृहत गहरी छाप नजर आती है.मानो लगता है कि भारतीय संस्कृति यहीं आकर और समृद्ध हुई है तथा आगे बढ़ी है.अभी यहां के कई क्षेत्रों में मानसून की पहली बारिश हुई है.पहली बारिश की फुहार काफी सुहावनी लग रही है.यह इसलिए और अधिक सुहावनी है क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में दिन काफी अत्यधिक गर्म हो जाते हैं और यहां के निवासियों के साथ साल,वीजा,सागौन, मूनगा के वृक्षों को भी बारिश का बेसब्री से इंतजार रहा है.अब मानसून के दिन आ गए हैं तो लोगों में खुशी फैल रही है.बारिश की शुरुआत के साथ हरियाली का सौंदर्य निखर रहा है.
बस्तर की 20 साल पहले की जो तस्वीर थी अब वह काफी बदल गई है.पिछले बारह वर्षों में, यह परिवर्तन निरंतर नीतिगत समर्थन, बुनियादी ढांचे के विस्तार और समावेशी विकास पहल के कारण संभव हुआ महसूस होता है। बेहतर सड़क, और डिजिटल कनेक्टिविटी ने भौगोलिक दूरियों को कम किया है, और अब इसके कई क्षेत्र रेल तथा हवाई सेवाओं से भी जुड़ जा रहे हैं।इसने क्षेत्रीय एकीकरण और आर्थिक पहुंच को भी मजबूत किया है। साथ ही,ये सुधार शहरी और ग्रामीण दोनों समुदायों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ का एक बड़ा पर्यटन स्थल बनने की ओर भर रहा है, जहां पहुंचने वाले पर्यटकों की संख्या अब लगातार बढ़ती जा रही है। नक्सली हिंसा से मुक्त हो जाने के बाद बस्तर में बड़ा बदलाव दिख रहा है, और यह बदलाव यहां विकास का नया इतिहास लिखने को आतुर है. आने वाले समय में बस्तर विकास का एक नया मॉडल स्थापित होता नजर आ सकता है।
Over the last Two years, a new chapter has unfolded across this landscape. A region that was once defined as distant and remote, is now shaped by access, connectivity, and expanding opportunity. Roads are reaching farther, and waterways are opening new routes. Improved transport infrastructure has brought better access to water, housing, sanitation, energy, healthcare, and education. Agriculture and rural livelihoods have gained momentum through focused support and stronger market linkages. At every step, progress has become inclusive, responsive, and grounded in local realities.
जब हम बस्तर के विकास और उसके साथ नक्सलवाद की बात करते हैं तो हमें यह जान लेना भी जरूरी है कि,नक्सलवाद का प्रभाव यहां क्या शुरू से रहा था अथवा यह धीरे-धीरे पनपता और फैलता गया.असल में कहा जाता है कि इस क्षेत्र में नक्सलवाद की आहट 1980 के दशक की शुरुआत में महसूस की गई, जब आंध्र प्रदेश में सक्रिय पीपुल्स वॉर ग्रुप (PWG) के चरमपंथी नेताओं ने बीजापुर के रास्ते घने जंगलों में प्रवेश करना शुरू किया। इस दौरान उन लोगों ने आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बनानी शुरू की।यहां अबूझमाड़ और दक्षिण बस्तर के दुर्गम व घने जंगल राज्य और केंद्र सरकार की पहुंच से बहुत दूर थे, जो नक्सलियों के लिए एक छुपने के सुरक्षित स्थल बनते गए.उस समय हर जगह पुलिस, स्कूल और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव था,जिसका फायदा उठाकर नक्सलियों ने अपनी समानांतर सत्ता स्थापित कर ली. लेकिन 1990 के दशक के अंत तक नक्सलवाद यहां आम ग्रामीणों को अधिक प्रभावित नहीं कर रहा था. छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद, स्थितियां कुछ परिवर्तित हुई और नक्सल हिंसा गहराता गया. यह भी कहा जाता है कि पूरा बस्तर बेशकीमती खनिज संसाधनों से भरपूर है. और सब की नजर इसको हथियाने की ओर थी. नक्सलवाद से जुड़े लोगों का इसमें भी उपयोग किया गया.
यह देखने योग्य बात है कि बस्तर के विकास में सिर्फ सड़क,पुल,सामुदायिक भवन,चिकित्सालय, स्कूल को ही महत्व नहीं दिया गया है वरन इसके साथ संपूर्ण अधोसंरचना के सुदृणीकरण पर जोऱ दिया जा रहा है.बस्तर में अब कृषि भी काफी लाभदायक होने लगी है. लोगों को लगता होगा कि छत्तीसगढ़ में सिर्फ मैदा नहीं इलाकों में धान की अच्छी फसल होती है. ऐसा नहीं है.खरीफ सीजन में बस्तर में भी धान की फसल बहुतायत में ली जाती है,जिससे किसानों को अच्छी आमदनी हो रही है. यहां की हरी मिर्च, भिंडी,करेला,मटर जैसी सब्जियां दूर-दूर के राज्यों में बिकने जा रही है. जामुन सीताफल और अमरुद जैसे फल तो वर्षों से दूर-दूर तक पसंद किये जा रहे हैं.कभी नक्सलवाद और भय की छाया में रहने वाला यह आदिवासी बहुल क्षेत्र अब तेजी से प्रगति की राह पर आगे बढ़ रहा है। सुरक्षा और सुशासन के बेहतरीन संतुलन के साथ, अब यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार के नए आयाम स्थापित हो रहे हैं।बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी का विकासबस्तर के विकास में सबसे बड़ा परिवर्तन सड़कों और रेल नेटवर्क के विस्तार से आया है।सड़कें और पुल: सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों में दशकों से अधूरी पड़ी हजारों किलोमीटर सड़कों और पुलों का निर्माण पूरा किया जा चुका है।जगदलपुर-रावघाट रेल लाइन और कोत्तवलसा-किरंदुल रेल लाइन का दोहरीकरण बस्तर के औद्योगिक और आर्थिक विकास को नई गति दे रहा है।कृषि और सिंचाई योजनाएंस्थानीय किसानों की आय को बढ़ाने और उन्हें सशक्त करने के लिए सिंचाई परियोजनाओं पर भारी निवेश किया गया है :बैराज और नहरें: इंद्रावती नदी पर मटनार और देऊरगांव बैराज जैसी वृहद सिंचाई योजनाओं से हजारों हेक्टेयर भूमि को पानी मिलने लगा है।आदिवासी परिवारों की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के सहयोग से बड़े पैमाने पर डेयरियों का गठन किया गया है।शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सुविधाएंबस्तर के अंतिम छोर तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए विशेष 'सेवा डेरे' स्थापित किए गए हैं।यह एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में भी उभर रहा है। जब आप कांकेऱ से आगे बढ़कर बस्तर की ओर जाने लगेंगे तो केशकाल घाटी के 11 घाटों पर चढ़ते हुए आपको नये रोमांच का अनुभव होगा. यहां की हरियाली भी आपका मन प्रफुल्लित कर देगी.चित्रकूट और तीरथगढ़ जैसे जलप्रपात और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं।बस्तर ओलम्पिक और स्थानीय हस्तशिल्प (महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा) को बढ़ावा देकर आदिवासी युवाओं और कला को वैश्विक मंच मिल रहा है।बस्तर के विकास की यह कहानी दर्शाती है कि कैसे शांति, विश्वास और मजबूत इरादों से एक ऐतिहासिक पिछड़े क्षेत्र को देश के सबसे विकसित जनजातीय क्षेत्रों में बदला जा रहा है।
The construction of over 2,500 kilometers of roads is proposed under the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana. Funds amounting to ₹1,109 crore have been sanctioned for 146 road and bridge construction projects. Several key road and bridge construction works have been completed in Bijapur, Narayanpur, Sukma, and Dantewada. To strengthen rail connectivity, the Raoghat-Jagdalpur rail line project has been approved; this 140-kilometer-long project will entail an expenditure of ₹3,513 crore. Additionally, work on doubling the Kottavalasa-Kirandul rail line is progressing rapidly.
नक्सलवाद रुपी,वह काली परछाई हट गई है तो बस्तर जिसके लिए जाना पहचाना जाता है तो पर्यटकों की आम आदमी भी यहां बढ़ रही है. यहां की प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक विरासत और आदिवासी संस्कृति, पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करती है। यहां कई क्षेत्र बड़े पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहे हैं.यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में चित्रकोट जलप्रपात, कुटुम्सर गुफा, तीरथगढ़, और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान शामिल हैं। इसके अलावा, दंतेवाड़ा और बारसूर इस क्षेत्र के प्रमुख ऐतिहासिक व पौराणिक तीर्थ स्थल हैं।बस्तर क्षेत्र (जगदलपुर और इसके आसपास) में घूमने के लिए प्रमुख स्थानों को श्रेणियों में नीचे विभाजित किया गया है:प्रमुख तीर्थ एवं ऐतिहासिक स्थलमाँ दंतेश्वरी मंदिर (दंतेवाड़ा): जगदलपुर से लगभग ८४ किमी दूर स्थित यह मंदिर पूरे बस्तर क्षेत्र की आस्था का मुख्य केंद्र है। यह देश के प्राचीन शक्तिपीठों में से एक है।बारसूर (Barsoor): ऐतिहासिक स्मारकों के लिए प्रसिद्ध, यहाँ ग्यारहवीं सदी के प्रसिद्ध बत्तीसा मंदिर, मामा-भांजा मंदिर और चंद्रादित्य मंदिर मौजूद हैं। यहाँ की ऐतिहासिक मूर्तिकला दर्शनीय है।ढोलकल गणेश (Dholkal): बैलाडिला की पहाड़ियों के बीच समुद्र तल से लगभग ३००० फीट की ऊँचाई पर स्थित यह एक प्राचीन और रहस्यमयी गणेश प्रतिमा है। प्रमुख जलप्रपात और प्राकृतिक स्थलचित्रकोट जलप्रपात (Chitrakote): जगदलपुर से लगभग ३५ किमी दूर स्थित यह इंद्रावती नदी पर बना भारत का सबसे चौड़ा जलप्रपात है। इसे "भारत का नियाग्रा" भी कहा जाता है।तीरथगढ़ जलप्रपात (Tirathgarh)कांगेर घाटी में स्थित यह झरना लगभग ३०० फीट की ऊँचाई से सीढ़ीनुमा चट्टानों से गिरता है।अन्य प्रमुख झरने: तामड़ा घूमर, चित्रधारा और कांगेर धारा यहाँ के अन्य खूबसूरत झरने हैं. गुफाएं और वन्यजीवकुटुम्सर और कैलाश गुफा (Kotumsar & Kailash Caves) कांगेर वैली के घने जंगलों में स्थित ये गुफाएं चूना पत्थर के अद्भुत प्राकृतिक संरचनाओं के लिए जानी जाती हैं।धुड़मारास यह गाँव हाल ही में अपनी जैव-विविधता और बंबू राफ्टिंग के लिए वैश्विक मानचित्र पर उभरा है।कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान (Kanger Valley National Park): जैव विविधता से भरपूर इस पार्क में दुर्लभ जीव-जंतु, प्राकृतिक गुफाएं और जलप्रपात शामिल हैं। स्थानीय आकर्षणबस्तर पैलेस जगदलपुर शहर के केंद्र में स्थित यह शाही महल बस्तर के राजाओं का निवास स्थान था।दलपत सागर जगदलपुर में स्थित यह छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक है, जहाँ नौका विहार का आनंद लिया जा सकता है।
अबूझमाड़ के रेकावया गांव में आजादी के बाद पहली बार स्कूल बन रहा है। यह सिर्फ एक भवन निर्माण नहीं, बल्कि उस उम्मीद का प्रतीक है जिसका इंतजार वर्षों से किया जा रहा था। नारायणपुर के दूरस्थ इलाकों में 50 से अधिक ऐसे स्कूल दोबारा खोले गए हैं, जहां कभी नक्सलियों के डर से ताले लटक गए थे। अब बच्चे बिना भय के पढ़ाई कर रहे हैं। बस्तर का चर्चित गांव पुवर्ती, जिसे कभी नक्सली गतिविधियों का मजबूत केंद्र माना जाता था, आज सड़क और बिजली से जुड़ चुका है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि अब विकास जंगलों और पहाड़ियों को पार करते हुए अंतिम छोर तक पहुंच रहा है।
नक्सल प्रभावित इलाकों में मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के लिए राज्य सरकार ने ‘नियद नेल्ला नार’ योजना शुरू की है। इसके तहत 521 गांवों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार सुविधाओं का विस्तार किया गया। एक लाख से ज्यादा लोगों के आधार कार्ड बनाए गए, लगभग 60 हजार लोगों को आयुष्मान कार्ड मिले और बड़ी संख्या में राशन कार्ड तथा मनरेगा जॉब कार्ड वितरित किए गए। इन क्षेत्रों में 43 नई सड़कें बनाई गई हैं। मोबाइल नेटवर्क को मजबूत करने के लिए लगातार नए टावर लगाए जा रहे हैं। महिलाओं को महतारी वंदन योजना के तहत सीधे खातों में राशि मिलने से आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है।
जहां कभी जाना बेहद कठिन माना जाता था,उन इलाकों तक अब प्रशासन अब पहुंच पा रहा है,स्थानीय लोगों में सुरक्षा का भरोसा बढ़ाने के लिए 86 नए सुरक्षा कैंप खोले गए हैं। बीजापुर जिले का चिल्कापल्ली गांव में आजादी के 77 साल बाद 26 जनवरी 2025 को पहली बार बिजली पहुंची। इसके बाद तेमेनार, पुसकोंटा और हांदावाड़ा जैसे गांवों में भी रोशनी पहुंची। जिन गांवों में कभी अंधेरा और डर एक साथ मौजूद थे, वहां अब सामान्य जीवन लौटता दिखाई दे रहा है। नक्सलवाद क्या पूर्णता: समाप्त हो गया है, इससे जुड़े लोग समाज के मुख्य धारा में आने लगे हैं.. ऐसे सवालों का उत्तर जानने के लिए हमने यहां विभिन्न जिलों के कलेक्टर्स से भी बातचीत की. कोंडागांव जिले के कलेक्टर ने बताया कि जिले के कई गांव नक्सल प्रभावित थे.जहां नक्सलियों के द्वारा बम विस्फोट कर देने की घटनाएं होती थी. अब कुछ महीने से पूरा क्षेत्र शांत है.
राज्य सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में पुनर्वास को अहम हथियार बनाया है। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को तीन साल तक हर महीने 10 हजार रुपये की सहायता दी जा रही है। उन्हें जमीन, मकान और रोजगार के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है। इनामी नक्सलियों को घोषित इनाम की राशि भी दी जा रही है। इतना ही नहीं, अगर किसी संगठन के 80 प्रतिशत सदस्य एक साथ आत्मसमर्पण करते हैं, तो उन्हें अतिरिक्त लाभ भी मिलता है। नक्सल मुक्त गांवों में एक करोड़ रुपये तक के विकास कार्य कराए जा रहे हैं।
बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर यह है कि अब लोग लोकतंत्र पर भरोसा जता रहे हैं। हिंसा छोड़कर लोग संवाद और लोकतंत्र के रास्ते को अपना रहे हैं। बस्तर में सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी तेजी से सामान्य हो रहा है। जानकारी के अनुसार बस्तर ओलंपिक में इस बार 3.91 लाख लोगों ने हिस्सा लिया। बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों ने आदिवासी संस्कृति को नई पहचान दी है। वर्ष 2025 में 47 हजार कलाकार जुड़े थे, जबकि 2026 में इसे और बड़े स्तर पर 12 विधाओं में आयोजित किया गया। इससे बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत हुई है।
There was a time when the movement of villagers had virtually ceased in areas like the weekly markets of Pujari Kanker and Kondapalli—located within the Awapalli region of Usur block—due to fear and insecurity. Traditional weekly markets in the area had come to a complete standstill under the influence of Maoism. However, with the emergence of a Naxal-free environment, the markets are once again bustling with activity. Villagers, traders, and tribal people are arriving here in large numbers, giving fresh momentum to the region's economic activities.
तमाम चुनौतियों के बीच केंद्र और राज्य सरकार ने बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है ।सरकार ने सुरक्षा के साथ-साथ जनसामान्य की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने पर भी समान रूप से ध्यान दिया। शासन की योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने, गरीबों को अधिकार दिलाने और लोकतंत्र के प्रति विश्वास मजबूत करने के निरंतर प्रयास किए गए।आज नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आमजन का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास की प्रक्रिया में बढ़ा है।‘नेशन फर्स्ट’ का संकल्प, दूरदर्शी नेतृत्व और सुरक्षा बलों के अदम्य साहस ने बस्तर सहित पूरे नक्सल प्रभावित क्षेत्र की तस्वीर बदल रही है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, बैंकिंग और जनकल्याणकारी योजनाओं की पहुंच ने लोगों के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन लाया है।बस्तर में स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में अपेक्षाकृत काफी तेजी से सुधार आया है. नए जिलों के गठन के साथ यहां शहरीकरण भी तेजी से बढ़ा है.आप देखेंगे कि यहां प्रति व्यक्ति आय में भी काफी बढ़ोतरी हुई है तो, वहीं जमीनों की कीमतों में भी काफी बढ़ोतरी होती जा रही है. लोग अब अपनी भूमि को बेचने के बजाय उस पर घर मकान दुकान बनाकर उससे आय प्राप्त करने के प्रयास में लग गए हैं. आप दूरस्थ गांव में चले जाइए वहां भी आपको बेश कीमती चार पहिया वाहन मिल जाएंगे.इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बेहतर प्रयास होते रहे तो,छत्तीसगढ़ विकास और सुशासन का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है.तथा देश के सबसे तेजी से विकसित होने वाले क्षेत्रों में इसकी पहचान स्थापित हो सकेगी।कुल मिलाकर तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है बस्तर. बस इसको सजाने संवारने में ईमानदार कोशिशों की लगातार जरूरत है.
"बोड़ा" बस्तर के बाजार में सब्जियों में काफी लोकप्रिय है. हल्के मटमैले गोरे रंग का बोड़ा, बाजार में कब से आने लगेगा, इसका लोग इंतजार करते रहते हैं.इसकी सब्जी काफी टेस्टी बनती है.बताते हैं कि जब धरती बहुत अधिक गर्म रहती है और पहली बारिश होती है तब बोड़ा अपने आप उगने लगता है.उसके पहले आप खोजते रह जाओगे, तब भी यह मिलता नहीं है. एक विचित्र बात यह भी है कि जब यह उगता है तो इसका थोड़ा सा हिस्सा ही ऊपर दिखता है. और नीचे ऊंगली भर खुदाई करने से यह निकल जाता है.इसको जानने वाले ही पहचान सकते हैं कि यहां बोड़ा होगा.बड़े-बड़े जंगल क्षेत्र में स्थानीय ग्रामीण नजर रखते हैं कि किस भूमि पर बोड़ा हो सकता है.पहली-दूसरी बारिश होने के बाद. जमीन कुछ भीग जाती है,तो कहीं-कहीं थोड़ा भुरभुरी देखने लगती है.वहां बोडा मिलने की संभावना ज्यादा होती है.जानने वाले वहां खुदाई करते हैं और कुछ खुदाई के बाद बोड़ा निकल जाता है."अब बोड़ा"तो आपके सेब,अंगूर,नाशपाती जैसे फलों से तो महंगा बिक रहा है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितना लोकप्रिय है और कितना पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है. फिलहाल आप भी इंतजार कीजिए हो सकता है कि कभी, किसी पहली बारिश के बाद आपको यह कंद मिल सके. हम आपके यहां बताना चाहते हैं कि विभिन्न तरह की स्वादिष्ट सब्जियों और फलों का बस्तर, बड़ा उत्पादक क्षेत्र बनता जा रहा है.
















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