रासायनिक खाद की रैक पहुंची, कमी का संकट दूर होने की संभावना, लेकिन निजी दुकानों से किसानों को खरीदना पड़ रहा है महंगे दाम पर यूरिया


00  नैनो लिक्विड यूरिया भी उपलब्ध हो गई है बाजार में

रायपुर, दुर्ग।
असल बात न्यूज़।। 

ग्रामीण क्षेत्रों में रसायनिक खाद की कमी को दूर करने के लिए प्रशासनिक तौर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, सोसाटियों में खाद उपलब्ध कराया जा रहा है लेकिन अभी भी कई क्षेत्रों में खाद की कमी के संकट की शिकायतें आ रही हैं। रायपुर और दुर्ग दोनों जिलों में इसकी कमी की शिकायतें आ रही हैं। आज पता चला है कि दुर्ग जिले में भी रासायनिक खाद की राय पहुंची है जिसके बाद यहां भी इसका संकट दूर होने की संभावना दिख रही है। रासायनिक खाद की कमी के संकट  पीछे मुख्य तौर पर सोसाटियो के द्वारा समय पर इसका पर्याप्त भंडारण नहीं किया जाना माना जा रहा है। 

 अभी रबी की फसल के लिए रासायनिक खाद की मांग आ रही है। क्षेत्रों में सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं तथा जहां  खेतों में सिंचाई के साधन उपलब्ध करा लिए गए हैं वहां दो फसल ली जाती है। छत्तीसगढ़ राज्य में भी खुशी की बात है कि ऐसे क्षेत्रों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। नदी के किनारे वाले क्षेत्रों में तो शुरू से दो अथवा 3 तक फसल ली जा रही हैं। और मजेदार बात है कि किसानों की इस सीजन में भी धान की फसल लेने में ही अधिक दिलचस्पी दिख रही है। नदी के किनारे वाले ज्यादातर क्षेत्रों में रबी के सीजन में भी धान की फसल लेने की ही परंपरा है। परंपरा के अनुसार इस सीजन में भी किसानों में अभी भी धान का फसल लेने के प्रति दिलचस्पी दिखती है। धान की फसल की आती है तो यूरिया और पोटाश की जरूरत अधिक बढ़ जाती है। यूरिया का उपयोग धान का उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाता है। आम तौर पर मान्यता है कि एक एकड़ खेत में 2 बोरी यूरिया डाला जाना चाहिए। सोसायटियो के द्वारा भी प्रति एकड़ के पीछे एक बोरी यूरिया उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन किसानों के द्वारा उत्पादन बढ़ाने के लिए तीन से चार बोरी तक यूरिया का उपयोग किया जाने लगा है। कहा जाता है कि इससे धान की पैदावार तो बढ़ रही है लेकिन खेतों की हालत बंजर होती जा रही है। और अधिक उपयोग करने की वजह से ही किसानों को निजी दुकानों से यूरिया की खरीददारी करनी पड़ रही है। निजी दुकानदारों को भी मालूम है कि किसान सोसाइटी में उपलब्ध होने के बावजूद उनकी दुकानों में रासायनिक खाद खरीदने पहुंचेंगे। क्योंकि सोसायटियो से एक  सीमा से अधिक खाद नहीं मिल सकता। दुर्ग जिले के पाटन विकासखंड में विकासखंड में सोनपुर, तरीघाट, सिपकोना, जरवाए, झीत, माहुद, तुलसी के साथ बड़ी संख्या में गांव है जहां किसानों के द्वारा  दो फसलें ली जाती हैं। इन इलाकों में धान की फसल ली आती है। वहीं जिन क्षेत्रों में धान की फसल हिंदी आती है वहां किसानों के द्वारा सरसों दलहन तिलहन की फसलें ली जानी शुरू कर दी गई हैं। बताया जाता है कि इस विकासखंड में चंगोरी गांव सरसों का बड़ा उत्पादक क्षेत्र बन गया है। जहां प्रति एकड़ 5 क्विंटल तक सरसों का उत्पादन होने की जानकारी मिली है। बताया जाता है कि इस क्षेत्र में कन्हारी मिट्टी है जिसकी वजह से सरसों की फसल काफी अच्छी हो रही है।इन सभी किसानों को रासायनिक खादों की जरूरत पड़ती है। 
राजस्थानी खादो की कमी होने के और भी कई कारण सामने आ रहे हैं। बताया जाता है कि आंकड़ों में सोसायटियो  में अभी भी पर्याप्त मात्रा में रासायनिक खाद उपलब्ध होना दिख रहा है जिसकी वजह से यहां खाद की आपूर्ति नहीं की जा रही है। जबकि वास्तव में सोसाइटी और निजी दुकानों में खाद का स्टाक उपलब्ध नहीं रहता। वास्तव में स्टाफ उपलब्ध नहीं होने के बावजूद आंकड़ों में उपलब्धता इसलिए दिखती है क्योंकि सोसाइटी और निजी दुकानों को शासन के द्वारा जो पास मशीन उपलब्ध कराई गई है उसमें प्रॉपर इंट्री नहीं की जाती। POS machine और बुक में किसानों का हस्ताक्षर लिया जाना जरूरी है लेकिन राजस्थानी खाद कीअधिक दर पर बिक्री की वजह से इसकी इंट्री नहीं की जाती। ऐसे में रासायनिक खाद की उपलब्धता बराबर नजर आती है।