स्थानीय निकायों को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के संकल्प के साथ मतदान से असल में होगा नए भारत का निर्माण

 रायपुर, दुर्ग।

असल बात न्यूज़।।

    00 विशेष संवाददाता 

     00 अशोक त्रिपाठी

     00 चिंतन, विश्लेषण।।

 देश को वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त बनाना है तो उसकी शुरुआत सर्वप्रथम स्थानीय निकायों को ही भ्रष्टाचार मुक्त बनाने से ही हो सकती हैं। स्थानीय निकाय असल में प्रशासन की प्रथम इकाई अथवा प्रथम पाठशाला कहे जा सकते हैं। यहां जिस तरह से जो कुछ भी होता है, जिस तरह  की कार्य प्रणाली होती है, जिस तरह से कामकाज होता है उससे उसका संदेश दूर दूर तक जाता है। स्थानीय निकाय के प्रत्येक कामकाज से यह मैसेज, यह संदेश जाता है कि शासन प्रशासन की सारी गतिविधियां ऐसे ही चलती है, सारा कामकाज ऐसे ही होता है। जिला स्तर पर, राज्य स्तर पर जब किसी को अपना कोई लेकर जाना पड़ता है, अपना कोई काम लेकर पहुंचता है तो उसके मन में जो धारणा होती है उसे लगता है कि उसी अनुरूप शासन-प्रशासन का काम होता होगा। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि सारे स्थानीय निकाय भ्रष्टाचार के बड़े अड्डे के रूप में तब्दील हो गए हैं। यहां के अधिकारियों कर्मचारियों की पेमेंट मामूली होती है लेकिन जो महत्वपूर्ण पद, कुर्सी पर बैठ गए हैं उनमें से ज्यादातर करोड़पति, अरबपति बन गए हैं। यह किसी से भी छिपा नहीं है कि यहां जो लोग भी किसी भी तरह से निर्वाचित होकर पहुंच जाते हैं वे भी यहां सिर्फ पैसा कमाने के काम में लग जाते हैं। स्थानीय निकायों के निर्वाचित पदों पर पहुंचने का काम एक व्यवसाय के जैसा बन गया है एक बिजनेस बन गया है और अपने निर्वाचन के लिए जो जितना खर्च करता है वह उतना वसूल लेना चाहता है। ऐसे लोग बार-बार यात्रा का देने से भी नहीं चूकते कि जब जनता को पैसा देना पड़ता है तो वे भी पैसा नहीं हासिल करेंगे तो जनता को कहां से लाएंगे। हम सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार होने का बार बार होना रोते हैं लेकिन जब हमारे पास भ्रष्टाचार को  मिटाने, खत्म करने का  संकल्प करने का अवसर आता है तो लगता है कि हम जैसे चूक जाते हैं। हम ढर्रे पर चलने लगते हैं। लगता है जब हमारी सोच सीमित हो जाती है हम अधिक चिंता नहीं करते  और अपने बहुमूल्य  मताधिकार का बिना सोच विचार के उपयोग कर डालते हैं। बाद में, इसके दुष्परिणाम हमारे सामने आते हैं तब हमें लगता है कि ऐसा कैसे हो गया। लेकिन कहा गया है जब चिड़िया चुग गई खेत तब पछताए का होए। स्थानीय निकायों में प्रतिनिधि भेजने के लिए हमारे पास एक बार फिर बड़ा अवसर आ गया है। हमें तय करना है कि हमारा सेवा कौन बने। स्थानीय निकाय में कामकाज किस तरह से चलना चाहिए। पुराने लोगों ने कैसा काम किया है,? क्या विकास किया है ? विकास के नाम क्या भर क्या किया है ? इस सब मुद्दों पर गंभीरता से चिंतन करने  का वक्त आ गया है। हमें ही तय करना है कि हमारा प्रतिनिधि कैसा होना चाहिए और स्थानीय निकाय म क्या भ्रष्टाचार चलते रहना चाहिए अथवा इससे भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए संघर्ष में हम कोई निर्णायक आहुति देंगे। यह सब हो सका तो हम मान सकते हैं कि वास्तव में देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने देश के नवनिर्माण के शुरुआत स्थानीय निकाय के चुनाव से होने जा रही है।

हम सब जानते हैं कि स्थानीय निकाय के लिए हम जो सेवक चुनते  हैं उसका वहां के कामकाज में कितना अधिक हस्तक्षेप होता है वहां वहां के कामकाज को कितना अधिक प्रभावित करता हैं। कई बार तो हमारे सेवक के सामने स्थानीय निकाय प्रशासन पंगु होता नजर आया है और हम जो सेवक चुनते हैं वही तय करता दिखता  है कि कहां का काम होना चाहिए। कहां क्या काम होगा और इससे भी आगे बढ़ कर कि कहां क्या काम नहीं होने दिया जाएगा। अब स्थानीय निकायों का बजट भी काफी बढ़ गया है। इस वजह से साल भर में वास्तव में काम किया है तो शहर की हालत तस्वीर काफी कुछ बदल सकती है। लेकिन हम सब देख कर आ रहे हैं कि हमारे क्षेत्र में, अपने क्षेत्र में जो समस्याएं वर्षों पहले से बनी है वह जस की तस अभी भी बनी हुई है।इन समस्याओं को दूर करने के लिए आया पैसा कहां खर्च हो जाता है ? समझ में ही नहीं आता। लेकिन उसका पूरा पैसा खर्च हो जाता है और उसका कोई हिसाब पूछे भी तो जो हिसाब भी दिया जाता है वह किसी को समझ आता नहीं है। स्थानीय निकायों में अधिकारी कर्मचारी भी महत्वपूर्ण कुर्सी पाने के लिए किस तरह से जोड़-तोड़ करने में रहते हैं, किस तरह से सोर्स, सिफारिश करवाते हैं यह भी किसी से छिपा नहीं है। और ऐसी कुर्सी पर पहुंच जाने के बाद इन अधिकारियों, कर्मचारियों को अरबपति, करोड़पति बनने से कोई नहीं रोक पाता। और सबसे अधिक मजे की बात है कि इनमें से जो अधिकारी, कर्मचारी हैं उनमें से 80% से अधिक की भर्ती  किसी परीक्षा को पास किए बिना हुई है। एक शिक्षित बेरोजगार को रोजगार हासिल करने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है,? कैसी तैयारी करनी पड़ती है ? कैसे परीक्षा देनी पड़ती है ? यह सब वह और उसके परिवार के लोग बेहतर जानते हैं। हमारे पास यह सब मूक बनकर देखने के अलावा कोई रास्ता  बचा नहीं रहता। अभी जिन स्थानीय निकायों में चुनाव होने जा रहे हैं उनमें से ज्यादातर में वहां के लोग  अभी मच्छरों की भरमार की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। यह समस्या अभी तुरंत नहीं पैदा हुई है बल्कि वर्षों से बनी हुई है। लोग ऐसी समस्याओं से जूझ रहे हैं और ऐसी समस्याओ से जूझना लगता है कि उनकी नियति बन गई है।इस बीच कब कोई संक्रामक बीमारी पैर फैलाने लगे, कहां नहीं सकता है। इससे निपटने के लिए स्थानीय प्रशासन का काम चल रहा है और उसे लगता है कि सब चीज हमेशा अच्छा चल रहा है।