चर्चित रावल मल जैन हत्याकांड मामले में 23 जनवरी को फैसला आने की संभावना

 दुर्ग ।

असल बात न्यूज़।। 

    00 विधि संवाददाता 

बहुचर्चित रावलमल जैन हत्याकांड मामले में न्यायालय का आगामी 23 जनवरी को फैसला आ सकता है।इस प्रकरण में विशेष न्यायाधीश शैलेष कुमार तिवारी के न्यायालय में सुनवाई चल रही है जिसमे अंतिम मौखिक तर्क पर सुनवाई आज पूरी हो गई है। पीठासीन न्यायाधीश के द्वारा एक एक तर्क और दलीलों को बारीकी से सुना गया। बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं के द्वारा अभियुक्त के बचाव में तमाम तर्क प्रस्तुत किए गए हैं तथा साक्षी और दस्तावेजों को अपर्याप्त बताते हुए न्यायालय से अभियुक्तों को दोष मुक्त करने का आग्रह किया गया। वही अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक में तर्क देते हुए कहा कि बचाव पक्ष ने ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं लाया है जिससे बहुत गंभीर तरीके से प्रकरण प्रभावित होता दिखे।पीठासीन न्यायाधीश ने एक एक तर्क और दलीलों को बारीकी से सुना।न्यायालय के द्वारा बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं को प्रकरण में अपनी तथ्यपरक बात रखने अधिक से अधिक समय दिया गया है। इस बहुचर्चित मामले में न्यायालय की आगे की कार्रवाई की ओर पूरे प्रदेश में नजर लगी हुई है।

प्रकरण में अंतिम मौखिक तर्क पर पिछले लगातार तीन दिनों से सुनवाई चल रही है। यह सुनवाई खुले न्यायालय में चल रही है और दुर्ग जिले का यह काफी चर्चित मामला होने की वजह से  इस सुनवाई के दौरान न्यायालय कक्ष में प्रकरण के तथ्यों को सुनने बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं के साथ आम लोग भी उपस्थित थे। मामले में टी टाइम के बाद अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक के द्वारा प्रकरण में तर्क दिया गया तो वही टी टाइम के पहले  लगभग 2 घंटे तक बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने कई तर्क दिए ।

न्यायालय के समक्ष आज सर्वप्रथम अधिवक्ता तारेंद्र जैन ने प्रकरण में अभियुक्त के बचाव में तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि रावलमल जैन के उस घर में आने आने के एक से अधिक रास्ते हैं। मेमोरेंडम में इस रास्ते को कहीं स्वीकार किया गया है तो कहीं इस पर मौन रखा गया है। पुलिस अनुसंधान में उस कमरे की कुंडी को खुलवाया गया हैं अथवा नहीं को स्पष्ट नहीं किया गया है। यह तक कह दिया है कि यह उनकी लायबिलिटी नहीं है। अधिवक्ता ने तर्क के दौरान पुराने कई चर्चित मामले का उल्लेख किया। उन्होंने पारस राम वर्सेस छत्तीसगढ़ राज्य के मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि अन्वेषण के दौरान दिया गया मेमोरेंडम तब कहीं महत्वपूर्ण नहीं रह जाता है जब उसमें आरोपी का हस्ताक्षर ना लिया गया हो। शंका कितनी भी बलवती क्यों ना हो लेकिन जब तक हैतुक स्पष्ट प्रदर्शित नहीं होता, अभियुक्त को उसका लाभ मिलता है। यहां कहीं प्रदर्शित नहीं होता है कि अभियुक्त को संपत्ति का कोई लालच है। यह तथ्य अभियुक्त के निर्दोष होने को प्रभावित करता है। उन्होंने कार्तिक राम वर्सेस स्टेट ऑफ दिल्ली के एक मामले का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि घटनास्थल पर बहुत अधिक भीड़ नहीं थी ना गवाह थे। घटनास्थल पर जो साक्षी मौजूद थे उनका बयान लेने की कोशिश नहीं की गई। जो महत्वपूर्ण साक्षी हैं उनके बयान लेने का नियम है लेकिन इसका पालन नहीं किया गया। किसी ने बयान देने से मना किया तो उसका बयान देने के लिए नोटिस भी नहीं दी गई। बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने विटनेस करीम को पॉकेट अधिवक्ता निरूपित करते हुए कहा कि विटनेस साक्षी स्थानीय होना चाहिए। इस मामले में जो विटनेस बनाया गया है उसे पुलिस ने कई मामलों में विटनेस बना रखा है। इसे साक्षी ने भी स्वीकार किया है। उन्होंने मामले में हजारा सिंह वर्सेस पंजाब राज्य के प्रकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि पॉकेट विटनेस का साक्ष्य पढ़ा ही नहीं जाना चाहिए। 

उन्होंने साक्षयों के बयान पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि साक्षी कहता है कि उसने अभियुक्त को थाने में नहीं देखा। दूसरी जगह कहता है कि देखा था। घटना के बारे में बताता है कि शाम को हुई कभी कहता है कि सुबह की घटना है। कभी कहता है कि वह थाने गया ही नहीं। उन्होंने सवाल खड़े करते हुए कहा कि ऐसे साक्षी पर किस हद तक भरोसा किया जा सकता है।

उन्होंने यहां कार्तिक राम देवांगन वर्सेस स्टेट ऑफ छत्तीसगढ़ के मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मामला भी इससे काफी कुछ मिलता जुलता है जिससे अभियुक्त की  निर्दोषिता सिद्ध होती है। प्रकरण में मर्ग की टाइमिंग 6.15, 6:20 बजे की बताई गई है जबकि f.i.r. इसके बाद सिर्फ पांच 10 मिनट बाद दर्ज की जाती है। उन्होंने एक अन्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि गिरफ्तार करने वाला और अन्वेषण करने वाला अधिकारी एक ही व्यक्ति नहीं हो सकता। आर्म्स एक्ट के case में यह स्पष्ट डिफाइन किया गया है कि जांच करने वाला और अन्वेषण करने वाला अधिकारी एक नहीं हो सकता। उन्होंने घटना में प्रस्तुत पिस्टल के बारे में भी कई सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि पुलिस अनुसंधान में पिस्टल खरीदने का पंचनामा बनाया गया है। उस पंचनामा में संदीप जैन के कहीं हस्ताक्षर नहीं है। पंचनामा में बिना हस्ताक्षर के कैसे माना जा सकता है कि उस का पंचनामा उसके सामने ही तैयार किया गया। संदीप जैन ने उस पिस्टल को भगत सिंह गुरूदत्ता से 3 जनवरी 2018 को खरीदा। उसे सील पैक कर दिया गया। बाद में गुरुदत्ता से उसकी पहचान कराई गई। बिना देखें कोई कैसे बता सकता है कि यह वही पिक्चर है जो उसने बेचा था। यहां सवाल उठता है कि इस साक्षी से पिस्टल की पहचान सील खोलकर  कराई गई कि बिना से खोल ही पहचान करा दी गई। उन्होंने मालखाना रजिस्टर पेश नहीं करने पर भी सवाल उठाया तथा कहा कि यह सब तथ्य परिस्थितियों की संख्या को तोड़ते हुए नजर आते हैं।इन तथ्यों के साथ उन्होंने न्यायालय से अभियुक्त को दोषमुक्त करने का आग्रह किया। 

अधिवक्ता ललित तिवारी ने प्रकरण में आरोपी भगत सिंह गुरूदत्ता के बचाव में तर्क देते हुए कहा कि मामले में अभियोजन पक्ष आरोपी को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा है। उन्होंने प्रकरण के साक्ष्यों पर सवाल खड़े किए। पुलिस वाले गवाह बनाते हैं जबती और मेमोरेंडम में गवाही बनाते हैं। गवाहों को नोटिस देकर बुलाया जाता है। इस मामले में किसी गवाह को नोटिस देकर बुलाने की कोई जानकारी सामने नहीं आई है। उस व्यक्ति को गवाह बनाया गया है जो खुद बताता है कि उसे पुलिस ने अब तक 120 मामले में गवाह बनाया है। उन्होंने इस पर भी सवाल खड़ा किया कि साक्षी का कहना है कि उससे थाने में हस्ताक्षर नहीं कराया गया, घटनास्थल पर कराया गया। आपसे कि किसके आदेश से खरीदी की गई यह भी स्पष्ट नहीं है। किस आरोपी से हथियार जब्त किया गया उसका भी उल्लेख नहीं है। यह कहीं सिद्ध नहीं होता है कि आर्म्स की परमिशन स्वीकृत करते समय संबंधित जिला कलेक्टर ने कही अपना मन मस्तिष्क लगाया है। 

वहीं अधिवक्ता दुष्यंत देवांगन ने प्रकरण के एक अन्य आरोपी के बचाव में अपना तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि मेमोरेंडम मतलब संस्वीकृति होती है। मेमोरेंडम पर अभियुक्त के हस्ताक्षर नहीं हैं तो कोई संस्वीकृति हो नहीं सकती। मेमोरेंडम इन कंप्लीट है। एक ही तारीख पर गिरफ्तारी में बहुत बड़ा लोप हुआ है। उनकी आपत्ति पर ही पुलिस ने पूरक चालान प्रस्तुत किया है। उन्होंने तमाम तर्क देते हुए कहा कि आरोपी शैलेंद्र सागर का मेमोरेंडम खानापूर्ति करते हुए बना दिया गया और धारा 161 का बयान प्रस्तुत कर दिया गया।आर्म्स, कहां से आया, कैसे आया, यह कहीं साबित नहीं होता। ऐसे में अभियुक्त को दोषमुक्त किया जाना उचित है। 

टी टाइम के बाद विशेष लोक अभियोजक श्री शर्मा ने प्रकरण में अपने तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि मामले में बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने जो तर्क दिए हैं वे सतही प्रतीत होते हैं। यह तो स्पष्ट नजर आता है कि मृतकों के जिंदा रहते तक मुलजिम संपत्ति का वारिस नहीं बन सकता। उनकी मृत्यु के बाद मुलजिम संपत्ति का अकेला वारिस है। यह इंवेंटेड फैक्ट है। यही हेतूक है जो घटना का कारण बनी। रावल मल जैन का एक ही पुत्र है जो कि आरोपी है। घटना के समय घर में और कोई नहीं था। बचाव पक्ष ने कई दलीलें दी है कि बाहर से व्यक्ति आ गया, बाहर से आने के दूसरे भी रास्ते थे। जब उस समय वहां तीन लोग थे तो कोई दूसरा बाहर से हत्या करने के इरादे से वहां आकर एक को कैसे छोड़ देता। उन्होंने कहा कि बचाव पक्ष ऐसा लगता है कि मिसगाइडेड हो गया। जो घटना स्थल पर सबसे पहले पहुंचा उसे ही आरोपी बनाने की कोशिश कर दी गई। रावल मल जैन की धर्मपत्नी की भी वही हत्या की गई लेकिन उनकी अलग हत्या की गई। उन्होंने कहा कि कहीं  कलरर्कियल मिस्टेक हो सकती है। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि घटना में मर्ग, एफ आई आर की कायमी में आई ओ ने स्पष्ट किया है कि उनके कार्य करने का तरीका अलग है। वे ऐसे मामलों में पूरी लिखा पढ़ी कर लेते हैं तब जब्ती की कार्रवाई करते हैं। संबंधित पिस्टल के बैलेस्टिक एक्सपर्ट ने जांच की है। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि जो कई मामलों में गवाह है तब भी अन्य मामले में उसकी गवाही माने होगी। उन्होंने कहा कि डिफेक्टिव एविडेंस का मुलजिम को फायदा नहीं मिल सकता। उन्होंने न्यायालय से आग्रह करते हुए कहा कि अभियुक्त ने बहुत गंभीर अपराध किया है डिफेंस ने ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं लाया है जिससे बचाव मिल सके।

इस दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जो क्लर्कयल मिस्टेक की बात कही जा रही है धारा 35 में स्पष्ट है कि पब्लिक सर्वेंट के धारित डॉक्यूमेंट में एडमिशन के डॉक्यूमेंट आते हैं ना कि पुलिस के डॉक्यूमेंट। पुलिस के डॉक्यूमेंट, विटनेस कितने सही होते हैं इस पर हमेशा सवाल उठता रहा है। साक्षी रोहित के बयान पर सवाल उठाते हुए बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि रोहित का बयान पुराने पुलिस थाने में लिया गया नया, पुलिस थाने में लिया गया कि देना बैंक में लिया गया, यह कहीं सामने नहीं आया है और वह बयान कहां है, उसे कहां छुपाया गया, इस पर भी सवाल है।