0 अशोक त्रिपाठी लोग कहानियां पढ़ते हैं,और कई सारी कहानियां,दिल को छू जाती है,कोई कहानी, इस तरह से दिल की गहराई में ...
लोग कहानियां पढ़ते हैं,और कई सारी कहानियां,दिल को छू जाती है,कोई कहानी, इस तरह से दिल की गहराई में उतर जाती है,लगने लगता है कि उसका,कहीं कोई एक पात्र हम भी हैं,पाठक,उस कहानी से अपने को सीधा जुड़ा हुआ महसूस करता है, और वह कहानी अपने आसपास की सच्ची घटना सी प्रतीत होती है. लेकिन कई बार ऐसी सच्ची घटनाएं होती हैं जो कहानी सी लगने लगती हैं जिस पर विश्वास नहीं होता है.मन यह स्वीकार करने से नकारने करने लगता है कि दुनिया में कहीं, ऐसी घटना हो भी सकती है.दृष्णा,उसका छोटा भाई और माता-पिता अपने घर में मृत पाए गए,फांसी पऱ लटके पाए गए.इस हृदयविदारक घटना पर,अभी भी, शायद ही, किसी को विश्वास हो रहा है. मोहल्ले के लोगों के लिए तो यह बिल्कुल अविश्वसनीय मार्मिक घटना है. वहां के लोगों से इस घटना के बारे में बात की जाती है तो इस हंसते खिलखिलाते, सभी के साथ मिलकर रहने वाले इस परिवार के सदस्यों का चेहरा उनके सामने आ जाता है.उस क्षेत्र में आज भी मातम, सन्नाटा पसरा हुआ है. क्षेत्र के लोग तो आज भी कतई विश्वास करने को तैयार नहीं है कि कोई घटना हो सकती है.दृष्णा तो अब आठवीं कक्षा में पहुंच गई थी. उम्र तो उसकी छोटी थी लेकिन उसकी सोच बहुत बड़ी लगती थी. वह मोहल्ले के लोगों के लिए एक उदाहरण के जैसे थी. स्कूल में लगभग हर साल, पहले या दूसरे नंबर स्थान पर आई थी.बच्ची हर साल अच्छा नंबर लाती तो मोहल्ले के लोग उदाहरण देकर अपने बच्चों को भी समझाते कि देखो,ऐसे ही पढ़ना है.पढ़ाई कर आगे बढ़ना है.पढ़ाई के अलावा दृष्णा डांस,स्पोर्ट्स की गतिविधियों में भी शामिल होने में आगे रहती थी.उसकी मां चंचल साहू कहती थी मैं बच्चों को किसी बड़े पद पर देखना चाहती हूं. कोई बड़ा अधिकारी बनाना चाहती हूं. जो यह सब जानते हैं उनके सामने सवाल है कि यह मां आखिर कहां से टूट गई.वह कभी विश्वास नहीं कर रहे हैं कि एक दृढ़निश्चयी परिवार के प्रति समर्पित मां,इस तरह से फांसी के फंदे पर झूल सकती है. एक मां-बाप का प्यार दुलार, बच्चों की कुशाग्र बुद्धि, चंचलता, हंसमुख स्वभाव के बारे में जानने वाले लोग कोई यह मानने को तैयार ही नहीं होते रहे कि पलंग पर लेटे मृत पाए गए वही बच्चे हैं. घटना की जानकारी मिलने पर उस घर में पहुंचकर जिसने भी वह उस दृश्य को देखा उसकी आंखों में आंसू छलछला आया. विश्वास करना कठिन हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है.मौत इस तरह से भी आ सकती है. लेकिन अब यह कोई कहानी नहीं है. सच्चाई बन गई है. परिवार के एक साथ 4 सदस्यों की अकाल बेरहम मौतकी सबको सदमे में डाल देने वाली घटना सच्चाई है. लोगों के मन में बस यही सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी क्या विवशता आ गई थी कि वे लोग, ऐसा कदम उठाने को भी विवश हो गए. किसने इतना बड़ा आत्मघाती निर्णय लिया. कौन इतनी निर्ममता से अपने बच्चों का गला घोंट सकता है. कहीं इसके पीछे कुछ गड़बड़ तो नहीं है.
दो मासूम चंचल बच्चों की जिम्मेदार मां की फांसी पर लटकी तस्वीर सबका दिल दहला देने वाली है. जो इस परिवार के बारे में जानते थे उन्हें इस घटना के बारे में जानकारी मिली तो उसकी आंखों में आंसू आ गए.दुर्ग शहर का यह क्षेत्र अभी भी स्तब्ध है.क्षेत्र के लोगों को इस परिवार की याद आ जाती है जहां तो हंसते खिलखिलाते बच्चे भी रहते थे. स्कूल आते जाते कभी शरारत भी करते थे. दृष्णा ने पिछले वर्ष स्पोर्ट्स में भी हिस्सा लिया था और उसमें भी उसका प्रदर्शन अच्छा रहा था. यशंक भी पढ़ाई में पीछे नहीं रहता था. उसकी बड़ी बहन उसे सिखाती थी. हर क्लास में अच्छे नंबर लाने के लिए बार-बार प्रेरित करती थी. इससे वह भी पढ़ाई में लगा रहता था. माता-पिता को बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने की हमेशा चिंता रहती थी और उन लोगों ने, बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए उनका पिछले वर्ष दूसरे स्कूल में एडमिशन करा दिया था. पलंग पर लेटे उन मृत मासूम बच्चों के चेहरे पर उस समय भी एक दृढ़ता नजर आ रही थी, कुछ करने का संकल्प दिख रहा था,लेकिन उन मासूमों मुस्कुराहट, उनकी चंचलता, अब कफन के नीचे जम गई है.
एक परिवार के चार सदस्यों का यूं ही अकाल मौत को गले लगा लेना कई सवाल खड़े करता है. जो अभी तक की स्थितियां हैं घटना के बारे में कोई कुछ नहीं जानता है. कि है.किसने इतना बड़ा दु:स्साहिक निर्णय लिया,... एसा आत्मघाती निर्णय क्यों लिया... क्या मजबूरी आ गई थी..यह सवाल तो हमेशा उठाता रहेगा. लेकिन ऐसी घटनाओं से यह महसूस होने लगता है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था कहीं ना कहीं, भीतर से चरमरा गई है.और निश्चित रूप से यह हमारी सामाजिक व्यवस्था पर भी बड़ा तमाचा है. लगता है कि यह बात बिल्कुल सही है कि हम दिखावे की तरह आगे बढ़ते जा रहे हैं सत्य से दूर भाग रहे हैं तो दिखावा कभी ना कभी जमीन पर जरूर पटक देता है. घटना में इससे भी इंकार नहीं किया जा रहा है कि इसके पीछे और किसी का भी हाथ हो सकता है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट तो आ गई है.जिसमें बच्चों का गला घोंटे जाने के आशंका व्यक्त की गई है. और इसके पहले इन बच्चों को जरूर बेहोश कर दिया गया रहा होगा.



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