आदिवासियों की पुरातन गोदना कला को पुनर्जीवित कर युवा कलाकार बने स्वावलंबी

 


रायपुर. बस्तर के आदिवासियों की गोदना कला को पुनर्जीवित करने के लिए प्रशासन ने युवाओं को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है। कलाकारों का समूह इस गोदना कला को आधुनिक युग में टैटू कला के रूप में पुनर्जीवित करने के लिए जुट गया है। जिला प्रशासन बस्तर ने युवाओं को विशेष प्रशिक्षकों के माध्यम से मशीन के जरिए बस्तरिया टैटू बनाने का प्रशिक्षण दिलाया है। इससे युवा न केवल रोजगार प्राप्त कर रहे हैं, बल्कि इसका प्रचार-प्रसार कर विलुप्त हो रही गोदना कला को भी संरक्षित कर रहे हैं। गोदना आदिवासियों की एक पुरातन कला है जिसे आदिवासी मानते हैं कि यह एकमात्र आभूषण है जो मृत्यु के बाद भी उनके पास रहता है। आदिवासियों की धारणा है कि धन लेकर नहीं जा सकते हैं पर गोदना मृत्यु के बाद भी शरीर में रहता है। गोदना शरीर को बुरी शक्तियों और बीमारियों से भी बचाता है।

जिला प्रशासन बस्तर ने बस्तर एकेडमी आफ डांस आर्ट एंड लिटरेचर (बादल) संस्थान की मदद से आदिवासियों की लोक संस्कृति को संरक्षित करने के मुहिम छेड़ी है। अभी तक 44 आदिवासी युवाओं ने गोदना कला को टैटू का रूप देने के लिए प्रशिक्षण लिया है। इसमें हलबा, भतरा, मुरिया, कोया, मुंडा जनजाति के शामिल हैं। प्रशिक्षण के बाद अधिकांश युवाओं ने बस्तरिया टैटू कलाकार के रूप में काम करना शुरू कर दिया है और राज्य की राजधानी रायपुर से लगभग 300 किलोमीटर दूर स्थित नक्सल प्रभावित जिले के मुख्यालय जगदलपुर और उसके आसपास पर्यटन महत्व के स्थानों पर स्टाल लगा रहे हैं। बस्तर में हाट-बाजार (साप्ताहिक बाजार) और मेलों में पारंपरिक गोदना निर्माता मिल सकते हैं, लेकिन कला धीरे-धीरे अपनी लोकप्रियता खो रही है।

गोदना कला में सफल हुए युवा

केस 01

पढ़ाई के साथ बस्तरिया बेटी ने शुरू की कमाई

बस्तर के बास्तानार विकासखंड के बड़ेकिलेपाल गांव की मािडया जनजाति की ज्योति ने बताया कि मई-जून में जिला प्रशासन की मदद से गोदना कला से टैटू बनाने का प्रशिक्षण लिया है। इसके बाद मैंने अपना खुद का काम शुरू किया। बस्तरिया टैटू को युवाओं में भारी क्रेज है। अब इससे आमदनी शुरू हो गई है। मैं अपनी मां के साथ अपने घर खर्च उठा रही हूं। अभी मैं बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा हूं। टैटू बनाने से आमदनी हो रही है। मां कमला आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं और पिता कुलदीप बीमार होने की वजह से घर में रहते हैं।

केस 02

पर्यटन स्थल पर युवाओं ने लगाया स्टाल

बस्तर के स्थानीय युवा संदीप बघेल (24) और चार अन्य युवाओं के प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात के सामने एक छोटा टैटू बनाने का स्टाल लगाया है, यह स्थल पर्यटकों के बीच लोकप्रिय स्थान है। युवाओं के मुताबिक धनुष-तीर जैसे पारंपरिक गोदना बदलती दुनिया में लुप्त होती जा रही है क्योंकि लोग आधुनिक टैटू डिजाइनों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। अब गोदना के टैटू भी युवाओं को भा रहे हैं। युवा हाथ, बांह और अन्य अंगों में टैटू छपवा रहे हैं। युवाओं कहना है कि उनका उद्देश्य न केवल गोदना टैटू बनाने से पैसा कमाना है, बल्कि इस कला रूप को संरक्षित करना भी है।

केस 03

पारंपरिक गोदना का दे रहे प्रशिक्षण

रायपुर के शकर नगर निवासी शैलेंद्र श्रीवास्तव (शैली) बस्तरिया टैटू को अपना रोजगार का साधन बना लिया है। वह इसका प्रशिक्षण देकर कमाई कर रहे हैं। बतौर प्रशिक्षक शैलेंद्र ने बताया कि विभिन्‍न जनजातियों के पारंपरिक गोदना कलाकृतियों को चयन किया। इन्हीं कलाकृ तियों को आधार बनाकर बस्तरिया टैटू से युवाओं को रूबरू करा रहा हूं। पारंपरिक गोदना पैटर्न और उनके पीछे की कहानियों की एक सूची भी तैयार की जा रही है। आदिवासियों की मान्यता है कि माथे के बीच और नाक के बीचों बीच गोदना करने से प्राकृतिक आपदा से बचाकर रखते हैं। शादी के संस्कार, देवी-देवताओं से जुड़े प्रमुख त्योहारों में गोदना करने वाली महिलाओं को पहले पंक्ति में रखा जाता है। गोदना कला को समृद्ध गोदना कला, गोदनी, बाना और बानी के नाम से भी जाना जाता है।

बनाया प्रशिक्षण के लिए माड्यूल

आदिमजाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, रायपुर की आयुक्त शम्मी आबिदी ने बताया कि आदिवासियों में गोदना कला पुरातन है। शरीर में गुदवाए जाने वाले गोदनाकृ तिके प्रचार-प्रसार के लिए 'छत्तीसगढ़ की आदि कला पुस्तक का निर्माण किया गया है जिसमें गोदना विधि और अलग-अलग जनजातियों के गोदना कलाकृतियों का उल्लेख किया गया है। राज्य की खैरवार, पंडो, मुंडा, उरांव, कंवर, बिंझवार, भैना, सौंता, कोल, कंडरा, सवरा, पारधी, भुंजिया, गोंड, धुरवा, दोरला और भतरा आदिवासियों की ओर बनए जा रहे पारंपरिक गोदनाकृ ति से लेकर दिवारों में बनाए जाने वाले कलाकृतियों व बांस,रस्सी के शिल्पाकृतियों को भी पुस्तक में प्रशिक्षण माड्यूल के रूप में समाहित किया है।

अब बबूल कांटा नहीं, मशीन से बनता है गोदना

युवाओं को प्रशिक्षण दे रहे बादल संस्थान की प्रभारी पूर्णिमा सरोज ने बताया कि पहले आदिवासी अरंडी के तेल से काजल बनाते थे और फिर सुई या बबूल का कांटा इस्तेमाल करके शरीर में गोदना करते थे। यह शरीर के विभिन्न् अंगों में विशेष रूप से किया जाता था। अधिकांश महिलाओं में ही गोदना की प्रथा है। हालांकि पुरुषों में भी यह कला देखने को मिलती है। अभी इस कला को आधुनिक टैटू कला से जोड़ लिए हैं। अभी टैटू के लिए स्याही का इस्तेमाल करते हैं जो कि स्थायी नहीं होता है। इसे मशीन के जरिए किया जा रहा है। पहले जो गोदना किया जाता था वह पूरी तरह से स्थायी होते थे जो आजीवन रहते थे।

युवाओं को कर रहे हैं प्रशिक्षित

बस्तर के कलेक्टर चंदन कुमार ने कहा, गोदना कला को लेकर जिला प्रशासन ने युवाओं को प्रशिक्षण देने का कार्यक्रम शुरू किया है। कुछ युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है , कुछ को अभी देना है। इसका मकसद यही है कि आदिवासियों की कला-संस्कृति, शिल्पकला आदि को सहेजा जा सके।