धनबाद : छात्रों की संख्या 66, लेकिन कमरा सिर्फ 2, आज भी बोरा बिछाकर पढ़ने को विवश

 


धनबाद : झारखंड के स्कूलों में आज भी शिक्षा व्यवस्था बदहाल है, आज भी कई स्कलों में बच्चे बोरा में बैठने को विवश है. भले ही अधिकारी लाख दावे कर लें कि सरकारी स्कूलों में बोरा युग खत्म हो चुका है और सभी बच्चों के बैठने के लिए बेंच डेस्क उपलब्ध है. इस दावे की पोल खोलता है टुंडी प्रखंड के मछियारा पंचायत में स्थित नया प्राथमिक विद्यालय चैनपुर. जो कि धनबाद जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर है. इस विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या 66 है लेकिन सिर्फ 2 कमरे में 1 से 5 तक की पढ़ाई होती है. और यहां के बच्चे आज भी बोरा पर बैठ कर पढ़ाई करते हैं. स्कूल में विभाग की ओर से केवल तीन बेंच व टेबल मुहैया करवाया गया है.

इसमें ही पांच कक्षाओं के बच्चे बैठ कर पढ़ते हैं. एक क्लासरूम में पहली से तीसरी कक्षा के छात्र बैठ कर पढ़ाई करते हैं. इनके लिए एक भी बेंच और टेबल नहीं है, जबकि दूसरे क्लास रूम में चौथी और पांचवी के बच्चे पढ़ते हैं. इनके लिए तीन बेंच और टेबल है, जो सभी बच्चों के लिए पूरा नहीं पड़ता. जो बच्चे पहले आते हैं उन्हें बेंच और टेबल पर जगह मिलती है, बाकी को नीचे बोरा पर बैठना पड़ता है.

कोरोना से पहले मिले थे तीन बेंच व डेस्क :

सुरेश प्रसाद सिंह बताते हैं कि विभाग की ओर से कोरोना काल से पहले तीन बेंच और टेबल मिले थे. उस समय कहा गया था कि जल्द ही अन्य बच्चों के लिए और बेंच और टेबल के लिए फंड मिलेगा, लेकिन अभी तक यह नहीं मिला है.

विभाग ने विद्यालयों को सात साल पहले बेंच और टेबल मुहैया कराया था. तब उनकी मांग के अनुसार ही बेंच और टेबल दिया गया था. प्राथमिक विद्यालयों में पहली से तीसरी कक्षा के बच्चों को राउंड टेबल और चौथी व पांचवीं कक्षा के बच्चों को बेंच और टेबल दिया गया था. एक बार फिर जल्द ही स्कूलों से बेंच और टेबल के लिए आवश्यकता के संबंध में जानकारी ली जायेगी. इसके अनुसार राज्य से फंड मांगा जायेगा.

विनय कुमार, असिस्टेंट इंजीनियर, समग्र शिक्षा अभियान

चौथी और पांचवीं के बच्चों के लिए तीन बेंच-डेस्क

विद्यालय के प्रभारी सहायक अध्यापक सुरेश प्रसाद सिंह बताते हैं कि एक बेंच पर अधिकतम तीन बच्चे ही बैठ पाते हैं. इस तरह केवल नौ बच्चे ही बेंच पर बैठ पाते हैं. बेंच पर बैठने के लिए बच्चों में होड़ लगी रहती है. कुछ बच्चे बोरा का इंतजाम खुद करते हैं, तो कुछ को एमडीएम के चावल का खाली बोरा दे दिया जाता है. काफी पहले विभाग की ओर से दरी मिली थी, लेकिन वह सड़ कर खत्म हो चुकी है.