तथाकथित आधुनिकता की फटी- मैली,दबी- कुचली, शोषित- व्यसनी चादर ओढ़ कर हम अपने आपको सभ्य, स्वतंत्र विचारवान प्रगति की ओर तेजी से बढ़ने वाला आधुनिक होने का नाटक जरूर करते हैं लेकिन समाज- परिवार का सच यही है कि दहशत, गुंडों के खूनी पंजे के साए में स्त्री महिला लड़कियों को छेड़छाड़ से बचाने, गुंडों के खूनी शिकंजी का शिकार होने से बचाने उसको घर में ही कैद कर देना, उसकी पढ़ाई छुड़ा देना, उसे किसी से मिलने जुलने पर रोक लगा देना, उसका कम उम्र में विवाह कर देना ही सबसे अच्छा उपाय समझा जाता है। इतिहास बताता है कि सोहला भी शताब्दी में भी यही होता रहा था और आज भी वैसे ही हालात जस के तस बने हुए हैं। पितृसत्तातमक सत्ता समाज की मानसिकता की जो खामियां हैं वह बुराइयां आज भी जस की तस बनी हुई है और हमारे बीच बार-बार उजागर होती रही है। हम इन सच्चाई यों को भले ही स्वीकार करने से बचते रहें, इसकी चर्चा में हिस्सा ना ले, ऐसा नहीं है, की दुहाई देते रहें लेकिन देश की 80% आबादी की वास्तविकता यही है। हमारा समाज, हमारी व्यवस्था,देश की सरकार तो एक तरफ महिला सशक्तिकरण का दावा करती आ रही है, लेकिन हर दिन ऐसी घटनाएं घट रही हैं जो बार-बार यह सवाल खड़े करती है कि महिलाएं आखिर कितनी सुरक्षित हैं? स्त्रियां ना तो स्कूलों में, ना महाविद्यालयों में, ना नौकरी करने के स्थानों पर ना अपने घरों में सुरक्षित नजर आती हैं ना ही अपने पास पड़ोस में सुरक्षित हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में 2021 में 1 जनवरी से 15 जुलाई के बीच महिलाओं के खिलाफ अपराध के 6,747 मामले दर्ज किए गए थे और 2022 में यह संख्या बढ़कर 7,887 हो गई।
2018 में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क बताया गया था. 193 देशों में हुए इस सर्वे में महिलाओं का स्वास्थ्य, शिक्षा, उनके साथ होने वाली यौन हिंसा, हत्या और भेदभाव जैसे कुछ पैमाने थे, जिन पर दुनिया के 193 देशों का आकलन किया गया था. भारत हर पैमाने में पीछे था. वहां औरतों के स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति सबसे खराब थी.
कानून से नहीं तो फिर कैसे रुकेंगे बलात्कार? कैसे बनेगा एक ऐसा समाज, जहां लड़कियां बेखौफ होकर घूम सकें, जी सकें. इस सवाल का जवाब कानून की किताब और एनसीआरबी के आंकड़ों में नहीं है. इसका जवाब है हमारे समाज और परिवार के पितृसत्तात्मक ढांचे में, जिसने मर्दों के लिए सारे विशेषाधिकार सुरक्षित कर रखे हैं और औरतों के लिए सौ नियम-कानून बनाए हैं.
जो बलात्कार होने पर लड़की के कपड़ों की इंक्वायरी करने लगता है. जो अपनी लड़कियों को बलात्कार से बचने के सौ सबक सिखाता है, लेकिन अपने बेटों को कभी नहीं सिखाता कि किसी लड़की के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए. जो छेड़खानी के डर से लड़कियों को घर में कैद कर देता है और लड़कों को छेड़ने के लिए सड़कों पर आजाद घूमने देता है.
जिस समाज ने अपनी इज्जत का सारा ठेका औरतों के सिर डाल दिया हो और जिस समाज में इज्जत बलात्कारी की नहीं, बलात्कार का शिकार होने वाली लड़की की जा रही हो. उस समाज में औरतों के लिए गरिमापूर्ण जगह मुमकिन नहीं. यही हैं वे सबसे जरूरी, सबसे बुनियादी सवाल, जिसे पूछे बिना और जिसका ईमानदारी से जवाब दिए बिना औरतों के लिए एक बेहतर और सुरक्षित समाज बनाने का सपना पूरा हो ही नहीं सकता.
औरतों के साथ सेक्शुअल और नॉन सेक्शुअल वॉयलेंस में हम अव्वल थे और भेदभाव करने में तो हमारा कोई सानी ही नहीं था. छह साल पहले भारत में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा पर एक रिपोर्ट तैयार करते हुए यूएन ने लिखा था, "यूं तो पूरी दुनिया में औरतें मारी जाती हैं, लेकिन भारत में सबसे ज्यादा बर्बर और क्रूर तरीके से लगातार लड़कियों को मारा जा रहा है."
2012 में निर्भया कांड के बाद हमें ऐसा लगा था कि महिलाओं की सुरक्षा का सवाल देश की प्रमुख चिंता बन गया है. रेप कानूनों को और सख्त करने की मांग हुई और उस मांग पर तत्काल अमल भी किया गया. जस्टिस जेएस वर्मा की अगुआई में बनी कमिटी ने 29 दिनों के भीतर जनवरी 2013 में 631 पन्नों की अपनी रिपोर्ट सौंपी.
रिपोर्ट आने के महज तीन महीने के भीतर अप्रैल 2013 में संसद के दोनों सदनों से पास होते हुए यह कानून भी बन गया. महिला सुरक्षा के सवाल पर जितनी तत्परता के साथ कानून में बदलाव हुआ, उसकी नजीर आजाद भारत के इतिहास में कम ही देखने को मिलती है.
कुछ वक्त के लिए तो सभी को यह यकीन सा हो चला था कि अब औरतों की स्थिति इस देश में बदलने वाली है. लेकिन अगले साल जब फिर से एनसीआरबी ने अपनी रिपोर्ट जारी की, तो पता चला कि औरतों के साथ हिंसा और बलात्कार की घटनाएं 13 फीसदी बढ़ चुकी थीं. उसके बाद से यह ग्राफ लगातार बढ़ता ही गया है. 2016-17 में अकेले देश की राजधानी में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा में 26.4 फीसदी का इजाफा हुआ था.
यह सारे तथ्य और आंकड़े एक ही सच की ओर इशारा कर रहे हैं कि अपनी महिलाओं को एक सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी देने में हम बुरी तरह विफल रहे हैं. सिर्फ छोटे शहरों, गांवों और कस्बों में ही नहीं, महानगरों में भी मेरे जैसी लड़कियां अंधेरा होने के बाद किसी खाली, अकेली सड़क पर चलने में डरती हैं. हमें हर वक्त इस बात का डर सताता रहता है कि हमारे साथ कभी भी कोई हादसा हो सकता है. हमारी बहुत सारी उर्जा सिर्फ खुद को सुरक्षित रखने में खर्च होती है. अगर किसी देश की आधी आबादी लगातार इस भय में जिए कि उसके साथ कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है, तो यह उस देश के लिए गौरव की बात तो कतई नहीं है.