22 पण्डो के घर तोड़ने की खबर को वन विभाग द्वारा बताया गया निराधार

 

ग्रामीणजनों के शिकायत पर वन विभाग द्वारा नियमानुसार की गयी थी कार्यवाही, मारपीट व अभद्रता के आरोप तथ्यहीन


बलरामपुर ।

असल बात न्यूज़।।

  पंडो जनजाति समुदाय के लोगों से अभद्रता और मारपीट की खबर को वन विभाग ने निराधार बताया है। संयुक्त वनमण्डलाधिकारी से प्राप्त प्रतिवेदन के अनुसार बीट गार्ड विरेंद्रनगर को ग्रामीणों के द्वारा अवैध अतिक्रमण की शिकायत प्राप्त हुई थी। तत्पश्चात वनपरिक्षेत्राधिकरी ने 19 वनकर्मियों के दल को अतिक्रमण रोकने और आवश्यक कार्यवाही करने हेतु भेजा था।

 उक्त टीम के साथ-साथ ग्राम विरेंद्रनगर के 30 से 35 लोग उपस्थित थे। संरक्षित वन के भीतर विकासखंड वाड्रफनगर के बैकुंठपुर निवासी श्री रामजन्म यादव के द्वारा कच्चे दीवार से बने एक कमरे को खपरे से छाकर अवैध अतिक्रमण किया गया था तथा बैकुंठपुर के बालेश्वर के साथ ही अन्य 20 व्यक्तियों द्वारा अवैध अतिक्रमण के उद्देश्य से बल्ली व खूंटे से झाला बनाया गया था और उसके ऊपर प्लास्टिक की पन्नी लगायी गई थी। वन अमले द्वारा विरेंद्रनगर नगर के लोगों के समक्ष अतिक्रमण हटाने हेतु समझाया गया और आपसी समझौते से अतिक्रमण हटा भी लिया गया। उक्त अतिक्रमण एक माह पूराना है तथा शिकायत के आधार पर वन अपराध प्रकरण क्रमांक 16854 व 16855 जारी किया गया था। जिस संबंध में वनपरिक्षेत्राधिकरी वाड्रफनगर के निर्देशन में अवैध अतिक्रमण हटाने का प्रयास किया गया तथा अतिक्रमण हटाए जाने के दौरान किसी भी प्रकार की अभद्रता, गाली-गलौज मारपीट नहीं की गई। अतिक्रमण हटाने के दौरान पर्याप्त संख्या में पुरुष व महिला वनकर्मी उपस्थित थे।

 कार्यवाही के पश्चात श्री रामजन्म यादव के द्वारा भोले भाले पंडो जाति के लोगो को बरगला कर अनावश्यक आरोप लगाए जा रहे हैं ताकि अन्य लोगों के द्वारा अतिक्रमण किया जा सके। प्रकरण की समीक्षा में दो प्रमुख तथ्य सामने आये हैं जिसमें संरक्षित वन कक्ष क्रमांक पी0 836 एवं पी0 840 के अतिक्रमण स्थल का जीपीएस कोऑडिनेट लेकर वर्षवार मिलान किया गया। जिसमें वर्ष 2004, 2012 तथा 2017 के मैप में कही भी उक्त कक्षों में कही भी अतिक्रमण व कब्जा दिखाई नहीं दे रहा है। इससे स्पष्ट है कि उक्त दोनों कक्षों में किया गया अतिक्रमण नया है। साथ ही जांच में एक अन्य तथ्य सामने आया जिसमें कि उक्त अतिक्रमकों का स्वयं का भवन बैकुण्ठपुर में है तथा वे अतिक्रमित वनभूमि पर जीविकोपार्जन हेतु आश्रित नहीं है।