कोंडा गांव कांड, उत्पाती तत्वों के आतंक की नई चुनौतियां

 रायपुर।

असल बात न्यूज।।

0  विशेष संवाददाता

गुंडाइज्म ,सभ्य  समाज में भी जब तब बढ़ता दिखता रहा है और समाज में स्वस्थ वातावरण, आपसी सौहार्द को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता रहा है।लग रहा है कि छत्तीसगढ़ राज्य में भी तरह तरह की ताकते राज्य में अशांति फैलाने, कानून व्यवस्था को तोड़ने बिगाड़ने की कोशिशों में बार-बार लगी हुई है। नया मामला कोंडागांव जिले का है जहां ड्यूटी पर लगे पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा बल के जवानों पर नशे में धुत युवकों ने हमला बोल दिया। बताया जा रहा है कि घटना के समय आरोपी युवक बुरी तरह से नशे में धुत थे। वहां गरबा मेला चल रहा था जिसमें आरोपी युवक सामूहिक रूप से एकमत, एकराय होकर उत्पात मचा रहे थे । मेले में जमा भीड़ के द्वारा पुलिस को इसकी सूचना दी गई और सहायता के लिए उन्हें वहां बुलाया गया था। पुलिस प्रशासन के अधिकारियों ने उत्पाती युवकों को रोकने की कोशिश की तो उन उत्पाती लोगों ने अधिकारियों पर भी बुरी तरह से हमला कर दिया। इस तरह के उत्पात,कृत्य की  जितनी निंदा की जाए कम ही है। पुलिस प्रशासन के लोग वहा लॉ एंड ऑर्डर  के लिए देखने के लिए वहां पहुंचे थे तब उन पर हमला बोल दिया गया। यह सिर्फ शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने का यह कृत्य नहीं है बल्कि निश्चित रूप से शासन प्रशासन के समक्ष कानून व्यवस्था बनाए रखने को एक खुली चुनौती देने के तरह का कृत्य  है। विडंबना है कि ऐसा गुंडा इज्म , कृकृत्य उस क्षेत्र में हुआ है जो कि अत्यधिक संवेदनशील है और जहां की पुलिस और सुरक्षा बलों को कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई सारे संकटों कठिनाइयों से जूझना पड़ता है और यह सब बातें सभी आम लोगों को भी भलीभांति मालूम है। नागरिकों से कहीं भी उत्पात अशांति फैलाने के जैसा कृत्य करने से बचने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जिससे लग रहा है कि कई जगह गुंडई का भूत बेखौफ होकर सिर चढ़कर बोल रहा है।

सुरक्षा बल, कानून व्यवस्था बनाने के काम में जुटे लोगों के साथ जब दुर्व्यवहार अनुचित कृत्य होता है तो यह सवाल बार-बार उठता है कि जब कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ड्यूटी पर जाना आप लोगों की सुरक्षा करेंगे तो आम जनता कैसे सुरक्षित रह जाएगी। कोंडा गांव में भी अभी यह सवाल उठ रहा है और वहां से खड़ा हुआ यह सवाल धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल रहा है। इसी के साथ ही यहां यह भी सवाल उठ रहा है क्या राजनीतिक संरक्षण मिल जाने बस से ही किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने और कानून व्यवस्था  को तार-तार कर देने की इजाजत मिल जाती है। उस गरबा मेले में शामिल महिलाओं बुजुर्गों और बच्चों को वह पल हमेशा याद रहेगा जब उत्पाती युवकों पास में जा रहे थे और किसी के भी रोकने टोकने पर उस पर हमला करने पर उतारू थे। लग रहा था कि उनपर कोई डर दबाव बाकी रह ही नहीं गया है। स्थिति काफी बिगड़ते देखकर लोगो ने पुलिस बुला ली। कानून व्यवस्था  को संभालने का पुलिस प्रशासन के जिम्मे में है। उत्पाती लोगों का मनोबल इतना बैठा हुआ था कि किसी को भी सुनने को तैयार नहीं हो रहे थे। पुलिस अधिकारियों ने दबाव बनाया तो उन पर हमला बोल दिया गया। राजनीतिक संरक्षण में इतना मनोबल बढ़ जाने को कहीं भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। है तो है, और राजनीतिक संरक्षण के रौब से दूसरों का जीवन मुश्किल करने की छूट तो नहीं दी जा सकती।

 राजनीतिक संरक्षण में  पल बढ़ रहे ऐसे तत्व हर हाल में अपनी मनमानी करना चाहते हैं और अपनी गुंडई के सामने दूसरे को कुछ नहीं समझना चाहते। ऐसा लगने लगा है कि कई तरह के संरक्षण के चलते ऐसे तत्वों ने सभ्य समाज में सामान्य लोगों का एक तरह से जीवन दूभर कर देने को अपना पेशा बना लिया है। इसे लोकतंत्र में, सभ्य समाज में कतई स्वीकार नहीं कर सकता। कतई बर्दाश्त नहीं जा सकता।यह सोचने की जरूरत है कि ऐसी गुंडई  समाज को आखिर किस दिशा की ओर ले जाना चाहती है। यहां अपराध को सहन कर लेने, बर्दाश्त करने के लिए कोई जगह बची ही नहीं रह गई है। जब कानून के रक्षकों पर ही हमले होने लगे तो बर्दाश्त करने की कहीं जगह बकी नहीं रह जाती, क्योंकि उनकी तो हम सबकी ही रक्षा करने के लिए ड्यूटी लगी हुई  हैं।  वे ही अपनी रक्षा करने में असहाय साबित होने लगेंगे तो हमारे बीच कानून व्यवस्था तो भगवान भरोसे ही होकर रह जाएगा।