राष्ट्र गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर विशेष तिरंगा ऊंचा रहे सदा, यही हमारा संकल्प महान है. जब तक सांसों में प्राण रहे, मां की र...
राष्ट्र गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर विशेष
तिरंगा ऊंचा रहे सदा, यही हमारा संकल्प महान है.
जब तक सांसों में प्राण रहे, मां की रक्षा धर्म है.
वंदे मातरम का उदघोष जीवन का अभिमान है.
यही हमारा कर्तव्य बने, यही हमारा अभियान है.
राष्ट्रगीत "वंदे मातरम "के 150 वर्ष पूरे होने पर विधानसभा में विशेष चर्चा
छत्तीसगढ़ .
असल बात news.
वंदे मातरम.... भारत देश का राष्ट्र गीत... इसके 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देश भर में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के साथ उत्सव मनाया जा रहा है.वर्ष 1870 के दशक में महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित गीत राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन मैं राज प्रेम की भावना के संचार का सशक्त माध्यम बन गया था. छत्तीसगढ़ विधानसभा के शीतकालीन सत्र में राष्ट्रगीत पर ऐतिहासिक चर्चा हुई. यह ऐतिहासिक दिन था चर्चा के दौरान देश के गौरवशाली इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान, देश के लिए युवाओं का हंसते-हंसते फांसी पर झूल जाना, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सभी की सहभागिता और एकजटता जय श्री विश्व पर उल्लेखनीय चर्चा हुई. हम नए युग नए भारत की ओर बढ़ रहे हैं तो ऐसे समय में इस ऐतिहासिक महत्व के विषय की चर्चा में पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी भावनाओ को व्यक्त किया.छत्तीसगढ़ के विधानसभा में नव चेतना के साथ एक सकारात्मक संवाद स्थापित होता नजर आया.इस चर्चा के दौरान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला तो वही बात एसआईआर तक भी हुई. वरिष्ठ मंत्री रामविचार नेताम ने इस पर बोलते हुए कहा कि फिर से उनका भी पता लगाना चाहिए जो वंदे मातरम का विरोध करते हैं और उन्हें देश से बाहर कर देना चाहिए. मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने वंदेमातरम के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वंदे मातरम् देशप्रेम का वह जज्बा था जिसकी गूंज से ब्रिटिश हुकूमत तक कांप उठती थी।
आसंदी से स्पीकर डॉ रमन सिंह ने इस विशेष चर्चा की भावनाओ को सदन के समक्ष प्रस्तुत किया.उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन काल में जब भारत में घर-घर अंग्रेजी राष्ट्रगान 'गॉड द सेव' को थोपने का प्रयास किया गया, तब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी ने उनके समक्ष वंदे मातरम के माध्यम से भारत की अस्मिता,भारत के गौरव को संरक्षित करने का काम किया. वर्ष 1896 में गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने कोलकाता के कांग्रेस के अधिवेशन में वंदे मातरम गाया. यह वंदे मातरम के प्रति गुरुदेव का प्रेम था. लेकिन इसके बाद 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया गया. बंग भंग की विभीषिका की पीछे की साजिश सब जानते हैं. उसके पीछे की अंग्रेजों की कूटनीतिक चाल को सब समझते हैं. इस देश को विभाजित करने के लिए आजादी के पहले ही विखंडित कर दिया गया. जब बंगाल का विभाजन हुआ तो उस समय वंदे मातरम इस विभाजनकारी योजनाओं के बीच चट्टान की तरह खड़ा रहा. जब वंदे मातरम हर भारतीय की जुबान बनने लगा तब ब्रिटिश हुकूमत ने इस गीत से जागृत होती राष्ट्र प्रेम की भावना को समझ कर 1905 से 1908 के बीच इसे प्रतिबंधित करने का प्रयास किया. लेकिन हमारे अमर वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने ऐसे गीत से प्रेरित होकर आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और अपने प्राणों को मातृभूमि के लिए न्योछावर कर दिया. आज यह वीर अमर शहीदों को याद करने का अवसर है शाहिद खुदीराम बोस शाहिद मदनलाल थीघ्र शहीद राम प्रसाद बिस्मिल जैसे साईं करो अमर शहीदों ने और अंतिम चरणों में वंदे मातरम का उद्धघोष करते हुए हंसते-हंसते हुए देश के लिए अपना बलिदान दिया. स्पीकर डॉक्टर रमन सिंह ने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि राष्ट्र की चेतना और आत्मा के इस गीत वंदे मातरम के जब 50 वर्ष पूर्ण हुए थे भारत देश अंग्रेजों की गुलामी में था. जब वंदे मातरम के 100 साल पूरे हुए उस समय देश में आपातकाल थोपा गया था.लेकिन इसके आज 150 वर्ष पूरे होने पर देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व वाली सरकार है.यह देश का सौभाग्य है कि हम यहां पर राष्ट्रगीत को गौरव के साथ चिंतन कर रहे हैं, मंथन कर रहे हैं, गांव-गांव तक गली-गली तक जोश के साथ उत्साह के साथ पूरी चेतना के साथ इस वंदे मातरम गीत को दोहराने का काम हो रहा है. भारत देश में आज कोई बाहरी ताकत नहीं है लेकिन इस नवभारत को स्वदेशी और आत्मनिर्भर की ओर आगे बढ़ते हुए वैश्विक पटेल पर एक नए आयाम स्थापित करना है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता की ओर हम आगे बढ़ रहे हैं बल्कि अपने विस्तृत संस्कृति अपने गौरव को पूरा स्थापित करने में लगे हुए हैं. यह अवसर है जब हम अपनी संस्कृति गौरव को अपना स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्होंने आह्वान किया कि वंदे मातरम को जिस भावना के साथ हमारे पूर्वजों में प्रयुक्त किया उसी को हम आत्मसात करें.
वंदे मातरम् की गौरव गाथा का स्मरण हर भारतीय के लिए गर्व का विषय – मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय
राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में आयोजित विशेष चर्चा में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने वंदेमातरम के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वंदे मातरम् देशप्रेम का वह जज्बा था जिसकी गूंज से ब्रिटिश हुकूमत तक कांप उठती थी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह उद्घोष करोड़ों भारतीयों के हृदय में साहस, त्याग और बलिदान की अग्नि प्रज्वलित करता रहा। उन्होंने कहा कि यह वही स्वर था जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की शक्ति प्रदान की।
उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानियों को स्मरण करते हुए कहा कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, खुदीराम बोस सहित असंख्य क्रांतिकारी वंदे मातरम् का जयघोष करते हुए मां भारती के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए। उनका बलिदान आज भी हर भारतीय को राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का स्मरण कराता है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि वंदे मातरम् की गौरव गाथा का स्मरण करना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह गीत हमें उस संघर्ष, उस पीड़ा और उस अदम्य साहस की याद दिलाता है, जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलाई। यह हमारी राष्ट्रीय चेतना का आधार स्तंभ है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं होती, जो मानचित्र पर अंकित होती हैं। किसी राष्ट्र की वास्तविक पहचान उसकी सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं और उन मूल्यों से होती है, जो सदियों से उसके आचार-विचार और जीवन पद्धति का हिस्सा रहे हैं। भारत की यह सांस्कृतिक निरंतरता विश्व में अद्वितीय है।
उन्होंने कहा कि विधानसभा में वंदे मातरम् पर विशेष चर्चा आयोजित करने का उद्देश्य यह भी है कि हम इतिहास की उन गलतियों को कभी न भूलें, जिन्होंने देश को गहरे घाव दिए, जिनकी पीड़ा आज भी हमारे समाज में कहीं-न-कहीं महसूस की जाती है। इतिहास से सीख लेकर ही हम एक सशक्त और समरस भारत का निर्माण कर सकते हैं।
मुख्यमंत्री श्री साय ने इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के उन सभी वीर सपूतों को नमन किया, जिन्होंने वंदे मातरम् के भाव को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर भारत माता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् हमें हमारी विरासत, हमारी सांस्कृतिक चेतना और हजारों वर्षों की सभ्यता से जोड़ता है। यह उन आदर्शों की सामूहिक अभिव्यक्ति है, जिन्हें हमने युगों-युगों में आत्मसात किया है।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में धरती को माता के रूप में पूजने की भावना रही है, जिसे हम मातृभूमि कहते हैं। वंदे मातरम् इसी भाव का सशक्त और पवित्र स्वरूप है, जो हमें प्रकृति, भूमि और राष्ट्र के प्रति सम्मान और कर्तव्यबोध सिखाता है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस विशेष चर्चा के आयोजन के लिए विधानसभा अध्यक्ष तथा सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे विमर्श नई पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक गौरव और ऐतिहासिक चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सदन में नेता प्रतिपक्ष डॉ चरण दास महंत ने इस विषय पर बोलते हुए सर्वप्रथम वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर सदन में इस पर चर्चा स्वीकृत करने के लिए बधाइयां दी और इसके इतिहास के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने कहा कि हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने, महापुरुषों ने जिन्होंने फांसी के फंदे को चुमा,उन सब ने इस नारे के साथ ही हंसते-हंसते अपने जीवन को बलिदान दे दिया. उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी को प्रणाम करते हुए कहा कि आज पीड़ा होती है क्योंकि वंदे मातरम को आज भारत को बांटने में और इतिहास को दूषित करने में कुछ लोग लगे हैं. उन्होंने वंदे मातरम के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्ष 1875 में इस गीत की रचना के बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी ने की जो की मातृभूमि की पूजा है. हम भारत को माता मानते हैं तो मातृशक्ति की पूजा और माता के लिए तो सभी बराबर होते हैं. 1882 में जब आनंदमठ लिखा गया तब इसमें चार अंतरे और जोड़ दिए गए. जब संन्यासियों का विद्रोह शुरू हुआ और संन्यासियों को जिस कारण से ज्यादा प्रेरणा मिल सकती थी उन शक्तियों के नाम, माता के नाम, देवी देवताओं के नाम उसमें और जोड़े गए. वंदे मातरम हमारा बल बना, हमारी चेतना बनी और सब की बुद्धि को प्रभावित किया. कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस की समिति जिसमें नेहरू जी शामिल थे, सुभाष चंद्र बोस जी शामिल थे, मौलाना आजाद शामिल थे, इन सब लोगों ने सुझाव लिया कि अब राष्ट्रीय गीत कैसे बनना चाहिए और इसके लिए क्या किया जाए. तब यह बात चलती रही और संविधान सभा में एक नेशनल एंथम कमेटी बनाई गई जिसमें तीन गानों को राष्ट्र में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत बनाने के लिए चयन के लिए उसमें पहला गाना..सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा था, दूसरा गाना..जन- गण- मन,अधिनायक जय हे था, तीसरा गाना वंदे मातरम था. सारे जहां से अच्छा,.. गाना की रचना मोहम्मद इकबाल ने की थी मगर उनका झुकाव पाकिस्तान की ओर चला गया इसलिए उसे गीत पर पूरा विचार नहीं हुआ. और जन- गण- मन,अधिनायक,जय हे और वंदे मातरम का चुनाव किया गया. वर्ष 1940 का मुस्लिम लीग जिसमें मोहम्मद अली जिन्ना भी नेता थे उन्होंने आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान विभाजन की मांग रखी. विषय पर बोलते हुए डॉक्टर महंत ने आगे कहा कहा कि आज 150 वर्ष पर चर्चा हो रही है वह निवेदन करते हैं कि इस तरह से हम इतिहास को न बिगाड़े,इतिहास को जो की जो मूल भावना है उसको पढ़ें, लिखे, और समझे. हम लोग तो चले आएंगे 150 साल हो रहे हैं जब इसे हमारे बच्चे,बच्चियां नौजवान पीढ़ी इसे मनाने आएंगे हम उन को एक गलत इतिहास देंगे यह मेरे ख्याल से उचित नहीं होगा.आज भी संविधान सभा का जिक्र आता है सरकार पटेल जी,बाबा साहब अंबेडकर, कन्हैयालाल जी, मुंशी जी जैसे लोगों की हम चर्चा करते हैं और उनसे पाते हैं कि राष्ट्रगीत वंदे मातरम में दो अंतरे को शामिल किया गया और बाकी के चार अंतरे को शामिल इसलिए किया गया कि देश में जो मुस्लिम की आबादी थी उस समय काफी झगड़ा शुरू हो गए थे लड़ाइयां शुरू हो गई थी इस तरह से उस वातावरण को शुद्ध और शांत करने के लिए माननीय बंकिम चंद्र जी ने 6 लाइन आनंद मठ में जोड़े थे,वह सिर्फ उस दिन की आवश्यकता थी. डॉ महंत ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम के पहले के चार अंतरे एवं बाद के छह अंतरे, दोनों को सदन में प्रस्तुत किया. और कहा कि इस हमारे पुरखों ने बड़ा सोच- समझकर इस देश को सौंपा है.यह हमारी संपत्ति है. हमारा धन है. यह बना रहे.आने वाले दिनों में हम इसे और बेहतर ढंग से,इनके गीतों को, इनके शब्दों को, उनके भावनाओ को समझें और आने वाले वर्षों में 200 वर्ष पुराने, ढाई सौ वर्ष पुराने एक इतिहास का गठन करें. वंदे मातरम का राजनीति करके दुरुपयोग ना करें.
उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए यह ऐतिहासिक दिन है. गौरव शाली दिन है जब हम वंदे मातरम की 150वीं जयंती पर चर्चा कर रहे हैं. वंदे मातरम की महिमा को जन-जन पहुंचाने के लिए यह चर्चा है. हम सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती मना रहे हैं. हम भगवान बिरसा मुंडा जी की 150 वीं जयंती का उत्सव मना रहे हैं. गुरु तेग बहादुर सिंह जी के 350वां शहीदी दिवस को जन्म जन्म तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माता भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई जी का जन्म शताब्दी वर्ष में मना रहे हैं. ऐसे में वंदे मातरम के 150 सी जयंती का उद्घोष निश्चित रूप से हम सबके लिए प्रेरणा दाई है. वंदे मातरम केवल शब्द नहीं है यह महामंत्र है यह वह मंत्र है जिसे बोलकर देश की आजादी में नौजवान हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए. यह वह महामंत्र है जो एक-एक युवा के रग-रग में देशभक्ति का जुनून, देशभक्ति का जज्बा पैदा करता है. यह वह शब्द है जिसने देश की आजादी में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. आज भी हमारे देश के सैनिक देशभक्ति का जज्बा लेकर युद्ध के मैदान में जाते हैं वंदे मातरम का जयघोष करते जाते हैं. हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की तरह वंदे मातरम के 150 सी जयंती भी महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि वंदे मातरम के सौ वर्ष पूरे होने के समय देश में आपातकाल इमरजेंसी लगी थी. उसे समय भी वंदे मातरम करने वालों को ऐसी यात्रा दी गई जैसे अंग्रेजो के जमाने में भारतीयों ने इस तरह से प्रताड़ना झेली थी. केवल और केवल अपनी सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल लगा दिया गया. देश के संविधान की हत्या हुई. लोकतंत्र की हत्या हुई. हजारों, लाखों लोगों को जेल के पीछे धकेला गया. मीडिया तक की स्वतंत्रता छीन ली गई. यह वंदे मातरम की रचना की जयंती हमेशा 7 नवंबर 1875 को मानते हैं. वह कितना पवित्र दिन था. उसे दिन अक्षय नवमी थी भारतीय संस्कृति में यह अक्षय नवमी का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण और पावन दिन माना जाता है. उप मुख्यमंत्री श्री साव ने कहा कि हमें उन परिस्थितियों, किन कठिन समय में बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम गीत की रचना की उसको भी ध्यान में रखना चाहिए. उस समय अंग्रेजों का अत्याचार चरण पर था. अंग्रेज घर-घर तक अपना राष्ट्रीय गीत पहुंचने तक लगे थे. वंदे मातरम गीत का महत्व केवल देश की आजादी तक ही सीमित नहीं है वर्णन हमारी भारत माता हैं, तब तक वंदे मातरम का महत्व रहेगा. वंदे मातरम क्या है,.. माता की आराधना.. माता की पूजा.. माता को नमस्कार करना माता को सम्मान देने का.. यह शब्द है. इस पर भी लोगों ने राजनीति की. इस पर भी अपनी कुत्सित मानसिकता दिखाई. आज देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने वंदे मातरम के माध्यम से देश को एकजुट करने, देश को आगे बढ़ाने, देश को जोड़ने का एक बड़ा उपक्रम शुरू किया है.उनके इस अभियान में पूरा देश उनके साथ खड़ा है. उन्होंने कहा हम छत्तीसगढ़ में अपने राज्य गीत में भी माता की पूजा करते हैं. महू पांव परव तोर भुईया.. जय हो.. जय हो छत्तीसगढ़ी मैया. यह हमारी संस्कृति का परिचायक है.यह हमारी सभ्यता का परिचायक है. माता की आराधना करना हमारी संस्कृति और हमारी परंपरा का हिस्सा है. रामानंद चट्टोपाध्याय जी एक राष्ट्रवादी चिंतक थे उन्होंने कहा था कि यदि वंदे मातरम गीत को विभाजित किया जाएगा तो यह देश विभाजित हो सकता है. लेकिन ऑन सोते हैं 37 में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक होती है और पंडित नेहरू इसकी अध्यक्षता करते हैं मोहम्मद जिन्ना के दबाव में वंदे मातरम के केवल दो पद स्वीकार किए जाते हैं वह चार पद अलग हटा दिया जाता है. आखिर इन चार पदों में है क्या... इनमें भी माता की ही आराधना है... माता की स्तुति है.. उसे पर भी आपत्ति की गई.. वहां पर भी तुष्टिकरण.. क्या यह उन वीर शहीदों जिन्होंने वंदे मातरम कह कर फांसी के फंदे को चुमा उनके लिए अपमानित करने वाला नहीं है. किसी को खुश करने के लिए...किसी के दबाव में आकर.. वंदे मातरम गीत के चार पदों को छोड़ दिया गया.. वंदे मातरम लाहौर में भी गाया गया है. देश के प्रधानमंत्री विदेश में इथियोपिया में थे. उनके सम्मान में कार्यक्रम हुआ. सात समुंदर पार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के सम्मान में जो कार्यक्रम हुआ उसे कार्यक्रम में तो यूथोपीयन गायको ने वंदे मातरम गाया. सात समुंदर पार वंदे मातरम की महिमा गई जा रही है और हिंदुस्तान में कई लोग जिस देश की मिट्टी, जिस देश की धरती पर रहते हैं, जहां का अन्न खाते हैं..उस धरती की वंदना करने से भी दिक्कत.. उसे धरती को प्रणाम करने में भी दिक्कत है. उन्होंने कहा कि यह इस देश में नहीं चलेगा. वंदे मातरम का सम्मान सभी को करना चाहिए. वंदे मातरम वही महामंत्र है जिसके कारण आज फिर भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है. यह वह ताकत है यही वह शब्द है जिससे प्रेरणा लेकर आज देश आगे बढ़ रहा है. सब इसका सम्मान करें और उन वीर शहीदों के सपनों को साकार करने के लिए एक विकसित भारत एक समृद्ध भारत के निर्माण के दिशा में सब मिलकर काम करें.
विपक्ष के सदस्य देवेंद्र यादव ने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर बात रखने का अवसर मिलने के लिए आसंदी को धन्यवाद देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी के कथन मां के मां के एक समान के भाव से चलता है लेकिन, दूसरी तरफ,एक दूसरे को जाति धर्म वर्ग में बांटकर राजनीति करने की भी कोशिश हो रही है. उन्होंने कहा कि भारत माता हम,सबसे बनती है. एक विचार को ठोकने का प्रयास इस देश के अंदर लगातार किया जा रहा है और यह विचार केवल और केवल तोड़ने का है जोड़ने का नहीं है. हम सब नागरिकों के लिए न्याय स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व सुनिश्चित करने की बात करते हैं. आज यूएसबीऔल भावना जो संविधान में बनाई थी संविधान सभा ने बनाई थी जिसमें महात्मा गांधी जी जवाहरलाल नेहरू जी सुभाष चंद्र बोस जी जिससे हर किसी के विचारधारा और विचार थे जिससे लिफ्ट के भी लोग थे राइट पार्टी के लोग भी थे. उस हर कोई थे और उन लोगों ने मिलकर एक भारत का विचार प्रस्तुत किया था जिसको संविधान के रूप में रहते हैं और जिसको हम भारत की आत्मा के रूप में जानते हैं आज उसमें बंधुत्व और समानता की बात कही गई है तो आज 75 साल बाद इस देश में क्या हो रहा है.भारत के लोगों को को विभाजित करने के जैसी बात कर रहे हैं और यह संविधान के खिलाफ है. भारत की आत्मा के खिलाफ है. याद तो दिलाना पड़ेगा कि कांग्रेस पार्टी के पूर्वज.. अंग्रेजों के सामने.. सीना तानकर खड़े रहते थे और 10-10 साल जेल में रहे हैं.
उप मुख्यमंत्री गृह मंत्री विजय शर्मा ने विषय पर बोलते हुए कहा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 26 अक्टूबर को अपने मन की बात में उल्लेख किया कि वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं और उसके बाद से ही वंदे मातरम को लेकर पूरे देश में विभिन्न कार्यक्रम प्रारंभ हुये. हम सब देश में विडंबना देखते हैं कि हमारे ही देश में बहुत से लोग हमारे ही परंपराओं को, हमारी ही मान्यताओं को, हमारे ही प्रतिमानों को दूषित करने के लिए, कमतर आंकने के लिए कोशिश भी करते हैं. इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि वंदे मातरम के 150 वर्ष पर संपूर्ण देश का गौरव गान करें आप पूरा इस देश की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़े विशेष रूप के साथ नंबर 1875 का वर्ष था जो सियालदाह से नैहाटी ट्रेन से एक घंटे का रास्ता है. उसमें चट्टोपाध्याय जी बैठे थे. उन्होंने यात्रा करते-करते इस जीत की रचना पूरी की.वास्तव में वंदे मातरम राष्ट्रीय अस्मिता का गौरव गान है.इतिहास भी साक्षी है कि कांग्रेस के ही अधिवेशन में गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने वंदे मातरम गीत का दान किया था और कैसे सन 1923 में कांग्रेस के ही अधिवेशन में वंदे मातरम का विरोध हुआ था. उसे विरोध को स्वीकार कर लेने से ही वहीं से तुष्टीकरण के डाली थी की शुरुआत हो जाती है.बस सारे ही तरह के विभीषिकाओ की वहीं से शुरुआत हो जाती है कि कैसे भारत के सांस्कृतिक उत्थान को छोड़कर भारत के गौरवशाली परंपरा,गौरवशाली महान इतिहास को छोड़कर यह मान लिया जाए कि भारत में सब चलता है भारत में कैसे भी विषय को आगे बढ़ाया जा सकता है को स्वीकार करने की शुरुआत हो जाती है. कांग्रेस का अधिवेशन प्रमाणिक चीज है. मैं कुछ अलग से नहीं कह रहा हूं. उस समय इस देश को ऐसे दोराहे पर ले जाकर इस तरह से छोड़ देना, इस तरह एक ऐसे रास्ते को पकड़ना जो सिर्फ तुस्टीकरण के लिए उपयोग किया जाए अगर उस समय यह नहीं हुआ था तो वे यह सोचते हैं कि आज ना बांग्लादेश होता,ना पाकिस्तान होता, हमारा भारत देश उतना ही बड़ा होता, जितना उस समय, अंग्रेजों के समय हुआ करता था, एक गीत के विरोध और विभाजन से देश का विभाजन भी जुड़ा हुआ है. आज इस बात की चिंता करना है, इस बात को सोचना है, आज इस बात पर चर्चा करना उतना ही आवश्यक है कि देश के युवाओं में इस बात का ध्यान होना चाहिए कि भारत की महान सांस्कृतिक परंपराएं, भारत का सांस्कृतिक साम्राज्य. जिस तरह पहले भौगोलिक विस्तार उतना ही विस्तृत हुआ करता था परंतु आज भौगोलिक तौर पर ना सही सांस्कृतिक विरासत भारत का आज भी उतना ही समृद्ध है. उन्होंने कहा कि हमको याद है कि पाक अधिकृत कश्मीर में माता सरस्वती का मंदिर है. हमको याद है कि ढाका में ढाकेश्वरी माता का मंदिर है.हमको याद है कि पाकिस्तान के अनेक स्थानों पर लव कुश की नगरी है. पाकिस्तान में अनेक स्थानों पर भारत के सांस्कृतिक परंपराओं की पहचान आज भी है. राष्ट्रगीत वंदे मातरम देश के युवाओं का भारत माता के लिए यशोगान है.भारत का यह गौरव गान है.यह सनातनी प्रतिमानों के लिए गाया जाने वाले गीत है. गृह मंत्री श्री शर्मा ने कहा के अगर इस गीत को वर्ष 1923 में ना छोड़ा गया होता, राधा किया गया होता तो देश का स्वरूप ही कुछ दूसरा होता. जो कुछ हुआ है आने वाले समय में इतिहास फिर से लिखा जाएगा.फिर से भारत अपने उस पुरानी उपलब्धियां को पुरानी प्रतिष्ठा को, पुराने क्षेत्र को सब कुछ प्राप्त करेगा. परंतु आज इसके मूल में यह आवश्यक है जब 150 वर्ष हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ी अच्छा ही परंपरा की शुरुआत हुई है कि आज हम इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं और आने वाले समय भी भी युवाओं की प्रेरणा के लिए यह आवश्यक है हमारे देश और समाज के लिए आवश्यक है. देश में इन पुरानी बातों को ध्यान करके आने वाले समय के लिए हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं इस विषय के लिए भी आवश्यक है.
सदस्य राघवेंद्र कुमार सिंह ने विषय पर बोलते हुए सदन में कहा कि उन्हें बहुत अच्छे विषय पर बोलने का अवसर मिला है. हम लोग बहुत सकारात्मक दृष्टिकोण से यहां है कि एक अच्छी चर्चा होगी. शहीदों को याद किया जाएगा वंदे मातरम पर चर्चा होगी. लेकिन तीन-चार शब्द और आरोप, बार-बार तुष्टिकरण, काट दिया गया, स्वरूप कुछ और होना चाहिए था इस तरह की कई बातें सामने आई है. इतिहास हमें बताता है कि वर्ष 1875 में बैंक बाबू ने जब यह राष्ट्रगीत लिखा तो बंगाल और संस्कृत में लिखा गया और बाद में 10 साल बाद आनंद मठ में इसकी बात सामने आई और हम लोग भाग्यशाली है कि इसकी दोनों सबसे पहले रवींद्रनाथ ठाकुर जी ने बनाई. वर्ष 1905 में जब अंग्रेज सरकार के खिलाफ बंगाल विभाजन में जन आक्रोश था,तो यह हम सबको पता है कि यही वंदे मातरम एक हथियार के रूप में सामने आया.एक हथियार के रूप में काम किया जिसने हिंदू, मुसलमान, ईसाई सभी को साथ में जोड़ा और सभी साथ में जोड़ने के बाद उस लड़ाई को लड़ा गया. कांग्रेस के अधिवेशन में इस गीत को गाए जाने पर लोगों को पीटा गया. जब यह बात पूरे देश में फैली और यह वंदे मातरम गीत हर जगह गाए जाने लगा कांग्रेस पार्टी की हर अधिवेशन में,हर कार्यक्रम में यह सामने आया. चाहे वह भगत सिंह हो सुखदेव हो हमारे राजगुरु हो बिस्मिल्लाह,अशफ़ाकउल्ला खान हो सबने वंदे मातरम गाकर शहादत दी. और सबको एकजुट करने का काम किया लेकिन उसे समय भी कुछ लोग थे जो इस अलगाव की राजनीति को बढ़ावा दे रहे थे. रविंद्र नाथ टैगोर जी ने ही इस बात को सुखाया था कि क्यों ना हम उस भाग को अलग रखें ताकि इससे किसी की भावनाएं आहत न हो. मुख्य आपत्ति धर्म के नाम पर भी थी. कुछ मुसलमानों को भी थी, कुछ सिख्खों को भी थी. जैन,ईसाई,किसी को भी हो सकती थी. लेकिन स्वतंत्रता की लड़ाई में यह जरूरत थी कि सब साथ में आए. कोई अलग नहीं जा सकता था क्योंकि अलग जाने का मतलब था कि हमें स्वतंत्रता नहीं मिलती. यहां हर धर्म का सम्मान है.हम अपना धर्म किसी और के ऊपर क्यों थोपे.? हम किसी को क्यों कहें कि आपको कैसे पूजा करनी है? और कोई और मुझे क्यों बतायेगा कि मैं हिंदू हूं मैं कैसे पूजा करूंगा..? यह मेरा और मेरे भगवान के बीच का रिश्ता है. यह ठोकने की राजनीति बंद होने की आवश्यकता है. अगर दो छात्र से पूरा देश एक हुआ तो आज हम उसमें तुष्टिकरण की राजनीति करना बार-बार उसके बारे में बोलना नेहरू जी के बारे में बोलना मैं उससे सहमत नहीं हूं. उन्होंने राष्ट्रगीत वंदे मातरम की लाइनों को उदित करते हुए कहा कि इसका मतलब है कि मातृभूमि को नमन. यह वह भूमि जो, जल से भी, फल से भी परिपूर्ण है. जो हरी -भरी है, समृद्ध है, पवन शीतल है.आज हम लोग हरदेव को काटकर इस शीतल को खराब करने का काम भी कर रहे हैं. हमें यह भी सोचना पड़ेगा कि जब हम इसके बारे में बात करते हैं तो हमें अभी की परिस्थिति के बारे में भी सोचना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी के सभी अधिवेशन में, राष्ट्रीय दिवसों में, अन्य औपचारिक कार्यक्रमों में हमेशा से वंदे मातरम गीत गया गया है . इस जीत के माध्यम से हम उन शहीदों को भी याद करते हैं आजादी की लड़ाई को बिहार करते हैं और हम यह भी देखते हैं कि आजाद होने के बाद देश को कहां देखना चाहते हैं सबसे पहले आज उसकी बात हो रही है उसको तुस्टीकरण बताया जा रहा है. वर्ष 1950 में जब संविधान सभा ने डॉक्टर अंबेडकर की अध्यक्षता में इसको जब स्वीकार किया है तो आज उसके ऊपर कोई बात होगी नहीं. उसे समय के हालात और आज के हालातो में बहुत फर्क है. उसे समय कैसे हालात थे, किस लिए यह डिसीजंस लिए गए, हमें उनको सम्मान देना होगा.
सदस्य किरण देव ने कहा कि राष्ट्रगीत वंदे मातरम पर चर्चा बहुत बड़ा विषय है. जब वंदे मातरम और भारत माता की जय का विषय आता है तो मैं बहुत गौरव के साथ इस बात को कहता हूं हमारा देश पूरे विश्व में एक बात है देश है जिसको माता का दर्जा दिया गया है वरन किसी देश को माता का दर्जा नहीं दिया गया है. आजादी के समय से वंदे मातरम के साथ हमारा देश हमारी माता की स्तुति, उसका ज्ञान उसके साथ कई बातें जुड़ी हुई है. वंदे मातरम के 150वे वर्ष को केंद्र की भारत सरकार ने तय किया है कि हम इसे सब मिलकर पूरे साल भर उत्सवपूर्वक मनाएंगे. उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि वंदे मातरम जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा के लिए सभी लोग सदस्य उपस्थित हैं.इस विषय की चर्चा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी लोग अपना विषय रख रहे हैं. उस समय हमारा भारत देश अंग्रेजी शासन की बेडियो में जकड़ा हुआ था और सब में घनघोर निराशा थी.ऐसे में वंदे मातरम गीत ने हमारे युवाओं में एक ऊर्जा पैदा करने का काम किया. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी इसके रचयिता है. इस वंदे मातरम के पूरे पदय को देख लिया जाए,पूरे गीत को देख लिया जाए तो इसमें बांग्ला शब्द और संस्कृत शब्द का समावेश है. भारत देश की विविधता,संस्कृति स्वतंत्रता संग्राम, हमारे देश की सभ्यता देश का कल्चर उसको पुनर्स्थापित करने की दृष्टि से इस गीत ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उन्होंने कहा कि हम अपने किसी भी कार्यक्रम किसी भी योजना आयोजन की जब शुरुआत करते हैं या जब कुछ बोला जाता है तब उसकी शुरुआत भारत माता की जय से होती है. हमारा देश सर्वोपरि है.राष्ट्रीय ही सर्वोपरि है और यह हमारा मूल मंत्र है. नेशन फर्स्ट, फिर दल, फिर हम... भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों की शुरुआत भारत माता की जैसे होती है और वंदे मातरम से हम उसका समापन करते हैं. हमें वंदे मातरम गीत से संवैधानिक मूल्यों का सम्मान,लोकतंत्र और राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति निष्ठा रखने की प्रेरणा मिलती है. यह बड़े प्रसन्नता की बात है कि हम इसी वर्ष हमारे प्रेरणा स्रोत हमारे आदर्श देश के यशस्वी पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई जी की भी सौवीं जयंती मना रहे हैं यह पूरे वर्ष तक चलेगा. रन फॉर यूनिटी के भी कार्यक्रम है. वंदे मातरम जो कहीं खोया हुआ प्रतीत होता था हम उसकी 150वीं जयंती मना रहे हैं. साल भर गौरवपूर्ण कार्यक्रम होगा.कुल मिलाकर 2025 और वास्तव में हम जिस पीरियड में चल रहे हैं उसके लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण है.
सदस्य विक्रम मंडावी ने कहा कि यह पूरा सदन हम सभी उस पावन गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर सदन में चर्चा कर रहे हैं.वन्दे मातरम गीत पूरे भारत देश के सभी भारतवासियों की पहचान है. और वंदे मातरम में कोई भेदभाव नहीं. इस भारत में जो भी व्यक्ति जिसने वर्ग का या जिस भी समाज का रहता है जो भारत देश को मानता है वह वंदे मातरम को मानता है. वंदे मातरम के साथ हमारा,राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का जो अटूट और ऐतिहासिक सम्बन्ध रहा है उसको कोई भी झूठला नहीं सकता. इतिहास के पन्ने इस बात के भी साक्षी हैं कि 1896 के कोलकाता अधिवेशन में राशि का महात्मा गांधी की उपस्थिति में गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर जी ने पहली बार कांग्रेस के मंच से स्वर् बद्ध किया था और 24 जनवरी 1950 को जब संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगान के सम्मान का दर्जा दिया तब डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने इसके सम्मान की गरिमा को संवैधानिक के रूप से स्थापित किया.इसी वंदे मातरम गीत ने हमारे क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से लड़ाई लड़ते हुए फांसी के फंदे पर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ाने की शक्ति दी. जब हमारा देश अंग्रेजों से लड़ाई लड़ रहा था पूरा देश एकजुट होकर लड़ाई लड़ रहा था तो जो आज देशभक्ति का पाठ पढाने की बात करते हैं उस समय उस विचारधारा के लोग कहां पर खड़े थे किसके साथ खड़े थे यह भी आप हम सब और पूरा देश जानता है. अच्छी बात है चर्चा होनी चाहिए इसका हम सभी स्वागत करते हैं लेकिन कहीं ना कहीं ऐसा भी लगता है कि अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए भी इसका कहीं ना कहीं उपयोग किया जा रहा है जो की उचित नहीं है. आज प्रदेश के लाखों किसान धान खरीदी केदो पर बारदाने सहित तौल नहीं होने की वजह से भुगतान के लिए बहुत ज्यादा परेशान हो रहे हैं और उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है. हरदेव अरण्य से आदिवासियों को उजाड़ा जा रहा है. विजन 2047 और भावनात्मक मुद्दों की आड़ में कहीं राज्य की बढ़ती बेरोजगारी,बढ़ता कर्ज और गिरती कानून व्यवस्था की ओर से जनता का ध्यान भटकने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है. हम सभी राष्ट्रगीत वंदे मातरम जो आजादी से लेकर आज तक लोगों के बीच में नई प्रेरणा देता रहा है उस गीत के साथ हम सभी उसी भाव से है और उसका सम्मान करते हैं.
वरिष्ठ मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि यह वंदे मातरम है जिसको गाकर ना जाने कितने लाखों क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए, इस देश की खातिर हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़कर अपना प्राण न्यौछाँवर कर दिया. आज जब वंदे मातरम पर चर्चा हो रही है तो यह भी है कि आज कहीं ना कहीं एक तरह से एक रेखा तो खींच गई है कि भारत में रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह गूंज रहा है तो कहीं ना कहीं ऐसे लोग हैं जो भारत में रहकर इस देश में,इस देश की मिट्टी, इस देश की जो विशेषता है उसको सम्मान न देते हुए हम यदि बांग्लादेश और पाकिस्तान का गुण गांएगे..तो ऐसे लोगों को क्या सबक सिखाना चाहिए.वंदे मातरम गीत,हमारे राष्ट्रीय भावनाओ को मजबूत करने का एक विजन है.भारत माता की वंदना,उसकी सुंदरता,उसकी शक्ति, समृद्धि उसके गुणगान करने का एक गीत है. वंदे मातरम के सम्मान का जो भाव होना चाहिए वह भाव नहीं होने की वजह से राष्ट्रीय पार्टी नीचे गिर जा रही है. धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा जी के बारे में भी यह सोचा गया कि ट्रायबलों का कोई भगवान और कोई नेता ही नहीं है. ऐसा ही किया जाता रहा है. उन्होंने कहा कि देश में ऐसे बहुत सारे जनजाति वर्ग हैं ऐसे भी बहुत सारे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाईयां लड़ते-लड़ते अपने को समूल नष्ट कर दिया. ऐसे बहुत सारे महापुरुषों को इतिहास में कहीं जगह नहीं मिली. आज केंद्र की सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व वाली सरकार ने उनका इतिहास में जगह दिलाने के लिए काम किया है इससे हमारा वंदे मातरम गीत जो गाया जाता है वह भी सार्थक हो रहा है. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि आज नक्सल समस्या बस्तर हो या देश के बाकी राज्यों में हो क्यों हुआ...? क्योंकि उन्हें वंदे मातरम के भाव नहीं थे. वंदे मातरम का भाव होता तो यह नक्सली समस्या नहीं हुई होती. देश में आतंकवादी नहीं होता. स्वतंत्रता आंदोलन में 1905 से 1942 तक क्रांतिकारियों, सत्याग्रहियों और छात्र आंदोलनों में वंदे मातरम प्रमुख स्वर रहा. आज हम हमारी मातृभूमि के लिए वंदे मातरम नहीं गा सकते हैं तो क्या कर सकते हैं...? वंदे मातरम गीत को किसने रोका यह भी तो देश की जनता को जानने का अधिकार है.. जानना चाहिए. इसी सब बातों के लिए यह चर्चाएं हो रहे हैं हम हर जगह में गाते हैं की राष्ट्र की जन चेतना के गान वंदे मातरम,झल्लरी झंकार, झंनके नाद, वन्दे मातरम तो, हमारी तो हर जगह हर स्थल पर हम लोग वंदे मातरम के गान के बाद ही किसी कार्यक्रम की शुरुआत करते हैं. तुष्टिकरण के आधार पर मातृ भूमि की वंदना को क्या रोक दिया जाएगा. तुष्टिकरण का ध्यान रखते हुए वोट की राजनीति के आधार पर आप वंदे मातरम को छोड़ देंगे..इस तरह की सोच रखने वाले को धिक्कार है. अगर हिंदुस्तान में रहने वाला राष्ट्रगीत नहीं गा सकता.. राष्ट्रगान नहीं कर सकता तो ऐसे लोगों को यहां रहना चाहिए क्या.. कार्रवाई होनी चाहिए.. देश से निकाला होना चाहिए.
सदस्य श्रीमती संगीता सिन्हा ने कहा कि वंदे मातरम के 150 साल पूर्ण होने के बाद असर पर यह विशेष सदन में आया है आज बहुत गर्व का दिन है.यह बहुत खुशी का दिन है. हम एकजुट हुए हैं छत्तीसगढ़ राज्य को मजबूत बनाने के लिए... छत्तीसगढ़ राज्य को हम कैसे समृद्धि की ओर ले जाएं..हम कैसे आगे बढ़े.. हम देश के लिए क्या कर सकते हैं.. हमने दूरदर्शन के माध्यम से वंदे मातरम गीत को सुना है और समझा है और इससे हमारे जीवन में राष्ट्र प्रेम की भावना जागृत हुई है. जब हम वंदे मातरम,सुजलाम,सुफलाम मलयज,शीतलाम सुनते है तो हमें अपने आप पर गर्व होता है.हममें अपने आप देशभक्ति जागृत होती है.
सदस्य मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि यह सिर्फ वंदे मातरम गीत के वर्षगांठ का अवसर नहीं है बल्कि यह भारत के राष्ट्रीय चेतना के जागरण सांस्कृतिक स्वाभिमान और स्वतंत्रता की साधना के 150 वर्षों का उत्सव है. वंदे मातरम के जय घोष ने देश की आजादी के आंदोलन को बड़ी ऊर्जा दी इस सदन में इसका स्मरण करना हम सब का बहुत बड़ा सौभाग्य है. तब महान क्रांतिकारी लोक मान्य तिलक जी ने कहा था कि वंदे मातरम भारत की आत्मा की आवाज है. अरविंद घोष ने इसे राष्ट्रीय मंत्र कहा. महात्मा गांधी जी ने भी इसके भावनात्मक महत्व को स्वीकार किया. वंदे मातरम केवल अतीत का स्मरण नहीं है बल्कि यह भविष्य के लिए एक आवाहन है. हमारी जिम्मेदारी है कि विकसित भारत 2047.. तक पहुंचने की भावना को आत्मनिर्भर भारत, सक्षम भारत, और स्वच्छ भारत के निर्माण में परिवर्तित करें.
सदस्य श्रीमती चातुरी नंद ने छत्तीसगढ़ी भाषा में बोलते हुए कहा कि आज हम सब लोग अपने देश के सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रगीत वंदे मातरम के ऊपर चर्चा कर रहे हैं.वंदे मातरम राष्ट्रीय एकता का यंत्र है. उन्होंने इसके पहले दो लाइन प्रस्तुत करते हुए कहा मया से भरे मोर देश, सबसे मयारू मोर देश, दुनिया जेखर गर्व करें, ऐसन सितारा मोर देश.
श्रीमती चातुरी नंद ने कहा कि वंदे मातरम को 24 जनवरी 1950 में राष्ट्रीय गीत के रूप में दर्जा मिला लेकिन इसके पहले कांग्रेस ने इस से पहले सन 1937 में राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार कर लिया था. यह गीत न केवल हमारे आन बान शान का प्रतीक है बल्कि देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति प्रेम का प्रतीक है. इस गीत का पहला 15 कितना में रखा गया था हम अपने देश की वंदना करते थे इस गीत के माध्यम से. इसे आगे चलकर वंदे मातरम नाम दिया गया. बंकिम चंद चटर्जी जीने इस गीत को लिखते समय अपनी माता के साथ भारत माता को ध्यान में रखा. इसे राष्ट्रगीत का दादा दिलाने के लिए महात्मा गांधी जी ने स्वयं समर्थन दिया और प्रयास किया. अंग्रेजों का अत्याचार इतना अधिक था कि ब्रिटिश शासन काल में इस गीत को गुप्त रूप से गाया जाता था. क्योंकि तब इस गीत को गाने वालों को कोड़ों से पीटा जाता था और मारपीट कर जेल में भी डाल दिया जाता था. वंदे मातरम में सुजलाम सुफलाम मलयज सीताराम कहा गया है यह पंक्तियां भारत माता को अच्छा पानी देने वाली और अच्छा फल देने वाली भूमि के साथ-साथ भारत माता को मलय पर्वत के समान शीतल हवा प्रदान करने वाली भूमि के रूप में प्रतिस्थापित किया गया है. यह तीनों शब्द भारत माता के प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्धि के प्रतीक है. उन्होंने आव्हान करते हुए कहा कि इसे नष्ट करने का प्रयास नहीं होना चाहिए. वंदे मातरम कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था. यह गीत राष्ट्रीय एकता देश प्रेम, देशभक्ति का प्रतीक है. किसी पार्टी विशेष का नहीं है. वंदे मातरम हमेशा उन लोगों के द्वारा गाया गया जो लोग जेल गए,जेल में गोली खाये. जो लोग देश की खातिर हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए. वंदे मातरम की आवाज में हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सब लोग शामिल थे. वंदे मातरम नफरत नहीं बल्कि एकता का प्रतीक है. वंदे मातरम संविधान को कमजोर नहीं करता है बल्कि उसको मजबूत बनाता है. उन्होंने इन लाइनों को कहते हुए अपनी बात समाप्त की-- मोर छत्तीसगढ़ के माटी, मोर छत्तीसगढ़ के माटी. ते भारत मां के सांटी, मैं तोला नवावओं माथा, महतारी आती -जाती.
वरिष्ठ सदस्य अजय चंद्राकर ने इस पर बोलते हुए कहा कि हमें इस बात को समझना होगा कि आजादी की लड़ाई में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने वंदे मातरम को अंग्रेजों से लड़ने के लिए प्रमुख राजनीतिक हथियार क्यों बनाया. इसके साथ क्या पीड़ा थी. इससे राजनीतिक व्यक्तियों और धार्मिक व्यक्तियों को क्या प्रॉब्लम थी. भारतीय संविधान के प्रिंयबल्स में पंथनिरपेक्ष था आपातकाल में क्या आवश्यकता पड़ी..?जब संसद लंबित था.. सब चीजे लंबित थी.. विपक्ष जेल में था..आपने उसमें धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द जोड़ दिया. और वह भी बिना संसद की सहमति के... दूसरी बात है कि पूरे समय में एक स्पष्टीकरण देने की कोशिश की गई की साहब इसको गाया जाना चाहिए.. धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए... मां को इस संदर्भ में राजनीतिक बातें की जाती है तो कांग्रेस के ऊपर दृष्टिकोण क्या है.. उन्होंने कहा कि लोग, उन लोगों की पहली करते हैं कि हम वंदे मातरम के सम्मान में खड़े तो हो सकते हैं लेकिन गा नहीं सकते... देश में हमारे नेशनल सॉन्ग को संविधान सभा ने स्वीकार किया है उसको हम नहीं गाएंगे... यह कहा जाता है...?और आप दुनिया का कोई देश बताइए जिसमें ऐसी बातें हुई हो. किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े हुए लोग नेशनल गीत को नहीं गा सकते तो फिर छत्तीसगढ़ में राज्य गीत को स्वीकार किया गया... कोई आदमी अपने को राष्ट्र से ऊपर रखकर अपनी धार्मिक भावनाओं को जोड़े और हम कहें कि साहब इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए अब यह आपका विवेक पर है.सदस्य अजय चंद्राकर ने कहा कि जिस दिन वर्ष 1857 में 7 नवंबर को हमारे राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की रचना हुई उसे दिन कांग्रेस पैदा भी नहीं हुई थी. 1857 के गदर के समय बंकिम चंद्र चटर्जी की डिप्टी कलेक्टर थे और साहित्यकार थे. उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचार को देखा था. आपने एक आनंद मठ का उल्लेख किया. दुर्गेश नंदिनी, कपाल कुंडला, मृणालनी, और वृक्ष केंद्रा, चंद्रशेखर, कृष्णा कांतेय, बंग दर्शन वह यह पत्रिका निकालते थे. वह प्रेसीडेंसी कॉलेज के पहले स्नातक थे. इतने बड़े स्कॉलर थे. रिसर्च स्कॉलर के साथ उन्होंने डिप्टी कलेक्टर तक यात्रा की, लेकिन उस यात्रा में उनका मन नहीं लगा. 1857 की क्रांति के बाद जब कांग्रेस का जन्म नहीं हूआ था तो क्या यह राष्ट्र सो रहा था. यह राष्ट्र कभी नहीं सोया. राम सिंह जी का कूका विद्रोह वर्ष 1857 के बाद का है. भगवान बिरसा मुंडा 1857 के बाद के हैं. यशवंत बलवंत राव फड़के 1857 के बाद के हैं. ललित हुड़कन लचित बोलते हैं. वह असम के थे यह 1857 के बाद के है. यह देश छुटपुट लड़ाई तब भी लड़ते रहा है. अभी कविता प्राण लहरे जी कहां हैं. वर्ष 1776 में गुरुजी पैदा हुए राजा राममोहन राय के प्रयत्नों से 1818 से 1828 के बीच पहला सती प्रथा और बाल विवाह कानून बना. मैंने सबसे लगता है कि इतिहास के पुनर लेख की जरूरत है. गुरुजी से पहले छत्तीसगढ़ की धरती पर समाज सुधार का काम शुरू किया गया था. विद्यासागर जी कितने पढ़े लिखे लोग थे. यह 1857 के पहले के लोग थे जो भारतीय पुनर्जागरण का काम कर रहे थे. उन्होंने बाल्मीकि रामायण के राम और लक्ष्मण के बीच के संवाद... अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम उदारचरितानां तु वसुधाव कुटुंबकम. का उल्लेख करते हुए कहा कि अंधकार के उसे दौर में इस मातृभूमि में इस पृथ्वी में उनको जंगल नदी,पहाड़,पर्वत में इस पृथ्वी को इस भारत माता को उन्होंने साक्षात जगन माता के तौर पर देखा साक्षात देवी के स्वरूप में अनुभूत किया और उसके कलम से फूटी एक कालजयी रचना जिसको भारतीय साहित्य में भारतीय इतिहास में वंदे मातरम कहा जाता है मातृभूमि के प्रति समर्पण त्याग बलिदान,विज्ञान ज्ञान विज्ञान कला साहित्य भारत राष्ट्र के निरंतरता और उसकी चेतना को उद्घाटित करता इस देश का गान वंदे मातरम है.
उन्होंने सदन के सामने बात रखते हुए कहा कि निश्चित रूप से वंदे मातरम गीत को कांग्रेस के अधिवेशन में गाया जाता था. 1911 के बाद मौलाना शौकत अली ओरिजिनल ने उसका विरोध शुरू किया और विधिवत जिन्ना ने 1930 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी को चिट्ठी लिखी कि वंदे मातरम बिल्कुल नहीं चलेगा. वह जिन्ना जो एक पीढ़ी पहले प्रधानमंत्री था लियाकत अली जो प्रधानमंत्री बने वह एक विधि पहले प्रधानमंत्री थे आप इतिहास की किताब देख लें. इतिहास बड़ी संवेदनशील चीज है यदुनाथ सरकार अपने ढंग से देखते हैं प्रमिला थापर अपने ढंग से देखी हैं रामचंद्र गुहा अपने ढंग से देखते हैं हम असली तथ्य को देखते हैं जो आपने बनाया आपने लिखा है वह तथ्य क्या है. जिन्होंने विरोध किया नेहरू जी 1937 में सुभाष बाबू को पत्र लिखते हैं कि सब पूरा वंदे मातरम को स्वीकार करने से समाज का एक वर्ग नाराज हो सकता है. यहां से बीज पड़ती है. दृष्टिकोण क्यों क्लियर नहीं है. जब राष्ट्रवाद इस पूरी दुनिया में जहां जाए सिर्फ इसराइल घर को राष्ट्रवाद मत मानिए सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को मत कहें जर्मनी में क्या हो रहा है इटली में क्या हो रहा है कौन सी परियों जीत रहे हैं...? ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से बाहर क्यों हुआ वही राष्ट्रवाद था और वह राष्ट्रवाद आपके गले नहीं उतरता. आज भी 1945 में राजेंद्र बाबू ने जब घोषणा की इसको हम राष्ट्रगीत के तौर पर स्वीकार करते हैं और यदि पूरे को स्वीकार करेंगे तो तकलीफ होगी.जन गण मन की तरह इनको भी सम्मान दिया जाएगा. 1905 में बंग भंग का पहला आंदोलन हुआ था. इससे पहले हिंदुस्तान में राष्ट्रीय आंदोलन नहीं हुए थे. इसके बाद चौरी चौरा में बंद हो गया बहुत सारे आंदोलन हुए सविनय अवज्ञा आंदोलन हुआ नमक कानून आंदोलन हुआ आंदोलन की श्रृंखला बढी. उन्होंने कहा कि आजादी के लड़ाई में कांग्रेस की भूमिका की बहुत बात की जा रही है. कांग्रेस ने प्रथम युद्ध में भी अंग्रेजों का समर्थन किया. जबकि उसे समय के बहुत सारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंग्रेजों का समर्थन नहीं करना चाहते थे. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की बात आई सुभाष जी ने नेहरू गांधी और लॉर्ड इरविन राउंड टेबल तक का विरोध किया. उसे समय अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद जी हैं इसकी सूचना अंग्रेजों को किसने दी थी...? पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने हिंदुस्तान में संगीत की संस्थागत शिक्षा शुरू की. पूरे विरोध के बावजूद कांग्रेस के उसे अधिवेशन में जिन्ना के विरोध को बाजू रखकर उन्होंने वंदे मातरम का पूरा छंद गाया. कल उसका जी छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में चक्रधर जी के दरबार में संगीत सीखने आते थे. वंदे मातरम का उर्दू में अनुवाद हुआ हिंदी अंग्रेजी में अनुवाद हुआ लक्ष्मण श्री कवि बनी माधव विनोद कुमार तरंग इन्होंने भी अलग-अलग शब्द लिखे विदेश में भी मैडम कामा का उल्लेख हुआ. मदन लाल ढींगरा ने पेरिस में वंदे मातरम पत्रिका ही निकाली. गोपाल कृष्ण गोखले जब पहली बार गांधी जी के आमंत्रण पर पहुंचे उनका राजनीतिक गुरु कहा जाता है तो उनका स्वागत भी वंदे मातरम गान से हुआ. आज हिंदुस्तान भारत ऐसा देश हो गया है जहां हम नेशनल सॉन्ग को गाएंगे नहीं, सम्मान देने के लिए खड़े हो जाएंगे यह स्वर निकाले जाते हैं.. जो हमको स्वीकार नहीं है...


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