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  अंतिम  छत्तीसगढ़ माता कौशल्या की जन्मभूमि है। यहां भगवान श्रीराम को भांचा माना जाता है। यहां  डॉक्टर राधाबाई, भवानी शुक्ला, मिनीमाता, रोहि...

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 अंतिम 

छत्तीसगढ़ माता कौशल्या की जन्मभूमि है। यहां भगवान श्रीराम को भांचा माना जाता है। यहां डॉक्टर राधाबाई, भवानी शुक्ला, मिनीमाता, रोहिणी बाई परगहनियां श्रीमती बेला बाई, श्रीमती फूल कुंवर, जैसी तमाम वीर क्रांतिकारी महिलाओं का अवतरण हुआ है, जिन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और सविनय अवज्ञा आंदोलन, कंडेल सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़कर गांधीजी के देश निर्माण के कार्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।इन महान विभूतियों ने मद्य निषेध, वेश्यावृत्ति, विदेशी सामानों के बहिष्कार, छुआछूत जैसी कुरीतियों के खिलाफ जगह-जगह जन जागरण किया। लोगों को,उस दौरान जागरूक किया और स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने की कोशिश की। इस अंचल को तमाम महान विभूतियों ने समाज को नई दिशा और दशा दी है वहां बच्चों पर बढ़ते जा रहे अत्याचार के मामले काफी चिंताजनक है। यहां दिल उस समय टूट जाता है, जब एक वहशी बाप के द्वारा अपनी बच्ची के साथ ही कृकृत्य करने की खबर सामने आती है। इस प्रकरण में विचारण एवं सुनवाई के दौरान न्यायालय ने अभियुक्त के विरुद्ध आरोप युक्तियुक्त संदेह से परे प्रमाणित पाया और अभियुक्त को कड़ा दंड दिया गया है। अवयस्क बच्चियों को मैं तुमसे प्यार करता हूं शादी करना चाहता हूं के जैसी बड़ी बड़ी, मीठी मीठी बातें कर कहकर बहलाने फुसलाने और उसके बाद उनका शारीरिक शोषण करने की घटनाएं हो रही है। पीएटी एग्जाम की तैयारी कर रही अवयस्क बालिका के साथ ऐसे ही घटना के प्रकरण में न्यायालय ने दोष सिद्ध होने पर अपराधी को 10 साल की सजा सुनाई है। एक अन्य मामले में चाकू की नोक पर व्यपहरण करने और दुष्कर्म के आरोपी को न्यायालय ने 20 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।

ऐसे मामलों से पता चलता है कि बच्चे गंभीर हिंसा का शिकार हो रहे हैं। समाज में विकृत मानसिकता के लोगों की संख्या बढ़ रही है, जोकि बच्चों को अपना शिकार बना रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि ऐसे मामलों में 18 साल से 25 साल तक के लोग ही अधिक अपराध करते पाए गए हैं। तो यहां यह सवाल भी उठता है कि ऐसे लोगों को क्या नैतिक शिक्षा देने, जागरूक करने और उनके बुरे व्यवहार या कार्य का परिणाम बताने, समझाने की जरूरत नहीं है। उन्हें यह बताने की क्या जरूरत नहीं है कि उनकी छोटी सी गलती उन्हें जिंदगी भर के लिए जेल के सीखचो पीछे भेज सकती है। आज की सामाजिक व्यवस्था काफी कुछ बदल गई है। पहले जमाने के लोग एक दूसरे की जगह पर जाते थे और साथ में वक्त बिताते थे। जब भी कोई जरूरत होती थी पड़ोसी एक दूसरे की मदद करने के लिए एकत्रित हो जाते थे। आज के युवाओं को ही नहीं बड़े लोगों को भी यह पता नहीं रहता कि उनके घर के बगल में कौन रहता है। युवा वर्ग के लोग, उन्हीं से मिलना जुलना पसंद करते हैं जिनके साथ में वे सहज महसूस करते हैं। ऐसे में ही कई बार अपराधिक मानसिकता वाले लोगों का एक गैंग तैयार होने लगता है। युवाओं की प्रतिभा,पौरूष,तप, त्याग और बुद्धि बल और कठिन मेहनत राष्ट्र के लिए गर्व की बात है। युवा शक्ति की देश सेवा समाज सेवा और विश्वकल्याण की कथाएं इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, लेकिन गलत संगति, तरह-तरह का नशा, युवाओं को पतन के रास्ते पर ले जा रहा है। युवाओं के एक वर्ग का धार्मिक सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय चरित्र मिटता सा जा रहा है। उनकी मौलिक कल्पना शक्ति, तर्कशक्ति की क्षमता को नष्ट करने की साजिश की जा रही है। नशे के आदि युवा, जल्दी होशो हवास खो बैठने वाले हो गए हैं। और ऐसे ही उन्मादी युवा अपराध कर रहे हैं।

बच्चों को कई प्रकार की हिंसा, शोषण और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। जो आंकड़े पास हम सब के पास उपलब्ध हैं उससे इतर यह भी  सच्चाई है कि बच्चों के खिलाफ हिंसा, शोषण, दुर्व्यवहार की रिपोर्ट देने में आज भी लोगों में हिचकिचाहट होती है जिसके चलते इससे इनकार नहीं किया था ताकि ऐसे मामलों की सही जानकारी हमारे पास नहीं आ पाती। बचपन में जिन बच्चों को ऐसे शोषण का सामना करना पड़ता है उनके व्यस्क जीवन में भी इसके प्रतिकूल परिणाम देखने को मिलते हैं। बच्चों को सुरक्षित वातावरण दिलाने में सरकार, समुदाय, स्थानीय प्रशासन, गैर सरकारी संगठन, धार्मिक और सामाजिक संगठन मदद कर सकते हैं लेकिन जब तक अपराध की कदम बढ़ाने की ओर बढ़ रहे युवा में जागरूकता नहीं लाई जा सकेगी, उनके दिमाग में यह बिठाना ही जा सकेगा कि वह बहुत गलत करने जा रहे हैं और उसका भयावह दुष्परिणाम भी उन्हें भुगतना पड़ सकता है तब तक बच्चों के प्रति ही नहीं किसी भी अपराध को रोक पाना आसान नहीं होगा। कहा जाता है कि दंड देने से ही अपराध खत्म नहीं हो जाता बल्कि अपराधी को सुधारने की जरूरत होती है। उसकी मनहस्थिति को बदलने की जरूरत होती है। ताकि वह अपराध करने से तौबा कर ले। यह देखने में आया है कि जो लोग जेल चले जाते हैं उन्हें लगता है कि उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है और अब वे सुधारना चाहते हैं तथा अवसर मिलेगा तो वह आगे ऐसी गलती नहीं करेंगे। लेकिन तब तक चिड़िया चुग गई खेत वाली बात रह जाती है। देश में जो कानून बने हैं, उनके कड़ाई से पालन के चलते उम्मीद की जानी चाहिए कि निर्भया कांड, साक्षी हत्याकांड, श्रद्धा हत्याकांड जैसी दिल को झकझोर देने वाली शर्मनाक घटनाएं अब थमने लगेंगी। बस इसमें समाज के लोगों को भी थोड़ी जागरूकता के साथ सहभागिता निभाने की जरूरत है। अवयस्क बालिका को चाकू से गोद गोद कर मार डालने की घटना को हम सिर्फ देखते रह जाएंगे तो अपराधियों का मनोबल सिर्फ बढ़ने ही वाला है,  रुकेगा नहीं। छत्तीसगढ़ तो सरल शांत और विकास पसंद अंचल है। थोड़े से जागरूकता के प्रयास होंगे तो,यहां निश्चित रूप से उम्मीद की जा सकती है कि जागरूक होकर युवा, उन्माद के आवेश में अपराध करने से बचने लगेंगे।