अल्प वर्षा से पाटन विकासखंड के भी कई क्षेत्रों में 60% से अधिक फसल खराब, किसान चिंतित

ऐसी अल्प वर्षा की हालत कि, इस मानसून सीजन में खारून नदी में नहीं आया कभी उफान
  •  रायपुर, दुर्ग।
  • असल बात न्यूज़।।

  • 0 कृषि संवाददाता
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यह अभी धान के पौधे के गर्भधारण का समय है। जब मौसम अनुकूल होता है जो इस समय में धान के पौधे में सुंदर बालियां आने लगती हैं। धान के पौधे झूमने लगते हैं। उनकी मीठी महक चारों तरफ फैली लगती है। इस साल अल्प वर्षा की वजह से धान  के पौधे  को समय पर पर्याप्त पानी नहीं मिला है। समय-समय पर पानी मिलने से धान के पौधे की महक, चमक और सुंदरता हर दिन मनमोहक होकर बढ़ती नजर आती है। इस साल हर जगह अल्प वर्षा और खंड वर्षा हुई है। इस ने  धान के पौधे की बढ़ोतरी को  पूरे छत्तीसगढ़ में व्यापक तौर पर प्रभावित किया है। खेतों में जगह-जगह पीले मुरझाए धान के पौधे खड़े नजर आ रहे हैं। अठखेलियां खाती,  लहलहाती, महक फैलाती, सुंदर धान की बालियां को जैसे नजर लग गया है। चिंतित किसानों को भी समझ नहीं आ रहा है कि ऐसा कैसे हो गया है। फिलहाल प्रकृति के आगे सब बेबस नजर आ रहे हैं।
सबको लगता है कि नहरों से खेतों में हर जगह पानी पहुंचने लगा है।चाहे कोई भी मौसम हो, कितना भी सूखा पड़े, खेतों को पर्याप्त पानी मिल जाएगा। जहां नेहरू से पानी नहीं पहुंच रहा है वहां ट्यूबवेल लग गए हैं और खेतों को पानी मिल जाता है। जिससे अल्प वर्षा होने सूखा पड़ने पर भी खेत लहलहाते ही रहेंगे। धरातल पर हर जगह ऐसा नहीं है। यह तो सबको मालूम है कि नहर से पानी पहुंचने की एक निश्चित सीमाएं हैं। उससे आगे नहरों से पानी खेतों तक नहीं पहुंचता। दूसरी तरफ बिजली भले ही गांव कांटा पहुंच गई है और सौर ऊर्जा के पंप भी लगाए गए हो लेकिन हर जगह यह भी सक्सेस नहीं है। अब समझ में आ रहा है कि जहां भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है वहां ऐसे पंप, tubewell बिल्कुल असफल साबित हो रहे हैं। सिंचाई के पंप लग गए हैं लेकिन उन से पानी नहीं निकल रहा है। धान के सूखते जा रहे पौधों को इन पंपों से पानी नहीं मिल रहा है। ऐसे हालत जब सामने आते हैं तब पता चलता है कि सरकारी योजनाओं का यथार्थ क्या है। उनकी क्या उपयोगिता है और कहां तक सीमाएं हैं। उन योजनाओं से आम लोगों को वास्तव में कितना फायदा पहुंच सकता है या पहुंचता है।अभी आ बात सामने आ रहे कि भूजल स्तर काफी नीचे होने की वजह से कई क्षेत्रों में हैंडपंप बिल्कुल असफल साबित हुए हैं। सूखे से निपटने में ये बिल्कुल नकारा साबित हो रहे हैं। ऐसे हालत में इससे अभी भी बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता कि छत्तीसगढ़ में हमारी कृषि अभी भी मानसून पर पर ही निर्भर है। मानसून पर निर्भरता की वजह से किसानों की आमदनी बढ़ाने का सपना साकार करने की राह निश्चित रूप से अभी भी काफी कठिन है। अल्प वर्षा से जूझ रहे किसानों को राज्य सरकार से सूखे पर मुआवजा के मदद का ही अब आसरा रह गया है।वैसे इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रमुख नदियों  के किनारे वाली क्षेत्रों में धान की फसल अभी भी अच्छी होने की संभावना है।
ताजा जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ प्रदेश के ज्यादातर हिस्से अल्प वर्षा, खंड वर्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। दुर्ग जिले के पाटन विधानसभा क्षेत्र के भी ज्यादातर हिस्सों में यह समस्या नजर आ रही है। यहां की जनपद पंचायत अध्यक्षा श्रीमती रामबाई गजानन सिन्हा बता ती हैं- कई क्षेत्रों में तो यहां 80% तक फसल खराब हो गई है। खेतों को पानी बिल्कुल नहीं मिला है। धान के पौधे सूखकर पीले पड़ गए हैं। हर जगह किसान चिंतित हैं। सरकार ने सूखे से नुकसान होने के लिए किसानों को मदद का जो आश्वासन दिया है वही एक राहत की किरण दिख रही है। वे बताती हैं पाटन विकासखंड के ग्राम कापसी में 80% तक फसल खराब हो गई है। मोतीपुर में भी ऐसे ही हालात हैं।
हमने विभिन्न इलाकों का जायजा लिया है। किसानों से बातचीत की है। किसानों से यह पूछे जाने पर कि सिंचाई पंप की सुविधा मिलने के बावजूद खेत सूखे क्यों हैं बताया कि सिंचाई पंप हर जगह सफल नहीं हो रहे हैं। कई लोगों ने पंप लगा लिया है लेकिन पानी नहीं आ रहा है। नहरों से भी पानी नहीं छोड़ा गया है।यह भी कहा जा रहा है कि नहर से पानी छोड़ भी आईडी आया था तो बहुत कारगर साबित नहीं होता। यहां नहरों से सभी इलाकों में खेतों तक पानी पहुंचने की सुविधा  नहीं है।
हम सिर्फ पाटन विधानसभा क्षेत्र की ही बात करें तो यहां के झीठ, महुदा उफरा, पौहा भैंस बोड, कुम्हली, मर्रा, गुढ़ियारी अम्लोरी, जैसे गांव के भी अल्प वर्षा की चपेट में आने का पता चला है।बताया जाता है कि अभी पिछले तीन-चार दिनों से कुछ इलाकों में खंड वर्षा हुई है।इसके पहले ना के बराबर बारिश हो रही थी। तेज धूप निकल रही थी। इस तेज धूप से फसल को अधिक नुकसान हुआ है। फसल मुरझा कर पीली पड़ रही है। जब धान की फसल के गर्भ धारण करने का समय है तो वह पीली  पड कर मुरझा जा रही है। धान के पौधों की ऐसी हालत देखकर किसानों के चेहरे भी मुरझा  रहे हैं। शायद, भगवान को कुछ और ही मंजूर हो और संभवत वह इस घड़ी में किसानों की परीक्षा ले रहा है। किसानों का कहना है कि जन्माष्टमी पर के एक-दो दिन पहले अच्छी बारिश हो जाती तब भी पौधे संभल जाते। जो सूखे का डर पैदा हो गया है वह कम हो जाता। अभी भी खेत वाले क्षेत्रों में जहां बारिश हो रही है धान के पौधों को कुछ फायदा जरूर मिलेगा, लेकिन इनकी बढ़ोतरी में बहुत अधिक सुधार नहीं आ पाएगा।यह भी कहा जा रहा है कि जो किसान रोपा पद्धति से धान लगाते हैं उन्हें और अधिक नुकसान हुआ है। गांव गांव में अभी से तालाबों में भी पानी नहीं है।इस साल कहीं इतनी अधिक बारिश नहीं हुई कि तलाब भर सकें। मानसून के सीजन में खारून नदी में कभी उफान नहीं आया। 
धान के कुछ पौधे 90 दिन वाले होते हैं तो कुछ 120 दिन वाले। 90 दिन वालों में जल्दी बालियां आ जाती है तो 120 दिन वाले पौधों में देर से बालियां आती है। सितंबर महीने के दूसरे सप्ताह से गर्भधारण शुरू हो जाता है तो अक्टूबर महीने के पहले सप्ताह से फसल पकने लगती है। यह धान के पौधों गर्भधारण का समय चल रहा है। लेकिन तेज धूप, गर्मी और सूखते खेतों को देख कर सिर्फ बैचेनी बढ़ रही है। यह बताया जा रहा है कि 2 दिन पहले औंधी,औरी और क्षेत्र में अच्छी बारिश हुई। लेकिन यह खंड वर्षा इतनी सीमित थी कि यह पानी छाटा,उतई लोहारसी इत्यादि क्षेत्र तक भी नहीं था।
सूखे की मार झेल रहे किसान राज्य सरकार की घोषणा से आस लगाए बैठे हैं।राज्य सरकार ने सूखा पीड़ित किसानों को प्रति हेक्टेयर ₹9000 मुआवजा देने की घोषणा की है। किसानों को इस राशि को बढ़ाकर 15 हजार रुपए तक करने की भी मांग की जा रही है।



धान केे पौधों में  दिख रहा है पीलापन




ऐसे हो रही है खंड  वर्षा, एक सीमित क्षेत्र में कुछ घंटे की बारिश। तो बाकी क्षेत्र सूखे पड़े हैं। भादो में हैं ऐसे हालत।