0 भीषण गर्मी में औरी गांव को अब नहीं जूझना पड़ेगा जल संकट से पाटन,दुर्ग . असल बात news. 0 अशोक त्रिपाठी ...
0 भीषण गर्मी में औरी गांव को अब नहीं जूझना पड़ेगा जल संकट से
पाटन,दुर्ग .
असल बात news.
0 अशोक त्रिपाठी
0 फील्ड रिपोर्ट
चिलचिलाती गर्मी के आने की आहट से ही यहां सूखने लगता था गला.,माथे पर उभर आती थी चिंता की रेखाएं, मन में एक अनजाना भय पैदा होने लगता था कि अब इस गर्मी में न जाने क्या होगा...? कहां से मिलेगा पानी...? पानी के लिए अब न जाने,कहां-कहां भटकना पड़ेगा.. ऐसे सवालों के साए में जी रहे थे पाटन विकासखंड के बड़े औरी गांव के लोग...अब लग रहा है कि यहां के ग्रामीण ऐसी विकट परिस्थिति से उबर जाने वाले हैं.यहां लगभग 3:30 एकड़ क्षेत्र में बड़ा तालाब बन रहा है और इसका काम शुरू हो गया है.महत्वपूर्ण बात है कि क्षेत्र के सांसद विजय बघेल ने इस जन कल्याण के कार्य का बीड़ा उठाया है.इसमें स्थानीय ग्रामीण भरपूर सहयोग क़र रहे हैं.इस तालाब के निर्माण का कार्य के शुरु होने से यहां के ग्रामीण रहवासियों में एक नई आस जगी है. उन्हें उम्मीद बंधी है कि उनकी एक बड़ी समस्या हल होने जा रही है. गर्मी के कठिन दिनों में भी अब उन्हें अपने गांव में ही दैनिक जरूरतों के लिए पानी मिल सकेगा. सांसद विजय बघेल ने इस अवसर पर ग्रामीणों को पानी की बचत और वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने का संकल्प भी दिलाया है.
दुर्ग जिले का पाटन कृषि प्रधान विकासखंड है.यहां के कुछ क्षेत्र तो हैं जहां दोहरी फसल ली आती है. वहां खरीफ और रबी,दोनों सीजन में अच्छी फसल होती है.लेकिन यहीं के,कुछ कई सारे क्षेत्र हैं जहां लोगों को गर्मी के दिनों में भीषण जल संकट से जूझना पड़ता है.बारिश में भी इन क्षेत्रों में अच्छी बारिश नहीं होती.यहां ऐसे गांवों की संख्या कम नहीं है.यहां का बड़े औरी भी अभी ऐसा ही गांव हो गया है जहां गर्मी के दिनों में पानी के लिए त्राहि- त्राहि मचने लगी है. इस समय,लोगों को पानी के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.वैसे यह गांव कुछ वर्ष पहले तक पानी के मामले में काफी समृद्ध था. तब सुकून था.खुशहाली थी.इस गांव के बगल से ही एक बड़ा नाला होकर गुजरता है.इस नाले से,आज भी कई गांव के लोगों की प्यास बुझती है.इस नाले,से आज भी आसपास के 5-6 गांव में सिंचाई भी होती है और वह भूमि बड़ी उपजाऊ बन गई है.लेकिन समय बीतने के साथ बहुत कुछ बदलता जाता है. और आपको लगता है की नाला के किनारे स्थित इस गांव को जैसे किसी की नजर लग गई है.पहले जो नाला साल भर लबालब भरा रहता था,जिसे यहां के लोगों के द्वारा बारहमासी नाला कहा जाता था,और उसकी पूजा की जाती थी.अब जनवरी माह के बीतने के बाद उसमें जल कम होने लगता है.पानी सूखने लगता है. इस समय नाला का पानी के सूखते जाने के पीछे कई वजह है,कई परिस्थितियों हैं. लेकिन इसका दुष्परिणाम कुल मिलाकर,यहां के ग्रामीणों को ही भुगतना पड़ रहा है.फरवरी माह के बीतने के बाद से यहां निस्तार कार्य के लिए पानी का पूरे गांव में संकट दिखने लग जाता है.पानी की त्राहि -त्राहि मचने लग जाती है.भू-जल स्तर काफी नीचे चला जाता है. बोर में भी पानी कम आने लगता है.सूखने लग जाते हैं.
स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि सरकार की नल जल योजना यहां संचालित है.लेकिन गर्मी आते-आते वहां भी पानी कम हो जाता है.भूमि में ही जल कम हो जाता तो पानी कहां से मिले.स्थिति ऐसी होती है कि सरकारी बौर तथा तथा निजी बोर से पीने का पानी तो किसी तरह से मिल जाता है.गांव के जिस घर में बोर में पानी आता रहता है वह दूसरों को भी पानी आपूर्ति कर देता है.लेकिन नहाने-धोने तथा पशुओं के लिए पानी मिलना नामुमकिन जैसा हो जाता है.इस गांव की जनसंख्या लगभग 600 के आसपास है. ग्रामीण बताते हैं पाटन विकासखंड का यह ऐसा बड़ा गांव है जहां एक भी तालाब नहीं है.इसकी क्या वजह हो सकती है यह समझ से परे लगता है,लेकिन,हो सकता है और ऐसा बताया भी जाता है कि यहां पहले नाले में साल भर लबालब पानी भरा रहता था.बारह महीने पानी मिल जाता था तो लोगों को और पानी के किसी अन्य स्रोत की जरूरत महसूस नहीं हुई होगी.संभवत:यही वजह है कि यहां कभी कोई तालाब खुदवाने का प्रयास नहीं किया गया.और आज तक कोई तालाब नहीं है.
आबादी बढ़ती है,तो लोगों की ज़रूरतें बढ़ती जाती है तो परिवर्तन भी होने लगता है. जिस नाले में पहले साल भर पानी लबालब भरा रहता था और जिससे लोगों की,जल संबंधी सभी ज़रूरतें पूरी हो जाती थी वह नाला अब फरवरी महीने के आते आते सूखने लगता है.इस नाले का उदगम यहां समीर के ही,बेंद्री गांव से होता है और यह आगे जाकर खारून नदी में मिल जाता है.बेंद्री गांव के आसपास ही इसमें डायवर्सन किया गया है जहां से घुघवा, करसा,भांटागांव और बटंग औरी गांव की बड़ी कृषि भूमि सिंचित होती है.यह फायदा तो मिल रहा है लेकिन नाले के पानी का उपयोग बढ़ते जाने से यह गर्मी के दिनों में सूखने लगा है. यह संकट बन रहा है. अब,गर्मी के दिनों में तो इसमें ना के बराबर पानी रह जाता है.
स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि गर्मी के दिनों में भीषण जल संकट को देखते हुए यहां की बड़ी संख्या में लोगों ने इस गांव में तालाब के खनन के लिए तत्कालीन संसदीय सचिव श्री विजय बघेल से मुलाकात की थी तथा अपनी समस्याओं से अवगत कराया था.इसके बाद लगभग 12 साल पहले यहां तालाब बनाने का प्रयास शुरू किया गया था.तब जमीन भी चिन्हित कर ली गई थी और लगभग एक एकड़ क्षेत्र में तालाब बनाने का काम शुरू कर दिया गया था. लेकिन कुछ विरोध के चलते इस जमीन पर तालाब बनाने का काम रुक गया और बाद में इसमें सघन वृक्षारोपण कर दिया गया.
सांसद श्री विजय बघेल को इस गांव के लोगों की समस्या मालूम है कि यहां के लोगों को गर्मी के दिनों में कितने भीषण जल संकट से जूझना पड़ता है. अभी, हाल ही में, यहां के कई सारे ग्रामीणों ने उनसे मुलाकात की और उन्हें अपनी पीड़ा से अवगत कराया है. इसके बाद यहां एक नई शुरुआत हुई दिख रही है.सांसद श्री विजय बघेल ने अपनी नई पारी में इस गांव में पानी की समस्या के निराकरण के लिए नए सिरे से पहल शुरू की है और ग्रामीणों के सहयोग से यहां लगभग 3:30 एकड़ जमीन तालाब निर्माण के लिए मिल गई है.अब इसमें तालाब निर्माण का कार्य शुरू कर दिया गया है. यह कार्य शुरू होने पर सांसद विजय बघेल भी यहां पहुंचे और उन्होंने कार्य का निरीक्षण किया.बताया जा रहा है कि भारत माला प्रोजेक्ट में लगे अधिकारियों की टीम ने भी इस काम में सहयोग करने का आश्वासन दिया है और शुरुआती सहयोग किया है. सांसद विजय बघेल ने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने देश में "एक पेड़ मां के नाम"और "एक सोख्ता संतान के नाम" का नारा दिया है. इस नारे का व्यापक असर दिख रहा है. इस गांव में पानी संकट की गंभीर समस्या है. जिस गांव में बारहमासी नाला था. वहां पानी का संकट है. यह चिंता की बात है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों आती जा रही है.. क्यों हमारे जल स्रोत सूखते है. वह कहते हैं कि वह जहां भी जाते हैं सबसे पहले पानी बचाओ का नारा देते हैं. और हमारे जल स्रोतों को जीवित रखने,भू जल स्तर को गिरने से रोकने के लिए सोख्ता का निर्माण काफी उपयोगी साबित हो सकता है. वह प्रत्येक गांव में प्रत्येक परिवार से अपने घर में सोख्ता का निर्माण करने की अपील करते जाते हैं.
अब इस गांव में नई शुरुआत हुई है तो हो सकता है कि यहां जल की बचत, और उसे व्यर्थ बहने देने से रोकने के प्रयास शुरू होते दिख सकते हैं. इस तालाब निर्माण कार्य के शुरू होने के साथ स्थानीय ग्रामीणों ने भी संकल्प किया है कि वे सब मिलकर,अब गांव में भू जल स्तर ना गिरे,इसके लिए प्रयास करेंगे, वृक्षारोपण करेंगे तथा वाटर हार्वेस्टिंग के लिए प्रबंध करेंगे.गांव में अब एकजुटता दिख रही है.सभी लोगों के प्रयासों से यहां पानी की समस्या से निपटने का एक नया इतिहास लिखा जाता दिख रहा है. हो सकता है कि पाटन के इस गांव से निकला संदेश दूर-दूर तक जाए,..और आम लोगों में इससे वृक्षों के संरक्षण, पानी को बचाने की दिशा में जागरूकता आती दिख सके. तब इस बड़े तालाब का खनन अधिक सार्थक साबित हो सकेगा.








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