नारी शक्ति को बार-बार प्रणाम.... शत-शत नमन ...


अनाज उगाने में भी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है महिलाओं की, लेकिन शायद ही कभी मिला होगा उन्हें इसका कोई श्रेय

 रायपुर, दुर्ग। असल बात न्यूज़।

0 विशेष संवाददाता.

0 अशोक त्रिपाठी

हम जब खेती किसानी की बात करते हैं, किसान की बात करते हैं, उपज की बात करते हैं तो हमारे सामने किसान के रूप में आदमी का ही चेहरा सामने आता है। हमें यही महसूस होता है, लगता है कि खेती किसानी में सब कुछ आदमी पर ही निर्भर है। वही मेहनत करता है, वही अन्न उपजाता है। खेती किसानी, उसी के ही मेहनत कठिन परिश्रम और संघर्ष की बदौलत ही हो पाती है।इसमें महिलाओं, स्त्रियों की कोई भूमिका तो होती ही नहीं है।खेती किसानी का ऐसा जो चित्र परिदृश्य नजर आता है वह सिर्फ भारत कह रही पूरी दुनिया में ऐसा ही परिदृश्य महसूस होता है। जबकि वास्तविकता इसके काफी कुछ विपरीत है।




लेकिन हम यहां चित्र में देख रहे हैं। खेतों में बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती हुई दिख रही हैं। बड़ी संख्या में महिलाएं, मेहनत कर रही हैं। ये महिलाएं यहां खेतों में धान की रोपाई का काम कर रही है। इस साल अच्छी बारिश हुई है, जगह जगह खेतों में पानी लबालब भरा हुआ है और अभी रोपाई का कार्य तेजी पर है। खेतों में ये महिलाएं ही,  प्रति वर्ष धान की रोपाई का काम करती हैं। खेती किसानी की जो बात करते हैं किसान की जो बात करते हैं, ऐसी बातों में यह कभी जिक्र नहीं होता है कि खेतों में, खेती किसानी के पीछे जो मेहनत होती है उसमें महिलाओं का भी बड़ा हिस्सा होता है। महिलाएं बड़ी मेहनत करके खेतों को हरा भरा बनाती है।अनज उपजाने में उनका भी अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान होता है।उनकी बड़ी मेहनत, सतत निगरानी के फल स्वरुप अनाज का उत्पादन होता है। ऐसा आदम जमाने से चला रहा है कि,महिलाओं को महत्वपूर्ण कामों में श्रेय देने से बचने की कोशिश की जाती है। अभी भी वही हो रहा है।उनकी योग्यताओं को हमेशा दरकिनार करने की कोशिश की गई है और खेती किसानी में भी यही होता है।खेती किसानी में महिलाओं की मेहनत के बारे में कोई बात नहीं करता। बातें ऐसे ही की जाती है कि खेतों में सिर्फ आदमी मेहनत करता है, संघर्ष करता है और कठिन मेहनत करके अन्न उपजाता है। इससे भी पता चलता है कि अभी भी समाज कितना अधिक पुरुष प्रधान है। और कितनी भी बराबरी की बात कर ली जाए,कंधे से कंधा मिलाकर चलने की बात भी कर ली जाए महिलाओं को हर जगह बराबरी का दर्जा अभी भी नहीं मिलता है। हमारा जो पुरातन पेशा रहा है, जिस खेती किसानी से लोगों का पेट भरने का काम होता है उस खेती किसानी  में सिर्फ आदमी ही नहीं महिलाओं की भी बड़ी भूमिका होती है। और महिलाये कठिन परिस्थितियों में कठिन मेहनत ना करें, धैर्य के साथ कम मजदूरी में काम ना करें तो अन्न उपजाना आसान नहीं रह जाएगा।

महिलाएं, flight उड़ा रही है, शिक्षा के क्षेत्र में बड़े नाम कर रही हैं, उद्योगों, कारपोरेट, सरकारी कार्यालयों में बड़े-बड़े काम कर रहे हैं। उनकी तारीफों में बड़े-बड़े कसीदे गढ़े जाते हैं। खेतों में काम करने वाली ये परिश्रमी अन्न उगाने वाली महिलाएं घंटों पानी में खड़े रहकर धान की रोपाई करती हैं, लेकिन उसकी तारीफ में आज तक शायद ही अभी कहीं  एक शब्द कहा गया हो। शायद ही कहीं किसी ने एक अक्षर की भी तारीफ की होगी। खेती किसानी के हालत को देखें,तो इस सच्चाई का पता चल जाएगा कि वास्तव में इन्हीं परिश्रमी मेहनतकश महिलाओं के दम पर ही खेतों में अनाज उपजता है। धान की रोपाई करते हुए  पुरुषों को  शायद ही कहीं देखा गया हो। आज तक समाचार पत्रों अथवा दूसरे अन्य कहीं भी जगह पर धान की रोपाई करते हुए  सिर्फ महिलाओं की फोटो ही छपी देखी गई है। किसी खेत में शायद ही कभी कोई पुरुष धान की रोपाई का काम करता हुआ नजर आया हो। शायद ही कभी धान की रोपाई करते हुए पुरुषों की फोटो छपी होगी। असल में धान की रोपाई के साथ खेतों में मेहनत का बड़ा काम हमेशा से महिलाओं के ही जिम्मे में रहा है और वह इन कार्यों को बड़ी कुशलता पूरा करती है।वे धान की रोपाई का काम तो करते ही हैं खेतों में सतत निगरानी में भर्ती हैं, धान के पौधों की समुचित तरीके से लगातार बढ़ोतरी हो रही है कि नहीं वे ही इस पर बारीकी से नजर रखती हैं। कहा जा सकता है कि धैर्य और परिश्रम से किए गए कार्यों के फल स्वरूप ही खेतों में अनाज की पैदावार अच्छी होती है। लेकिन खेतों में अनाज की अच्छी उपज का श्रेय शायद ही कभी महिलाओं को दिया गया है। अथवा देने की कोशिश की गई हो। मानसिकता तो ऐसी  है और ऐसी ही तस्वीर पेश की जाती है कि  सोचना, समझना ही कठिन हो जाता है कि महिलाओं की भी खेती किसानी में कोई महत्वपूर्ण भूमिका होती होगी।महिलाओं की भी खेती किसानी में कोई दखल होती होगी। श्रेय देने की बात तो दूर है,कभी कहीं कोई जिक्र होता नजर नहीं आया है कि महिलाएं भी खेती किसानी के कामों में बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन करती हैं। 


अभी खरीफ फसल की बोवाई का काम फिर से शुरू हो गया है। हम कहीं भी जा कर देख लें, खेतों में यह कठिन काम करते हुए, घंटो घंटो तक पानी में खड़े रहकर काम करते हुए महिलाएं ही नजर आएंगी। हर जगह से ही यह काम लिया जाता है।लेकिन शायद ही कोई कहने को तैयार होता है कि अनाज उप जाने में हमारे मातृशक्ति की ही सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है।ये परिश्रमी, धैर्यवान महिलाएं आज भी खेतों में अधिक मेहनत के कामों को सहजता पूर्वक निपटाती हैं। वह भी अपेक्षाकृत काफी कम मजदूरी लेकर। पुरुष प्रधान समाज में धान की रुपए के काम को अकुशल मजदूरों के काम की श्रेणी में रख दिया गया है। यह कहना अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं होगा कि महिलाएं धान की रोपाई का काम है पूरी कुशलता से ना करें तो खेतों में जो पैदावार होती है, उतना अन्न उपजना नामुमकिन ही होगा।

इसलिए मातृशक्ति को शत शत प्रणाम।






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