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पिछले विधानसभा चुनाव में 'नकारात्मक वोटिंग' चरम पर थी, इस बार क्या ?

 पिछले विधानसभा चुनाव में 'नकारात्मक वोटिंग' का था कहर, इस बार क्या ? सिर पर है "विधानसभा चुनाव" पिछले विधानसभा चुनाव में ...

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 पिछले विधानसभा चुनाव में 'नकारात्मक वोटिंग' का था कहर, इस बार क्या ?


सिर पर है "विधानसभा चुनाव"

पिछले विधानसभा चुनाव में सत्ता के खिलाफ मतदान "नकारात्मक वोटिंग" सत्ता परिवर्तन का बड़ा कारण रहा

"सबसे उल्लेखनीय और मजेदार बात है कि जिस चुनाव में जनता ने 'सत्ता' को इतनी बड़ी पटखनी दी, उसमें इतनी भारी एंटीइनकंबेंसी होने का  आचार संहिता लगने तक किसी को कोई आभास तक नहीं हो सका। दावे यही होते रहे कि इधर उधर से मिलाजुला का अंत में सरकार बन ही जाएगी। मतदाताओ ने भी शायद बता दिया कि उनकी लाठी में आवाज नहीं है, लेकिन दर्द तो होता है।"


रायपुर।

असल बात न्यूज़।।   


पिछले विधानसभा चुनाव में जिस तरह के परिणाम आए थे,सत्ता पक्ष के लिए ही नहीं विपक्ष को भी चौका देने वाले रहे थे। 'एंटी इनकंबेंसी', 'नकारात्मक वोटिंग' की ऐसी स्थिति थी कि, कहा जा सकता है कि सत्ता पक्ष के उम्मीदवारों को मतदाता, एक सिरे से खारिज करते गए। नकारात्मक वोटिंग, पिछले विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन का सबसे प्रमुख कारण बनकर सामने आई । यहां,उस समय जहां पहले चरण में चुनाव हुए थे उसमें भी 11 में से 10 विधानसभा सीटों पर सत्ता पक्ष को पराजय का सामना करना पड़ा था। दूसरे चरण के चुनाव में भी कमोबेश यही स्थिति थी। यह कहा जाता रहा है कि तब विपक्ष के भी तमाम वरिष्ठ लोगों को भी ऐसे बड़े जीत की उम्मीद नहीं थी। लोकतंत्र का यही करिश्मा है,कि जनता जिसे चाहे उसे 'सिर' पर बैठा ले और जिसे चाहे 'जमीन' पर पटक दे। कुल मिलाकर तब सभी विधानसभा चुनाव में नकारात्मक वोटिंग चरम पर नजर आई। छत्तीसगढ़ में लगभग प्रत्येक विधानसभा सीटों पर बड़े पैमाने पर नकारात्मक वोटिंग हुई। यह भी उल्लेखनीय है कि सत्ता पक्ष के जिन उम्मीदवारों को जीत मिल गई, उन्होंने भी बड़े वोटों के अंतर से जीत नहीं हासिल की है जबकि विपक्ष यानी कांग्रेस, के तमाम नए उम्मीदवारों ने भी लाखों के वोटों के अंतर से बड़ी जीत हासिल की। अब सवाल उठ रहा है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में कैसे हालात देखने को मिलेंगे। इतना तो तय माना जा रहा है कि पिछले चुनाव के जैसे इस चुनाव में उतने बड़े पैमाने पर नकारात्मक वोटिंग नहीं देखने को मिलेगी। 

राजनीतिक पार्टियों का चुनाव में हार जीत को लेकर अपना अलग अनुमान होता है और मतदाताओं का अपना अलग। कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं चाहेगी कि वह नकारात्मक वोटिंग को हावी होने दे, महत्व दे। जबकि मतदाता,नकारात्मक वोटिंग का परिणाम जानते हैं। उन्हें मालूम है कि किसी भी सरकार को बदलना है तो उसके खिलाफ जनता को भारी मतदान करना होगा। भले ही एक पार्टी को हटाने के बाद जो दूसरी पार्टी सत्ता में आती है वह भी उसे बहुत अधिक पसंद ना हो। लोकतंत्र में अभी सत्ता के लिए बहुत अधिक विकल्प नहीं होते हैं। कुछ ही लोगों के बीच से मतदाताओं को अपना प्रतिनिधि चुनना पड़ता है। लेकिन नकारात्मक वोटिंग से मतदाता उनके मन में जो 'कसक' होती है उसे जरूर निकाल लेते हैं। वैसे यह कहा जाता है कि नकारात्मक वोटिंग हमेशा किसी एक दल के प्रति ही नहीं बने रहते हैं। उसके जो कारण होते हैं वह स्थिर नहीं होते, बदलते रहते हैं। जनता जब सत्ता बदल देती है तो उसके बाद सत्ता में आने वाली नई राजनीतिक पार्टी के लिए भी परीक्षा की घड़ी होती है कि वह मतदाताओं के उम्मीदों पर खरा उतर सके। नकारात्मक वोटिंग से एक पार्टी को हटाने के बाद सत्ता में आने वाली नई पार्टी जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं करती तो मतदाताओं के नकारात्मक वोटिंग का रुख बदलने लगता है। 

पिछले बार के चुनाव में छत्तीसगढ़ में मैदानी इलाकों ही नहीं पहाड़ी क्षेत्रों अनुसूचित जाति जनजाति क्षेत्रों सभी सीटों पर नकारात्मक वोटिंग का व्यापक असर दिखा।भारतीय जनता पार्टी छत्तीसगढ़ में लगातार 15 वर्षों तक सत्ता में बनी रही थी। इस दौरान कई नए राजनीतिक समीकरण बनते और बिगड़ते रहे। कभी उसे सत्ता के खिलाफ जन आक्रोश के चलते सत्ता में आने का मौका मिला तो कभी दूसरे दलों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा और वे मतदाताओं का विश्वास जीतने में सफल नहीं रहे इससे भी सत्ता पक्ष को फायदा मिलता रहा। भाजपा के ही ढेर सारे लोगों का कहना है कि तीसरी बार पार्टी, सत्ता में आई तो सरकार और जनता के बीच की दूरियां बढ़ती गई। कार्यकर्ताओं से भी दूरियां बढ़ती गई। यह दूरियां बढ़ती जा रही थी और नकारात्मक वोटिंग का प्रतिशत भी बढ़ता जा रहा था। उस समय सत्ता का सिर्फ कुछ लोगों के हाथों तक सीमित हो जाना भी भाजपा के लिए काफी नुकसानदायक साबित हुआ। अच्छी बात यह रही भाजपा के बड़े नेताओं ने भी इन गलतियों को महसूस किया है और स्वीकार किया है।तब के मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह ने भी मीडिया के लोगों से बातचीत करते हुए स्वीकार किया कि सत्ता में 15 वर्षों तक रहने से लोग परिवर्तन चाहने लगे थे। हम कर सकते हैं कि अब इन बातों को 5 साल बीतने जा रहे हैं। अब हम नकारात्मक वोटिंग की बात करें और इस पर बात करें कि इसका वर्तमान सरकार पर क्या असर पड़ सकता है तो इसके पहले इस बारे में बात करना जरूरी है कि जो पिछले विधानसभा चुनाव में नकारात्मक वोटिंग कैसे की थी मतदाताओं के मन में अब उस बारे में क्या रुख है। उनके मन में, भावनाओ में क्या कुछ बदलाव है। अथवा पुरानी सरकार और राजनीतिक दल याने भाजपा के प्रति जो स्थिति तब बनी थी वही स्थिति अभी भी बनी हुई है। इन सवालों का उत्तर आना जरूरी है और भाजपा को भी इसकी खुद समीक्षा करनी चाहिए। 

वैसे इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रत्येक राजनीतिक दल में ऐसी बातों पर चिंतन मनन के लिए बड़ी टीम है। और काफी उच्च स्तर पर इस बारे में विचार विमर्श किये जाते हैं। जो राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं उन्हें तो मालूम है कि जनता की नाराजगी पैसे दूर करना है। लोगों के मन में जो आक्रोश है उसे दूर करने का कदम उठाया जाना चाहिए। मतदाताओं का विश्वास कैसे जीता जा सकता है उन्हें कैसे आकर्षित किया सकता है। यह कहा जा सकता है कि भाजपा में भी उच्च स्तर पर इस बारे में रणनीति बन रही होगी कि जिनकी वजह से पिछली बार मतदाताओं में नाराजगी थी? आम लोग दूर हो रहे थे? उसे दूर किया जा सके। राजनीतिक दल घोषणापत्र के बारे में अभी अधिक बातें और दावा कर रहे हैं। लेकिन मतदाताओं के लिए घोषणापत्र अधिक मायने रखता हो,ऐसा लगता नहीं है। देश में कांग्रेसी लगातार 60 वर्षों तक सत्ता में रही है लेकिन शायद ही कभी लगा होगी वह किसी घोषणा पत्र के आधार पर सत्ता में आई होगी। अब जनता जागरुक हो रही है। आम लोग, मतदाता, सरकारों का कामकाज देखते हैं। नीतियों देखते हैं। बहुत अधिक तक संभव है कि मतदान, इसी आधार पर  होता है। कई बार सरकारों का प्रदर्शन बेहतर नहीं होता तो मतदान का प्रतिशत भी घट जाता है।

छत्तीसगढ़ में सत्तासीन पार्टी कांग्रेस के लिए तमाम काम करने के बावजूद कई सारी चुनौतियां सामने रहेंगी। वैसे उसके लिए यह अच्छी बात हो सकती है कि उसका विरोधी दल से लगभग सभी विधानसभा सीटों पर सीधा मुकाबला होने वाला है। यहां अभी कोई तीसरी राजनीतिक पार्टी बड़े अधिक टक्कर देने की स्थिति में नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस को इस गंभीरता पूर्वक लेना होगा कि भारतीय जनता पार्टी अभी छत्तीसगढ़ को लेकर काफी गंभीर दिख रही है और भाजपा का सीधे राष्ट्रीय नेतृत्व यहां के लिए चुनावी काम कर रहा है। Congress को राष्ट्रीय स्तर पर बहुत अधिक सहयोग नहीं मिलने की कमी महसूस हो सकती है। सत्ता और संगठन में अभी जो कतिपय फेरबदल किए गए हैं उनसे कांग्रेस को चुनाव में कितना फायदा मिलेगा ? इस पर भी लोगों की नजर लगी हुई है।

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि छत्तीसगढ़ राज्य कोई बीमारी बाजी नहीं है। छत्तीसगढ़ में विकास की असीम संभावना है। यहां अकूत प्राकृतिक संसाधन है जो इस राज्य को विकास की नई ऊंचाइयों तक ले जाने में सक्षम है। ऐसा राज्य में लोगों में राजनीतिक जागरूकता भी जमकर है। हालांकि नशीली चीजों के उपयोग से कुछ नुकसान है लेकिन यहां के युवा भी कम जागरूक और उत्साहित नहीं है और वे अपने हित, राज्य के हित, समाज के हित पर सोच समझकर निर्णय लेने वाले हैं। राज्य में पिछले वर्षों में कामकाजी महिलाओं के संख्या में भी काफी बढ़ोतरी हुई है जो कि राजनीति को बड़े ढंग से प्रभावित करने में सक्षम है। कहा जाता है कि जिस समाज में, देश में महिला तय कर लें कि इसी  रास्ते पर आगे बढ़ना है तो वहां वही होता है। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा दिखता रहा है। इस राज्य में अभी पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग की अलग राजनीति हावी होती नजर आई है।इस वर्ग के लोग अलग-अलग मुद्दे को लेकर सक्रिय हैं जो कि राजनीति को प्रभावित करने वाली है। फिलहाल भारतीय जनता पार्टी को इस दिशा में कदम आगे बढ़ाना है कि  पिछले चुनाव में  उसके खिलाफ जो नकारात्मक वोटिंग, जहां से वह तब के चुनाव में पिछड़ गई थी, का माहौल बना था उसे वह नियंत्रित कर सके तथा उसके साथ मतदाताओं को अपनी ओर प्रभावित करने में सफल हो सके और कांग्रेस को कोई ओरियल रुख अख्तियार के बिना इस पर नजर रखनी होगी कि कहीं उसके खिलाफ पीछे से कोई 'एंटी इनकंबेंसी' का वातावरण तो नहीं बन रहा है और वह चुनाव तक इसे कैसे नियंत्रित रख सकती है।

                          Political reporter.

                       9981922972.  

 

  


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