AAP के लिए BTP कितना बड़ा झटका, 4 महीने का साथ, चुनाव से पहले छोड़ा हाथ

 


 अहमदाबाद. गुजरात में विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी आम आदमी पार्टी (आप) को बड़ा झटका लगा है। करीब 4 महीने पहले 'आप' के साथ गठबंधन का ऐलान करने वाली भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) ने अब गठबंधन तोड़ने की घोषणा कर दी है। आदिवासी इलाकों में अच्छा प्रभाव रखने वाली पार्टी ने ऐसे समय पर इसकी घोषणा की है जब 'आप' के राष्ट्रीय संजोयक अरविंद केजरीवाल गुजरात में ही हैं। बीटीपी नेता छोटूभाई वसावा ने खुद 'आप' से गठबंधन तोड़ने का ऐलान किया तो यह भी साफ किया कि वह बीजेपी के साथ नहीं जा रहे हैं।

बीटीपी ने क्यों तोड़ा गठबंधन?
बीटीपी ने गठबंधन तोड़ते हुए कहा है कि 'आप' के साथ गठबंधन जारी रहने पर उसके संगठन को नुकसान हो सकता था। कहा गया है कि पार्टी की छवि खराब हो रही थी और उनकी पार्टी को तोड़ने का भी प्रयास किया जा रहा था। विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की घोषणा करते हुए छोटूभाई वसावा ने कहा, ''देश में स्थिति बहुत खराब है और हम किसी टोपीवाले से नहीं जुड़ना चाहते हैं, चाहे वह केसरिया हो या झाड़ू निशान के साथ सफेद टोपी। ये सभी एक जैसे हैं। यह देश पगड़ी पहनने वालों का है और आदिवासियों के मुद्दों को सभी दलों ने दरकिनार किया है। 

बीटीपी तोड़ने की कोशिश का भी आरोप
वसावा ने यह भी आरोप लगाया है कि 'आप' की ओर से उसके नेताओं को तोड़ने का प्रयास किया गया। वसावा ने दावा किया कि 'आप' ने उनके काडर और नेताओं को तोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने यह भी कहा कि हार हो या जीत उनकी पार्टी अकेले ही विधानसभा चुनाव लड़ेगी।

AAP को कितना नुकसान?
2017 में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने वाली बीटीपी को दो सीटों पर जीत मिली थी। गुजरात और मध्य प्रदेश में भी अपनी मौजूदगी रखने वाली पार्टी का कहना है गुजरात में उसके करीब 5 लाख सक्रिय सदस्य हैं। पार्टी की कई ऐसी सीटों पर अच्छी पकड़ है, जहां आदिवासी मतदाताओं की संख्या अधिक है। गौरतलब है कि गुजरात की कुल आबादी में आदिवासियों की करीब 14.8 फीसदी हिस्सेदारी है और 27 सीटें अनूसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीटीपी भले ही 2 विधायकों वाली ही पार्टी हो, लेकिन 'आप' को इसके साथ रहने से काफी फायदा हो सकता था। गरीबों और मध्यम वर्ग के लिए कई घोषणाएं कर चुकी 'आप' आदिवासी इलाकों में प्रचार-प्रसार पर काफी ध्यान दे रही है। खुद अरविंद केजरीवाल ने पिछले दिनों आदिवासियों को केंद्र में रखकर कई वादे किए थे, जिनमें हर आदिवासी गांव में स्कूल और अस्पताल खोलना शामिल है।