दिल्ली में राजनीति का नया दौर

 


 दो तरह के राजनेता होते हैं, एक वे जो पुनर्भाषित करते हैं और दूसरे वे जो परिष्कृत करते हैं. नरेंद्र मोदी ने विकास और राष्ट्रवाद के वादों को जोड़ कर भारत के विचार को पुनर्भाषित किया है, जबकि अरविंद केजरीवाल ने नरम राष्ट्रवाद के वादे के साथ विकास का परिष्कार किया है. दिल्ली से सात ही लोकसभा सांसद होते हैं. यहां देश की आबादी का लगभग एक फीसदी हिस्सा ही रहता है और इसका क्षेत्रफल 1,483 वर्ग किलोमीटर ही है.

पर देश में और बाहर इसकी चर्चा बहुत अधिक होती है. संयोग से दोनों ने लगभग एक ही समय दिल्ली में सत्ता संभाली थी. वर्ष 2014 में मोदी केंद्र की सत्ता में आये, तो 2015 में केजरीवाल ने मोदी के विजयी रथ को रोकते हुए 70 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा को तीन सीटों पर समेट दिया, जबकि केसरिया खेमे ने राजधानी में लोकसभा की सभी सीटें जीती थीं. तब से भाजपा केजरीवाल की लोकप्रियता को न रोक सकी है और न ही उसे चुनौती दे सकी है.

केजरीवाल के शासन को देश-विदेश में प्रशंसा भी मिल रही है. उन्हें भी मीडिया में मोदी के लगभग बराबर ही जगह मिल रही है. स्थानीय भाजपा नेता उनके सामने पिग्मियों की तरह नजर आते हैं. ऐसे में मोदी-शाह जोड़ी ने पसंदीदा अधिकारियों के जरिये दिल्ली विकास प्राधिकरण, पुलिस, नगर निगमों जैसे शहर के स्थानीय निकायों के काम को दिखाने का जिम्मा संभाला है, जिनका उद्देश्य नया नेतृत्व पैदा करना है.

पहले शाह ने दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में भरोसेमंद राकेश अस्थाना को नियुक्त किया था. यह वैसे सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई लगी थी, पर इसने राजधानी के अभिजात्य नेटवर्क को बड़ा संदेश दिया था. सत्ता से लुटियन दिल्ली की संस्कृति और लोगों को अपदस्थ करने की मोदी की रणनीति का अनुसरण करते हुए अमित शाह ने एक और कदम उठाया है.

चूंकि दिल्ली पर उपराज्यपाल के जरिये केंद्रीय गृह मंत्रालय का नियंत्रण होता है, उन्होंने विनय कुमार सक्सेना को दिल्ली का 22वां उपराज्यपाल नियुक्त किया है. अहमदाबाद से अपना व्यावसायिक करियर शुरू करनेवाले सक्सेना नयी दिल्ली के राजनीतिक और सामाजिक माहौल के लिए अपरिचित हैं. अहमदाबाद में एक स्वयंसेवी संस्था के प्रमुख के रूप में उन्होंने अपने कामकाज के तरीके से मोदी-शाह टीम को प्रभावित किया था.

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी उन्हें दिल्ली लाये और 2015 में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग का अध्यक्ष बनाया. उन्होंने इस आयोग को अरबों रुपये का संगठन बना दिया है तथा स्थानीय कारीगरों और बुनकरों के लिए कारोबारी अवसर पैदा किया है.

छह साल तक उपराज्यपाल रहे गोल्फ पसंद करनेवाले अनिल बैजल पूरी तरह अप्रभावी सिद्ध हुए. उन्हें यह पद एक ताकतवर पूर्व मंत्री के कारण मिला था, जिन्हें लुटियन की संस्कृति प्रिय थी. आम तौर पर सेवानिवृत्त नौकरशाह उपराज्यपाल बनते रहे हैं. पूर्ववर्ती 21 उपराज्यपालों में केवल एएन झा, जगमोहन और पूर्व वायु सेना उपाध्यक्ष एचकेएल कपूर ने ही दिल्ली के मामलों में सक्रिय भूमिका निभायी.

सक्सेना राजनीति या शासन की पृष्ठभूमि से नहीं हैं, लेकिन लगता है कि मोदी व शाह ने उनमें वे खूबियां देखी हैं, जो लुटियन दिल्ली के अन्य नौकरशाहों में उन्हें नहीं मिलीं. आधे दर्जन से अधिक ऐसे अधिकारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और कॉरपोरेट चैनलों से पैरवी लगा रहे थे, पर सक्सेना को इसकी जरूरत नहीं थी, क्योंकि उनके पास मोदी द्वारा तय योग्यता- वांछनीयता और समर्पण- थी.

शपथ के बाद उनके पहले भाषण से इंगित होता है कि वे राज निवास में निष्क्रिय नहीं रहेंगे- ‘आज मैं दिल्ली के हर नागरिक को कहना चाहता हूं कि एक नये उपराज्यपाल ने शपथ ली है, पर मैं स्थानीय अभिभावक के रूप में काम करूंगा. लोग मुझे राज निवास में कम और सड़क पर अधिक देखेंगे. दिल्ली में प्रदूषण की समस्या है. इसके समाधान के लिए हम सरकार और जनता के साथ मिल कर काम करेंगे.’ सक्सेना केजरीवाल से अधिक दिखना चाहते हैं. बैजल ने भाजपा सांसदों और पार्टी पदाधिकारियों को कभी भाव नहीं दिया. उनके अपने क्षेत्र के कार्यक्रमों से ही उन्हें दूर रखा जाता था.

बीते ढाई दशक से भाजपा दलदल में फंसी हुई है. वह मोदी मैजिक से लोकसभा की सात सीटें और संघ के सहयोग से निगमों में जीतती रही है, लेकिन वह विधानसभा पर काबिज होने में कामयाब नहीं हो सकी है. वह राज्य स्तर पर एक समर्थ नेता नहीं पैदा कर सकी, जो कार्यकर्ताओं और विभिन्न गुटों को साथ लेकर चल सके. दिल्ली के प्रशासनिक ढांचे में उपराज्यपाल की एक महत्वपूर्ण भूमिका है कि वह विकास परियोजनाओं में सभी हितधारकों को सक्रिय भागीदार बना कर राजनीतिक नेतृत्व को संरक्षण प्रदान करता है.

भाजपा पर नगर निगमों में भारी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक असफलता के आरोप हैं. अगर अभी चुनाव होते, तो उसके केंद्रीय नेतृत्व को बड़ी पराजय की आशंका थी. लोकसभा चुनाव से पहले ऐसी हार को झेला नहीं जा सकता था. इससे बचाव के लिए गृह मंत्रालय ने तीनों निगमों का एक निकाय में विलय कर दिया और इसे संभालने का जिम्मा योग्य अधिकारियों को दे दिया.

नया निगम उपराज्यपाल के जरिये सीधे गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करेगा, सक्सेना के सामने सड़कों पर उतरकर केजरीवाल का सामना करने का चुनौतीपूर्ण काम है. चूंकि प्रधानमंत्री सभी बड़े सार्वजनिक आयोजनों में भाग लेते हैं, सक्सेना उनके उपस्थित होने के ढेर सारे अवसर पैदा करेंगे. आप सरकार को केंद्रीय मंत्रियों और प्रधानमंत्री की मौजूदगी रास नहीं आती है.

प्रधानमंत्री मोदी ने पद संभालने के साथ ही केंद्रीय तंत्र, न्यायिक प्रणाली और अकादमिक संस्थानों से विरोधी तत्वों का सफाया करना शुरू कर दिया था. कई राज्यों में डबल इंजन की सरकारें स्थापित करने का उनका उद्देश्य सफल रहा है. दिल्ली राज्य इसका एक अपवाद है, जो राजनीतिक रूप से एक सूक्ष्म उपस्थिति है, पर इस पर बहुत कुछ दांव पर लगा है.

सक्सेना से अपेक्षा है कि वे डबल इंजन की सरकार स्थापित करेंगे, जो लोगों के मन-मस्तिष्क पर मोदी की छाप डाल दे और केजरीवाल को एक आकर्षक, पर एक हद तक शक्तिशाली राजनीतिक हौवा बना दे. भारत के सिरमौर शहर में एक ही सिरमौर हो सकता है और मोदी इस बारे में कोई संदेह नहीं रहने देना चाहते कि वह कौन है.