क्या ऐसे मुद्दे भी जुड़ेंगे किसान आंदोलनों से ?

  •  रायपुर, दुर्ग।
  • असल बात न्यूज़।।
0 विशेष संवाददाता

गांव के गौठान, चारागाह, खलिहान तालाब, धरसा की जमीन, वृक्षारोपण की सुरक्षित भूमि दूसरों को आवंटित करने की शिकायतें बहुत पहले से रही हैं। सरकारी अमले के द्वारा वास्तविकताओं, व्यवस्थाओं पर जाने के लिए ऐसा आवंटन कर दिया जाता रहा है। गांव के साथ ऐसा खिलवाड़ होने से ग्रामीण परिवेश, ग्रामीण व्यवस्थाओं को बड़ा नुकसान होता है। बहुत सारे लोग, अपने निजी फायदे के लिए ग्रामीण इलाकों में कोई ना कोई भूमि एन केन प्रकारेण हासिल करने में लगे हुए हैं।ऐसा आज से ही नहीं वर्षों से चला आ रहा है। यह सब इसलिए भी संभव हो जाता रहा है क्योंकि सीधे साधे, भोले भाले अपने काम से काम रखने वाले सरल सहनशील ग्रामीणों ने ऐसी ज्यादतियों के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाई। ऐसी परिस्थितियों में शासन प्रशासन की ग्रामीणों के हितों की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। शासन प्रशासन का सीधे सरल ग्रामीणों के हितों को छीनने, नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर उनके सीने पर छुरा भोंकने  के जैसा कृत्य करने वालों   से सुरक्षा दिलाना प्राथमिक दायित्व है।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि भूमि की मांग और दाम बढ़ते जाने के साथ में ग्रामीण इलाकों में भी बड़ी संख्या में भू माफिया सक्रिय हो गए हैं और उनकी वहां के कीमती जमीनों पर नजर लगी हुई है। ऐसी जमीनों को वह किसी न किसी तरह से हासिल कर लेना चाहते हैं। कई कई गांव में अभी भी धरसा की जमीन अतिक्रमित कर ली जा रही है। दुर्ग जिले के पाटन विकासखंड के गांव में धरसा की जमीन पर अतिक्रमण कर लेने से वहां मनरेगा का काम तक नहीं किया सका। वहां के सचिव ने बताया कि धरसा की जमीन पर कब्जा कर लेने से मजदूरों का मनरेगा के काम वाले स्थल पर आना जाना नहीं हो सका और हम काम नहीं कर सके। गांव की पशुओं के चरने की सुरक्षित भूमि, गौठान, तालाब की जमीनों पर कब्जा कर लेने तथा उसे नाम से आवंटित करा लेने के किस्से तो वर्ष वर्ष पहले से चले आ रहे हैं। असल में राजस्व विभाग से संबंधित ऐसे मामले आम ग्रामीणों को सरलता से समाज में ही नहीं आते और ऐसे मामलों में शासन प्रशासन के द्वारा क्या किया जा रहा है वे ऐसे पशुओं में पड़ने से बचना चाहते हैं। राज्य सरकार ने अभी छत्तीसगढ़ में गांव गांव में  गौठान बनाने का संकल्प किया है।कहा जाता है कि इसमें सरकार और प्रशासनिक अमले को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है क्योंकि गांव गांव के पूर्व से बने गौठान की जमीनों पर कब्जा कर लिया गया है। कई गांव में तो ऐसे कब्जे की वजह से सरकार को गौठान के लिए अलग से जमीन तक आवंटित करनी पड़ी है। गांव-गाव में यह समस्याएं बढ़ती जा रही है। गांव की खाली जमीन पर अतिक्रमण की समस्या बढ़ती जा रही है। जनसंख्या बढ़ने की वजह से भी गांव की भूमि पर बोझ बढ़ा है।
वास्तविकता यह है कि गांव के ही निवासियों को यह  मालूम नहीं रहता है कि उनके गांव की ही कौन सी जमीन किस कार्य के लिए सुरक्षित है तथा उसका उपयोग किस तरह से किया जा रहा है और वे उस से क्या फायदा उठा सकते हैं। ऐसे में चलाक तत्व जानकारी एकत्रित  करते हैं कि वे किस गांव की कौन सी जमीन को अपने फायदे के लिए किस तरह से हथिया सकते हैं। यह कहा जाना स्वाभाविक है कि ऐसे कृत्यों को शासन-प्रशासन के स्थानीय अमले के सहयोग के बिना अंजाम देना संभव नहीं हो सकता।
दुर्ग जिले के ग्राम कचंदूर में गांव की जमीन को आवंटित करने के प्रस्ताव पर बड़ा हंगामा शुरू हो गया है। शासन के इस प्रस्ताव के खिलाफ स्थानीय ग्राम पंचायत ने कड़ी आपत्ति की है। यहां के सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण इस मामले में आपत्ति कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि राजनीतिक संरक्षण में प्रक्रिया की जा रही है। लोग यह भी सवाल उठा रहें हैं कि किसी को कैसे जानकारी हासिल हुई थी इस गांव में वह जमीन किसी काम के लिए आवंटित की जा सकती है।इस बारे में जानकारी देने वाले अधिकारी पर भी कार्रवाई करने की मांग उठाई जा रही है। स्थानीय ग्रामीण इस पूरे मामले की एसआईटी से जांच कराने की मांग करने लगे हैं। फिलहाल प्रशासन को निर्णय लेना है कि अशांत ग्रामीणों का गुस्सा कैसे कम होगा। और ग्रामीणों के हितों की सुरक्षा कैसे की जा सकती है।