अनुसूचित जाति आरक्षण,.. छत्तीसगढ़ में खड़ा हो सकता है बड़ा बखेड़ा..

"एक तरफ आरक्षण को खत्म करने की लंबे समय से  मांग भी उठ रही है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ राज्य में  अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण का प्रतिशत कम हो जाने के खिलाफ भी अब विरोध के स्वर तेज होने लगे हैं। जिस तरह के हालात है, आरक्षण के मुद्दे पर सरकार को कई कारणों  से विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पिछड़े वर्ग के आरक्षण का प्रतिशत बढ़ा है लेकिन साहू समाज की अपनी अलग नाराजगी, अलग समस्या खड़ी कर रही है।"


विशेष आलेख।

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     00 अशोक त्रिपाठी   

जब, कोई चीज मिल रही है वह अचानक  मिलनी बंद हो जाए अथवा कम मिलने लगे तो लोगों का गुस्सा भड़कना, नाराज होना, उग्र होना स्वाभाविक है। और जब ऐसी चीज व्यापक जनसमूह के फायदे से जुड़ी हुई है तो उसका सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव दूर-दूर तक दिखता है। लोकतंत्र में "भीड़ "का महत्व है और व्यापक जन समूह को प्रभावित करने वाली चीजें, राजनीति को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। यह चीजें राजनीतिक दलों को और सरकार के कामकाज को भी प्रभावित करती नजर आती है। इसके व्यापक प्रभाव का असर, सरकार के बनने- बिगड़ने के खतरे को प्रभावित करता,दिखता नजर आने लगता है। छत्तीसगढ़ राज्य में अनुसूचित जाति के आरक्षण का प्रतिशत अपेक्षाकृत कम हो गया है। अनुसूचित जाति वर्ग की सक्रियता, छत्तीसगढ़ अंचल की राजनीति को हमेशा व्यापक तौर पर प्रभावित करती  रही है। जैसा कि अक्सर होता है कहीं से कोई विरोध की आवाज उठानी शुरू होती है तो उसकी आंच जैसे-जैसे फैलती आती है कोई समझने के लिए तैयार नहीं होता कि ऐसा क्यों हो गया, अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण का प्रतिशत  कम क्यों हो गया ? बस इसका विरोध शुरू हो गया है। इसके लिए  राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए मुंह फुलाया जा रहा है। राजनीतिक गलियारे में इसकी गूंज हमेशा सुनाई देती रही है कि आजादी के बाद से, छत्तीसगढ़ अंचल में, "कांग्रेस" अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के मतदाताओं के दम पर, हमेशा बड़ी जीत दर्ज करती आई है। अब ताजा हालात में कांग्रेस का यहां चिंतित होना स्वाभाविक है क्योंकि अनुसूचित जाति वर्ग आरक्षण के मुद्दे को लेकर उससे सीधे-सीधे नाराज होता नजर आ रहा है। कांग्रेस से उसके नाराज होने की सीधी वजह यही है क्योंकि, प्रदेश में उसकी पार्टी की सरकार है और  आरक्षण का प्रतिशत कम होने के लिए राज्य सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। पिछले दो दशक में नई अवधारणाए बनी है। अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के जो मतदाता, राजनीतिक तौर पर हमेशा एक ही पटरी, एक ही लाइन पर ही चलते दिखे हैं, उनकी राजनीतिक मान्यताएं बार-बार बदलती दिख रही है जिससे समझा जा सकता है कि अब वे किसी एक विशेष राजनीतिक दल के साथ ही बंधे हुए नहीं है, ना ही हमेशा बंधे रहने के लिए तैयार हैं। इस वर्ग के लोगों की पहले भी किसी विशेष राजनीतिक दल के प्रति कोई अति प्रतिबद्धता तो नजर नहीं आती थी, किसी राजनीतिक दल से कोई खास सीधा जुड़ाव भी नहीं दिखता था, तो वही कोई विरोध भी नहीं दिखता था। इसकी वजह यह भी रही है कि इन वर्ग के लोगों की जरूरतें हमेशा सीमित रही हैं राजनीतिक जरूरतें भी। अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों के आरक्षण का प्रतिशत कम हो गया है तो इससे जो राजनीतिक नाराजगी बढ़ने लगी है, उसकी वजह यह भी है कि इस वर्ग के लोगों में जागरूकता बढ़ी है, राजनीतिक सोच की शक्ति भी बढ़ी है। जैसा कि हर मामले में होता है वैसा ही इस मामले में भी हो रहा है कि कोई समझने को तैयार नहीं है कि आरक्षण का प्रतिशत आखिर कम क्यों हो गया है। आरक्षण के प्रतिशत के कम होने का पूरा ठीकरा मौजूदा राज्य सरकार और उसकी पार्टी  के ऊपर फूटता दिख रहा है, फोड़ा जा रहा है, उसके ऊपर गुस्सा निकाला जा रहा है आक्रोश जताया जा रहा है, भले ही वह इसके लिए सीधे तौर पर कहीं जिम्मेदार नहीं है। लोकतंत्र में अक्सर ऐसा ही होता है। ऐसे हालात में कहा जा सकता है कि कांग्रेस के सामने यहां अनुसूचित जाति वर्ग को राजनीतिक तौर पर नए सिरे से साधने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। 

पूरे देश में आरक्षण का मुद्दा राजनीति को हमेशा व्यापक तौर पर प्रभावित करता नजर आया है। वर्ष 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के मुद्दे का जिस तरह से विरोध शुरू हुआ था वह तो सभी लोगों को याद होगा। उसकी आंच पूरे देश में फैलती दिखी थी। सभी प्रदेश आरक्षण के मुद्दे को लेकर बार बार संकट से जूझते नजर आए हैं। छत्तीसगढ़ मैं वैसे आरक्षण, राजनीति को प्रभावित करने वाला कभी बड़ा मुद्दा नहीं बन सका है। लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्ष 2012 में जब अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण का प्रतिशत 16% से घटाकर 12% किया गया था तब तत्कालीन सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा था। तब आरक्षण के प्रतिशत के कम होने के विरोध में उसकी पार्टी में भी नाराजगी के सुर सुनाई दे रहे थे, लेकिन उस दौरान वह पार्टी सरकार बनाने में सफल हो गई थी। कहा जा सकता है कि इसीलिए तब ये विरोध के सुर वही दबे के दबे रह गए। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद नए समीकरण बने हैं। कहा जा रहा है कि देश की कांग्रेस सरकार ने सभी वर्ग के लोगों के साथ नरमी और लचीलापन का रुख अपनाया है और सभी के मांगों को पूर्ण करने के प्रति सहानुभूति पूर्वक विचार किया है। राज्य सरकार भी दावा करती है कि उसने किसानों, मजदूरों, युवाओं के लिए बड़े काम किए हैं। ऐसे में अनुसूचित जाति वर्ग को लग रहा है कि उसकी उपेक्षा हो रही है। उसके हितों की अनदेखी की जा रही है। उसके आरक्षण के प्रतिशत को इसीलिए कम कर दिया गया है और राज्य सरकार की इसमें बढ़ोतरी कि सीधे कोई दिलचस्पी नहीं है। आरक्षण को देश में दलित, पिछड़े, वंचित वर्ग के लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए लागू किया गया है लेकिन हर चुनाव में नजर आता है कि यह जीत हार को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। आरक्षण से संबंधित विभिन्न विवादों के  कई मामले देश में सुप्रीम कोर्ट तक में चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस में अपने ऐतिहासिक फैसले में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% निर्धारित की है। लेकिन आज भी कई राज्य है जहां आरक्षण  50% से अधिक लागू है।नौकरियों और शिक्षा में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है।कर्नाटक में एससी, एसटी आरक्षण को बढ़ाने का फैसला किया गया है। यहां, राज्य सरकार एससी आरक्षण को 2 प्रतिशत बढ़ाकर 17 प्रतिशत और एसटी कोटा को 4 प्रतिशत बढ़ाकर 7 प्रतिशत करने की तैयारी कर रही है। इस तरह राज्य में आरक्षण की सीमा 56 प्रतिशत हो जाएगी। इसका मतलब है कि अनारक्षित यानी ओपन कैटिगरी की सीटें 50 प्रतिशत से घटकर 44% ही रह जाएगी। आरक्षण के मुद्दे को लेकर सरकारें, हमेशा दुविधा की स्थिति में रही हैं। एक तरफ  आरक्षण को अब खत्म करने की मांग जोर पकड़ रही है। दूसरी तरफ आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने की मांग हमारे सामने है।  सरकारो के सामने अपने राज्य में आरक्षण का प्रतिशत सिर्फ 50% तक रख पाना गंभीर चुनौती बन गई है। 

आरक्षण के प्रतिशत का विवाद हमेशा चलता रहा है। वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को लेकर बहुत अहम टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण मूल अधिकार नहीं है। दरअसल, तमिलनाडु के तमाम राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट से राज्य में मेडकल और डेंटल कोर्स के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए केंद्र को निर्देश देने की मांग की थी। उसी पर सुनवाई करते वक्त जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि आरक्षण का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। उसके बाद राजनीतिक दलों ने अपनी याचिका वापस ले ली थी। इससे पहले उसी साल फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं हो सकता।

छत्तीसगढ़ राज्य में भी वर्ष 2019 में नया प्रयोग करते हुए आरक्षण की अधिकतम सीमा को बढ़ाकर 82 प्रतिशत करने का फैसला किया गया। इसमें ईडब्लूएस के लिए भी 10 प्रतिशत आरक्षण शामिल था। उसके तहत अनुसूचित जात का आरक्षण 16 प्रतिशत से घटाकर 13 प्रतिशत, एसटी आरक्षण को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 32 प्रतिशत और ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया। यानी अनारक्षित या ओपन कैटिगरी के लिए महज 18 प्रतिशत ही सीटें बचीं। अक्टूबर 2019 में ही हाई कोर्ट ने आरक्षण के इस फैसले पर रोक लगा दी।

देश के संविधान में जो प्रावधान है उसके अनुसार पिछड़े वंचित वर्ग के लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए नौकरी और शिक्षा में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इसमें प्रत्येक वर्ग के आरक्षण का प्रतिशत उस राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। इसी वजह से हम देखते हैं कि अलग-अलग राज्यों में आरक्षण का प्रतिशत अलग-अलग नजर आता है। कहीं अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग को 25% से अधिक आरक्षण मिला है तो किसी राज्य में पिछड़े वर्ग को ही 28% तक आरक्षण दिया जा रहा है। छत्तीसगढ़ नया राज्य बना तो यहां अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण का प्रतिशत कम हो गया। अविभाजित मध्यप्रदेश में इस वर्ग को यहां अंचल में 16% तक आरक्षण मिला था। अविभाजित मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति वर्ग, की जो जनसंख्या थी उसके आधार पर पूरे प्रदेश में  आरक्षण का यह प्रतिशत लागू हुआ था। नई जनगणना में जिस आधार पर अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण का जो 13% आरक्षण लागू है उसमें इस वर्ग की जनसंख्या कम सामने आई है। कहा जा रहा है कि जनगणना में इससे वर्ग की गणना ठीक से नहीं हो सकी है। जो जनगणनाए होती रही हैं उसके आंकड़ों को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। यह आरोप हमेशा लगाया जाता रहा है कि एक ही व्यक्ति अथवा व्यक्तियों का जनगणना में उसके परिवार के सदस्यों के द्वारा कई कई जगह नाम लिखा दिया जाता है। जनगणना करने वाले उसके वहां होने अथवा नहीं होने की पुष्टि तो नहीं ही करते हैं। इस तरह से ऐसी गड़बड़ियां हमेशा होती रही हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की जनसंख्या के मामले में जो आंकड़े हैं वे इसके उलट है। यह तो सर्वमान्य सही है कि इन दोनों वर्गों के द्वारा कहीं भी जनगणना में दो जगह पर  नाम कतई नहीं लिखाया जाता। इसकी कोशिश भी नहीं की जाती। उल्टे हमेशा यही होता है कि  काम की तलाश में इनका पलायन हो जाता है और उनका नाम किसी भी जनगणना रजिस्टर में दर्ज नहीं हो पाता ।ऐसे में उनके मूल निवास में भी इनकी गणना रजिस्टर्ड नहीं हो पाती और जनगणना में उनका नाम काउंट नहीं होता। सरकार की ढेर सारी योजनाओं का इसी वजह से इस वर्ग के उन वास्तविक लाखों गरीबों को फायदा नहीं मिल पाता क्योंकि उनका नाम अमुक वर्ष के जनगणना रजिस्टर में दर्ज नहीं होता। ये  शिकायतें गांव-गांव में बनी हुई हैं। अभी भी हमारे सामने शिकायत आती है कि प्रधानमंत्री आवास योजना का उस गांव के गरीब को फायदा नहीं दिया जा सकता क्योंकि उसका जिस वर्ष के जनगणना रजिस्टर में नाम दर्ज होना चाहिए उसमें उसकी एंट्री नहीं है। हालांकि सभी जानते हैं, पूरे गांव के लोग जानते हैं कि वह वहां का वास्तविक निवासी है लेकिन काम की तलाश में बार-बार बाहर चला जाता है। इसी वजह से जनगणना रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने में विफल रहा है। दूसरी तरफ कई कई जगह जनगणना में, अपना नाम दर्ज करा लेने वाले लोग, ऐसी योजनाओ का हर जगह फायदा उठा ले रहे हैं। समाज  इन्हीं विसंगतियों से जूझ रहा है। जानकार लोगों का तो यह भी दावा है कि देश की जो जनगणना बताई जा रही है वह भौतिक रूप से उसमें सत्यता नहीं हैं। लाखों के लोगों के नाम फर्जी दर्ज है जिससे  जनसंख्या बढ़ी हुई दिखती है। नई जनगणना होगी, तो सरकार के सामने  बड़ी चुनौती रहेगी कि एक व्यक्ति का नाम अधिक स्थानों पर ना दर्शन सके। अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने के मामले में सरकार के सामने समस्या है कि उसके पास इस वर्ग के जनसंख्या का जो आंकड़ा है, उससे इसके आरक्षण का प्रतिशत फिलहाल तो नहीं बढ़ाया जा सकता। वैसे प्रत्येक 10 वर्ष के पश्चात नई जनगणना होती है। वर्ष 2021 में नई जनगणना होनी है। कोरोना में पूरी दुनिया में जिस तरह से तबाही  मचाई है उसके बाद यह जनगणना नहीं हो सकी है। इसका नया आंकड़ा कहीं सामने नहीं आया है। 

जनसंख्या की वास्तविक स्थिति का  पता करने के लिए एक और उपाय "हेड काउंट" करना भी है। राज्य में  पिछड़ी जाति वर्ग की गणना के लिए संभवत इसका क्रियान्वयन शुरू भी किया गया है। राज्य सरकार भी अनुसूचित जाति वर्ग की वास्तविक संख्या को पता करने के लिए "हेड काउंट" का रास्ता अख्तियार करने की और आगे बढ़ने का प्रयास करती नजर आ रही है। यह उपाय भी समाज के लोगों का गुस्सा  कम कम करने में तात्कालिक तौर पर सहायक साबित हो सकती है। हालांकि सरकार इसके लिए चाहती है कि यह नियम के अनुसार शुरू हो सके और इसके लिए समाज की ओर से पहल शुरू हो। हेडकाउंट करने का सभी जगह से समाज की ओर से आवेदन सरकार को मिले। कागजों में तो यह बात आसान हो सकती है लेकिन प्रैक्टिकली यह अधिक आसान नहीं है। आम लोगों के मन में यही धारणा है कि सरकार स्वयं निर्णय लेकर सब कुछ कर सकती है। ऐसे ही आरोप-प्रत्यारोप होता रहेगा, तो अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण का पेंच छत्तीसगढ़ में फंसता चला जाएगा।


 


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