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जिस पुल के निर्माण के लिए ग्रामीणों ने किया था चुनाव का बहिष्कार, वह पांच साल बाद भी है अधूरा…

  गरियाबंद।  तेल नदी के सेनमुड़ा घाट पर निर्माणाधीन पुल का काम दोबारा शुरू करने 9 गांव के ग्रामीणों ने चुनाव बहिष्कार का एलान किया था. पांच ...

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 गरियाबंद। तेल नदी के सेनमुड़ा घाट पर निर्माणाधीन पुल का काम दोबारा शुरू करने 9 गांव के ग्रामीणों ने चुनाव बहिष्कार का एलान किया था. पांच साल बाद आज भी वह पुल अधूरा पड़ा है. समय के साथ ग्रामीणों के वोट से नेताओं की तकदीर तो बदल गई पर, यहाँ की तस्वीर नहीं बदल सकी.तेलनदी के सेनमुड़ा घाट पर भाजपा सरकार ने पुल बनाने के लिए 6 करोड़ 32 लाख की मंजूरी देकर जनवरी 2017 में कार्यदेश भी जारी कर दिया था. काम कराने की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क विभाग के सेतु निर्माण शाखा को दिया गया. विभाग ने राजधानी के गणपति कंस्ट्रक्शन के साथ काम का अनुबंध भी कर लिया. 325 मीटर लम्बे पुल की स्लैब ढलाई के लिये 14 खम्भे खड़े किए जाने थे. काम शुरू होता उससे पहले पुल तकनीकी पेंच में जा फंसा.तकनीकी अधिकारियों ने इस 10 पियर खड़े करने के लिये दूसरी डिजाइन की सलाह दिया. विभाग ने काम बंद कर नए डिजाइन तैयार करने भोपाल के आर्किटेक्ट को पेपर्स भेजे. दोबारा डिजाइन तय किया गया तो पूल की लागत बढ़कर 10 करोड़ हो गई. काम 2021 में दोबारा शुरू हुआ, लेकिन काम धीमी है. अब तक 14 में से 13 पियर खड़े हो चुके हैं. 200 मीटर से ज्यादा की स्लैब ढलाई भी हो गई है. बारिश के बाद काम शुरू होना था, जो अब तक नहीं हो सका है.

पांच साल बाद भी समस्या नहीं बदली

ग्रामीणों ने 2018 के चुनाव के पहले काम शुरू कराने 20 सितंबर को नदी में एकत्र होकर चुनाव बहिष्कार का एलान कर दिया था. कांग्रेस सत्ता में आई, अफसरों ने वायदे के मुताबिक काम दोबारा शुरू किया पर, लेकिन पांच साल में भी पुल को पूरा नहीं कर सके. लिहाजा 12 माह बहने वाले इस नदी में अब भी ग्रामीण बैगर पुल के भारी मशक्कत से नदी पार करते हैं.