breaking news,बहुचर्चित रावल मल जैन हत्याकांड मामले में न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला, मुख्य अभियुक्त को फांसी की सजा, पुत्र ही है मुख्य अभियुक्त

 दुर्ग ।

असल बात न्यूज़।।  

विशेष न्यायाधीश शैलेश कुमार तिवारी  के न्यायालय ने प्रदेश के बहुचर्चित रावलमल जैन हत्याकांड मामले में मुख्य अभियुक्त को फांसी की सजा सुनाई है। लगभग 5 वर्षों के बाद इस मामले में न्यायालय का फैसला आया है। इस दोहरे हत्याकांड मामले में न्यायालय ने आरोपियों को दोष सिद्ध पाए जाने के बाद यह सजा सुनाई है।दुर्ग जिले के न्यायालयीन इतिहास में  20 वर्षों के बाद किसी बहुचर्चित मामले में यह फांसी की सजा सुनाई गई है, हालांकि इसके अलावा और भी कुछ मामलों में यहां फांसी की सजा हुई है। उल्लेखनीय है कि दुर्ग जिले में इसके पहले बहुचर्चित नियोगी हत्याकांड में अभियुक्त को फांसी की सजा सुनाई गई थी, जोकि यहां की पूरे देश में चर्चित घटना रही थी।  

रावल मल जैन हत्याकांड मामले में न्यायालय का यह ऐतिहासिक फैसला आया है।इस प्रकरण में 1 जनवरी 2018 को प्रतिष्ठित समाजसेवी   रावल मल जैन और उनकी धर्म पत्नी की हत्या कर दी गई थी।मामले में यह शिवपुरी तथ्य की घटना स्थल वाले मकान में घटना दिनांक को घटना के पूर्व तक रावल मल जैन श्रीमती सुरजी बाई का मुख्य आरोपी संदीप जैन के अलावा अन्य कोई मौजूद नहीं था।इसके उनके पुत्र का ही  मुख्य अभियक्त के रूप में नाम सामने आया जिसकी वजह से यह मामला और अधिक चर्चा में आ गया। मामले में विचारण के दौरान  विशेष न्यायाधीश शैलेश कुमार तिवारी ने बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं के एक एक तर्क को बारीकी से सुना। इस मामले पूरे देश की नजर लगी हुई है इसलिए इस में विचारण और सुनवाई के दौरान न्यायालय कक्ष अधिवक्ताओं और जागरूक नागरिकों की भीड़ से खचाखच भरा रहा। 

विशेष न्यायाधीश शैलेश कुमार तिवारी के न्यायालय ने माना कि  मुख्य अभियुक्त संदीप जैन का यह कृत्य बर्बरता की उच्चतम सीमा को दर्शाता है क्योंकि इसके द्वारा अपने जन्मदाता माता पिता की हत्या का अपराध कारित किया गया है। न्यायालय ने इसे अपराधों में अपवाद विरल से विरलतम श्रेणी का मामला माना है। जिसके बाद उसमें मुख्य अभियुक्त को फांसी की सजा सुनाई गई है।  

न्यायालय में वही मामले के सह आरोपी भगत सिंह गुरूदत्ता को आयुध अधिनियम की धारा 25, एक ख के अंतर्गत 5 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।इसी तरह से आरोपी शैलेंद्र सागर को आयुध अधिनियम की धारा 25,1ख,क के अंतर्गत 5 वर्ष के सश्रम कारावास एवं ₹1000 के अर्थदंड की सजा सुनाई गई है। अभियुक्त को अर्थदंड अदा ना करने पर 6 माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।  

यह न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला रहा है। हम आपको बता दें कि  न्यायालय ने इस मामले में अपने फैसले की शुरुआत जयशंकर प्रसाद की इन लाइनों से की है -

ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न है।

 इच्छा क्यों पूरी हो, मन की ।

एक दूसरे से ना, मिल सके।

 यह विडंबना है जीवन की 

इन लाइनों से समझ में आ सकता है कि माननीय न्यायालय ने इस मामले को विरल से विरलतम माना है और इसके तमाम तथ्यों को देखते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई है।


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