अनाथ बच्चों की मदद

 


 हमने कोविड-19 महामारी में इलाज के लिए लोगों को जूझते देखा. संक्रमण के चलते लाखों मौतें हुईं. लोगों की आजीविका छिन गयी. इन हालातों के सबसे बड़े शिकार बच्चे हुए हैं, विशेषकर वे, महामारी के कारण जिनके अभिभावक अब इस दुनिया में नहीं हैं. अनाथ बच्चों के सामाजिक, भावनात्मक और संज्ञानात्मक विकास बाधित होने का खतरा है. आर्थिक मुसीबतों में घिरे बच्चों के स्कूल और शिक्षा से वंचित हो जाने का भी जोखिम है.

हालांकि, ऐसे बच्चों की सहायता के लिए पीएम-केयर्स योजना के तहत पहल हो रही है. योजना के लाभार्थी 4000 बच्चों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पत्र लिखकर उन्हें विभिन्न लाभों की जानकारी दी है. ऐसे बच्चों को मुफ्त स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उच्चतर शिक्षा हेतु ऋण सहायता, आयुष्मान भारत योजना के तहत 18 वर्ष की उम्र तक पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा, पीएम-केयर्स के माध्यम से बीमा प्रीमियम भुगतान, व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए 18 साल की उम्र तक मासिक वित्तीय सहायता जैसी सुविधाएं दी जायेंगी.

अनाथ बच्चों को अन्य सुविधाओं में 23 वर्ष की उम्र पूरा करने पर पीएम-केयर्स से दस लाख की सहायता, कक्षा एक से 12वीं तक 20000 रुपये वार्षिक छात्रवृत्ति, कौशल प्रशिक्षण हेतु कर्म छात्रवृत्ति, तकनीकी शिक्षा के लिए स्वनाथ छात्रवृत्ति, उच्च संस्थानों (आईआईटी, आईआईएम) में अध्ययन हेतु 2.5 लाख प्रतिवर्ष छात्रवृत्ति और 50000 रुपये अनुग्रह राशि प्रदान की जायेगी. अनाथ बच्चों के जोखिम को कम करने और प्रभावी तरीके से उनकी मदद करने में नकदी हस्तांतरण एक कारगर व्यवस्था साबित हो सकती है.

इसके पर्याप्त प्रमाण भी हैं कि नकदी सहायता से बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव होता है. ध्यान देने योग्य है कि बच्चों को मजदूरी से दूर रखने और स्कूली शिक्षा तथा अन्य खर्चों को साधने में नकदी सहायता किस स्तर तक प्रभावी साबित हो सकती है. जीवनयापन के लिए मजदूरी पर निर्भर बच्चे स्कूल कम जाते हैं, जिससे उनका अकादमिक प्रदर्शन खराब होता है.

माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक ग्रेड के बच्चों के लिए समस्या अधिक गंभीर है. अनुभवों से स्पष्ट है कि लागत वहन करने का विकल्प समस्या का समाधान नहीं है. उदाहरण के तौर पर, शिक्षा के अधिकार की धारा 12(1) (सी) के तहत कुछ राज्यों द्वारा अनाथ बच्चों के लिए निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था दी जाती है, लेकिन इसका स्पष्ट सकारात्मक परिणाम नहीं दिखता.

ऐसी समस्याओं का निदान आर्थिक सहायता कार्यक्रमों की संरचना पर टिका होता है. बच्चे सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपत्ति हैं. राष्ट्र की उन्नति और भविष्य इस बात पर टिका है कि बच्चे कैसे बड़े और विकसित होते हैं. संविधान का अनुच्छेद-39 कम उम्र के बच्चे के दुरुपयोग को प्रतिबंधित करता है. अतः यह सामाजिक जिम्मेदारी भी है कि जिन बच्चों के सिर से महामारी के कारण माता-पिता का साया उठ गया है, उनकी अनदेखी न हो और वे अनिश्चित भविष्य के दलदल में न फंसें.