अरुण साव बने प्रदेश अध्यक्ष तो, सबको साधने के साथ कई चुनौतियां हैं उनके सामने


नई दिल्ली, छत्तीसगढ़।

असल बात न्यूज़।। 

00  पॉलिटिकल रिपोर्ट

जो खबर है उसके अनुसार छत्तीसगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष पद पर अरुण साव की नियुक्ति ऐसे ही नहीं हुई है बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के द्वारा छत्तीसगढ़ में पार्टी को मजबूत करने के लिए पिछले कई दिनों से जो मंथन किया जा रहा था उसका यह परिणाम निकला है। पंद्रह साल तक सत्ता में रहने के बाद, पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी यहां काफी पीछे चली गई जिसके बाद से, यहां पार्टी को मजबूत करने को लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व से जुड़े लोगों में बार-बार चिंता ना कर आई है और यह चिंतित होना  स्वाभाविक है। अरुण साव सीधे सरल सांसद हैं, छत्तीसगढ़िया हैं, और आर आर एस से गहराई से जुड़े हुए हैं। माना जा रहा है कि इन सबका उन्हें फायदा मिला है। वे पेशे से कृषक और वकील हैं। यह भी कहा जा सकता है कि पिछड़े वर्ग का होने का उन्हें इस रूप में बड़ा फायदा मिला है।जो पार्टी सत्ता में नहीं होती उसका कोई भी पद कांटो भरा ताज ही होता है। नए अध्यक्ष अरुण साव जब पार्टी को मजबूत बनाने की मुहिम शुरू करेंगे तो उन्हें भी कई तरह के नए सुखद और चुनौतीपूर्ण एहसासों का अनुभव होगा। वकालत के पेशे से जुड़े लोगों को मालूम है कि किन तथ्यों से पासे को अपने पक्ष में करना है और जीत सुनिश्चित हो जाएगी तो अरुण साव इसमें खासा अनुभव रखते हैं।

राजनीतिक गलियारे में नई नियुक्ति के बाद नई चर्चाओं, नई अटकलबाजियों का दौर आमतौर पर शुरू ही हो जाता है।इस नई नियुक्ति के बाद भी अब छत्तीसगढ़ में भाजपाई खेमे में कई नए समीकरण बनते बिगड़ते दिख सकते हैं पार्टी नेतृत्व की तो इस ओर नजर लगी रहेगी कि सांसद अरुण साव अपने नए रूप में प्रदेश में पार्टी को मंशा के अनुरूप, मजबूत बनाने में आखिर कितना सफल हो पाते हैं। अब लगभग डेढ़ साल बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं तो जो नई नियुक्तियां होंगी उनमें इन सब बातों का तो ध्यान रखा ही जाएगा। लेकिन कार्यकर्ताओं की अपनी अलग ही उम्मीद और ख्वाहिशें हैं। पिछले वर्षों के दौरान पार्टी में आपसी खींचातानी और गुटबाजी लगातार बढ़ती दिखी है। ऐसा जिला स्तर से लेकर विधानसभा और ब्लॉक स्तर तक नजर आ रहा है। ऐसी खींचातानी किसी से छुपी नहीं है और कई मामलों में पार्टी को इससे नुकसान उठाना पड़ा है। लेकिन जिसे भी मौका मिला है इस सब को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ने की कोशिश की गई है। 

सांसद अरुण साव की भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को कोई  बड़ी घटना के रूप में देखे जाने को बहुत अधिक औचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता। भारतीय जनता पार्टी के सामने छत्तीसगढ़ में खुद को मजबूत बनाने की चुनौती है, उसके सामने लोगों का विश्वास जीतने की चुनौती है, राजनीतिक तौर पर अपना जनाधार मजबूत बनाने की चुनौती है तो, ऐसे समय में पार्टी नेतृत्व को पार्टी को मजबूत बनाने लगातार नए प्रयोग करते रहने पड़ेंगे। आक्रामक भाषण बाजी करने वाले सांसद अरुण साव अनावश्यक विवादों में कभी उलझते नजर नहीं आए।, उन्होंने  पार्टी में किसी के खिलाफ अनर्गल बोलने, अनावश्यक छींटाकशी करने से हमेशा बचने की कोशिश की है, कहा जा रहा है कि इस पद तक पहुंचने में उन्हें इस सबसे भी फायदा मिला है। 

एक बात यह कही जा सकती है कि पिछले 15 वर्षों के दौरान जब प्रदेश में भाजपा सत्तारूढ़ रही है अरुण साव की सत्ता में कहीं बहुत अधिक दखलंदाजी नहीं रही है। उस समय पार्टी के जो नेता सत्तारूढ़ रहे हैं वह सब करीब-करीब उनसे वरिष्ठ होंगे।  भाजपा संगठन में अभी भी बहुत कुछ  पहले के ही उन वरिष्ठ नेताओं का ही स्वाभाविक तौर पर वैसा ही दबदबा नजर आता है जैसा कि सत्ता में रहने के दौरान उन सबका बना हुआ था। अरुण साव को इन सब से तालमेल बनाकर संगठन को मजबूत बनाने की पहल करनी पड़ेगी। लेकिन जो तस्वीर दिख रही है इसमें प्रारंभिक तौर पर कहीं कोई असहजता की स्थिति नजर नहीं आने वाली है। कहा तो यह भी जा रहा है कि पुराने लोगों के भी पसंद होने की वजह से ही सांसद अरुण साव को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष तक के पद तक पहुंचने में  अधिक दिक्कत नहीं आई। वही बड़ी संख्या में युवा कार्यकर्ता कुछ नया चाहते हैं, परिवर्तन चाहते हैं, आक्रामकता चाहते हैं, पार्टी के भीतर संगठन में भी कुछ बदलाव देखना चाहते हैं, जिनसे तालमेल बनाना थोड़ा कठिन काम हो सकता है। नए अध्यक्ष श्री साव को इस चुनौती से जूझना पड़ेगा।

छत्तीसगढ़ में पिछले 20 वर्षों  की राजनीति के घटनाक्रम को देखे तो भाजपाई खेमे में प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी बिलासपुर संभाग के आसपास, अथवा उससे नजदीक क्षेत्र  के नेताओं को मिल रही है। बात हम चाहे शिवशंकर सिंह पैकरा की करें, रामसेवक पैकरा की करें, विष्णुदेव साय, धर्मलाल कौशिक की बात करें, ये सभी तत्कालीन बिलासपुर संभाग का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। तो अब पार्टी के जानकार लोगों के लिए अरुण साव का प्रदेश अध्यक्ष बनना कोई बहुत नई बात नहीं है क्योंकि वे भी बिलासपुर संभाग का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। संभवत भाजपा, मैदानी इलाकों में अपनी पकड़ को और मजबूत बनाने की बिलासपुर संभाग से शुरुआत करने से बढ़ने की कोशिश में लगी हुई है। पार्टी के लिए ऐसा करना, एक तो मजबूरी की तरह भी हो सकता है। दुर्ग संभाग में कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह से अपना खंभा मजबूत गाड़ दिया है दूसरे राजनीतिक दलों को इस संभाग से अपने राजनीतिक पैठ को मजबूत बनाने की शुरुआत करने के लिए यहां संघर्ष करना अधिक रास नहीं आ सकता और  दूसरे ठौर में सफलता हासिल करना उन्हें अधिक आसान लग सकता है।  भाजपा छत्तीसगढ़ में बिलासपुर संभाग के रास्ते, अंबिकापुर संभाग और बस्तर संभाग में  अपनी राजनीतिक पैठ बढ़ाना  चाहेगी। शायद नई कमान इसी सोच के साथ सौंपी गई है। ताजा नए राजनीतिक हालात में छत्तीसगढ़ में नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को भाजपा का महत्वपूर्ण फैसला कहा जा सकता है। अब नए अध्यक्ष की नियुक्ति हुई है तो नए कार्यकर्ता अब कोई पद मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। नए अध्यक्ष को इन सभी उत्साही कार्यकर्ताओं को भी साथ में जोड़ने तथा उन्हें जिम्मेदारियां सौंपने का कदम उठाना होगा।