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ईरान की सीमाओं के हालात, युद्ध ने खड़ा कर दिया है बहुत बड़ा मानवीय संकट

नई दिल्ली . असल बात news.  अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के अनुसार, यह संकट अब ईरान की सीमाओं से बाहर भी फैल चुका है। 19 मार्च तक अस्सी हजार स...

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नई दिल्ली .

असल बात news. 

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के अनुसार, यह संकट अब ईरान की सीमाओं से बाहर भी फैल चुका है। 19 मार्च तक अस्सी हजार से अधिक लोग देश छोड़ चुके हैं। इनमें से सबसे ज्यादा लोग अफगानिस्तान पहुंचे हैं, जहां सत्तर हजार से अधिक लोगों ने शरण ली है।

ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष ने पूरे पश्चिम एशिया को एक गहरे मानवीय संकट में धकेल दिया है। बीते एक महीने से लगातार हो रही बमबारी ने न केवल हजारों लोगों की जान ली है, बल्कि लाखों लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 28 फरवरी से अब तक अमेरिका और इजराइल के हमलों में कम से कम 1937 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि चौबीस हजार आठ सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं। ये आंकड़े इस बात की गंभीरता को दर्शाते हैं कि यह संघर्ष अब व्यापक मानवीय आपदा बन चुका है।

इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के मुताबिक, इस संघर्ष के कारण अब तक बत्तीस लाख से अधिक लोग ईरान के भीतर ही विस्थापित हो चुके हैं। तेहरान, इस्फहान और केरमानशाह जैसे बड़े शहरों में सबसे ज्यादा हवाई और ड्रोन हमले हुए हैं, जिसके चलते लोग इन इलाकों को छोड़कर अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाने वाले ग्रामीण क्षेत्रों और कैस्पियन सागर के पास के उत्तरी इलाकों की ओर जा रहे हैं। लेकिन हालात इतने खराब हैं कि सुरक्षित स्थान भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह गए हैं। कई जगहों पर लगातार हमलों के कारण लोगों के सामने यह दुविधा है कि वे अपने घरों में रहें या पलायन का जोखिम उठाएं।

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के अनुसार, यह संकट अब ईरान की सीमाओं से बाहर भी फैल चुका है। 19 मार्च तक अस्सी हजार से अधिक लोग देश छोड़ चुके हैं। इनमें से सबसे ज्यादा लोग अफगानिस्तान पहुंचे हैं, जहां सत्तर हजार से अधिक लोगों ने शरण ली है। इसके अलावा पाकिस्तान, अजरबैजान, इराक और तुर्कमेनिस्तान में भी हजारों लोग पहुंचे हैं। यह पलायन इस बात का संकेत है कि लोगों को अब अपने देश में जीवन सुरक्षित नहीं लग रहा। डर, असुरक्षा और लगातार हो रहे हमलों ने आम नागरिकों को अपनी जान बचाने के लिए मजबूर कर दिया है।

वहीं सीमाओं पर हालात और भी ज्यादा कठिन होते जा रहे हैं। ईरान से भागकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमाओं तक पहुंचने वाले लोगों को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। राहत एजेंसियों के अनुसार, सीमाई चौकियों पर भारी भीड़, लंबी कतारें और सीमित संसाधनों के कारण लोगों को कई दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर भोजन, पानी और चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी है।

इसके अलावा, सुरक्षा स्थिति भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा पर लगातार झड़पें और गोलाबारी हो रही है, जिससे शरण लेने आए लोगों की जान भी खतरे में पड़ रही है। हाल के दिनों में सीमा क्षेत्रों में तोपखाने हमलों और सैन्य कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं, जिनमें आम नागरिक भी घायल हुए हैं। साथ ही कई बार सीमाएं अचानक बंद कर दी जाती हैं या सीमित समय के लिए खोली जाती हैं, जिससे हजारों लोग बीच रास्ते में फंस जाते हैं। कुछ मामलों में लोगों को जबरन वापस लौटाया जा रहा है, जबकि कई परिवार बिछड़ जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जो लोग एक युद्ध से बचकर भाग रहे हैं, वे अक्सर दूसरे संघर्ष और असुरक्षा के माहौल में पहुंच जाते हैं, जिससे उनकी स्थिति और भी दयनीय हो जाती है।

ईरान से भाग रहे लोगों की कहानियां भी बेहद मार्मिक हैं। कई लोग अपने देश की सरकार से नाराज हैं और इस संघर्ष को बदलाव का मौका मान रहे हैं। कुछ लोगों ने विदेशी सैन्य हस्तक्षेप का समर्थन भी किया है, जो इस बात को दर्शाता है कि देश के भीतर असंतोष कितना गहरा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, एक व्यक्ति ने बताया कि पिछले 47 वर्षों का दर्द अब असहनीय हो चुका है। वहीं एक अन्य व्यक्ति, जो सात साल जेल में रहा, उसने कहा कि जो पीड़ा उन्होंने झेली है, उसे समझ पाना आसान नहीं है। हालांकि, लोग डर और उम्मीद दोनों के बीच जी रहे हैं। वह अपनी जान और परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, लेकिन साथ ही यह भी चाहते हैं कि यह संघर्ष किसी बड़े बदलाव की ओर ले जाए।

वहीं ईरान में रहने वाले चालीस लाख से अधिक अफगान शरणार्थी इस संकट में सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। इनमें से अधिकतर शहरों में रहते हैं, जो हमलों का मुख्य लक्ष्य बने हुए हैं। इनमें से कई लोगों की आजीविका खत्म हो चुकी है और उनके पास न तो सुरक्षित स्थान है और न ही देश छोड़ने की अनुमति है। बताया जा रहा है कि करीब पैंतीस हजार अफगान पहले ही वापस अपने देश लौट चुके हैं, जबकि दस लाख से अधिक लोगों पर जबरन वापसी का खतरा मंडरा रहा है। यह स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि अफगानिस्तान खुद संकट से जूझ रहा है।

दूसरी ओर, ईरान के शहरों से आ रही तस्वीरें बेहद चिंताजनक हैं। कई इलाकों में घर, अस्पताल और स्कूल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। तेहरान के लगभग हर इलाके में इमारतों को नुकसान पहुंचा है। लोग अपने घरों की खिड़कियों पर टेप लगा रहे हैं ताकि कांच टूटने से होने वाली चोटों से बचा जा सके। इंटरनेट सेवाएं बाधित हैं और बैंकिंग व्यवस्था भी प्रभावित है, जिससे आम जीवन और कठिन हो गया है। लोग रातभर बम धमाकों की आवाज सुनते हुए डर के साये में जी रहे हैं।

उधर, मानवीय संगठनों का कहना है कि राहत कार्यों के लिए जरूरी धन की भारी कमी है। हर सप्ताह अरबों रुपये युद्ध पर खर्च हो रहे हैं, लेकिन प्रभावित लोगों के लिए भोजन, आश्रय और चिकित्सा सहायता के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। बताया जा रहा है कि ईरान में करीब अट्ठाइस लाख लोगों की मदद के लिए 80 मिलियन डॉलर की जरूरत है, जबकि अफगानिस्तान में 17.5 मिलियन लोगों के लिए 1.71 बिलियन डॉलर की आवश्यकता है। लेकिन अब तक इसका बहुत छोटा हिस्सा ही उपलब्ध हो पाया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह युद्ध जारी रहा तो यह एक और बड़े मानवीय संकट का रूप ले सकता है। लाखों लोग सीमाओं के पार जाने को मजबूर होंगे, जिससे पहले से दबाव झेल रहे देशों पर और बोझ बढ़ेगा। देखा जाये तो यह संघर्ष आम लोगों को ऐसी पीड़ा दे रहा है जिसके लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की जा रही है कि सभी पक्ष नागरिकों और बुनियादी ढांचे पर हमले रोकें और कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ें।

बहरहाल, ईरान और अमेरिका के बीच यह युद्ध अब पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर मानवीय संकट बन चुका है। हजारों मौतें, लाखों विस्थापित लोग और बर्बाद होती जिंदगी इस बात का संकेत हैं कि अगर जल्द ही समाधान नहीं निकला तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है।

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)