तथ्य, स्वाधीनता के समय भारत कितना अधिक समृद्ध रहा है पता चलता है विभिन्न मामलों से

 नई दिल्ली। असल बात न्यूज

0  विधि संवाददाता 

0 स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

देश में आज हम विकास की बात कर रहे हैं। हम विकास की ओर आगे बढ़ रहे हैं। यहां चुनाव विकास के नाम पर लड़े जाने लगे हैं, लड़े जा रहे हैं और विकास के नाम पर जीत हार हो रही है। लेकिन देश में हालात हर समय ऐसे ही नहीं थे। स्वाधीनता मिलने के समय देश में कई सारी समस्याएं थी। देश के लोगों को कई तरह की समस्याओ से जूझना पड़ रहा था। पूरे देश को  तरह तरह की समस्याओं से जूझना पड़ रहा था। देश में अनाज की कमी की समस्या थी। लोगों को सुरक्षा के संकट से जूझना पड़ता था। अपराध, चोरी, लूट,मारकाट उन दिनों सामान्य सी घटनाये हो गई थी। जान माल की सुरक्षा का चारों तरफ अभाव था। शुद्ध पेयजल, सड़क, चिकित्सा स्कूल जैसी सुविधाओं की नाममात्र की उपलब्धता थी,। लाखों लोगों को दो वक्त का भोजन तक नहीं मिलता था।लोग विभिन्न प्रकार की  शंका कुशंका से जूझते हुए अपना जीवन यापन करते थे।

उन्हीं दिनों का यह चर्चित मामला है। ऐतिहासिक मामला है।यह न्यायिक मामला है। नई पीढ़ी को भी ऐसे मामलों की जानकारी जरूर होनी चाहिए। इसकी समझ होनी चाहिए कि हमारे देश में विभिन्न कालों के दौरान किस तरह की घटनाएं होती थी।स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जिन लोगों ने देश को आजादी दिलाने के लिए अपनी जान दे दी है उन लोगों ने किस तरह की यातनाएं भोगी होगी, इसे भी नई पीढ़ी को अनिवार्य रूप से जानना और समझना चाहिए।तमाम शातिर लोग, देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद भी देश में विभिन्न मुसीबतें खड़ी करने में लगे हुए थे।

हम जिस क्षेत्र का जिस मामले का उल्लेख कर रहे हैं उसे सिर्फ न्याय क्षेत्र से जुड़ा हुआ मामला नहीं समझना चाहिए। ऐसे मामलों को समझने से हमें पता चलता है कि उस समय देश काल की क्या परिस्थितियां थी।देश किन हालातों से गुजर रहा था। किन समस्याओं से जूझ रहा था। किस तरह के, कैसे-कैसे अपराध होते थे जो देश के समक्ष नई चुनौतियां पैदा कर रहे थे। देश स्वाधीनता मिलने के बाद उन दोनों अपने पैरों पर खड़ा होने की ओर आगे बढ़ ने के लिए चहल कदमी रहा था लेकिन ये समस्याएं देश को पीछे की ओर धकेलने के लिए लगातार तुली हुई थी।

इस मामले का विवरण इस प्रकार है।इस मामले को कस्तूरी लाल रलिया राम जैन उत्तर प्रदेश सरकार के नाम से भी जाना जाता है। अपीलांट एक रजिस्टर्ड फ़र्म है।वह जेवरात व अन्य सामान बेचने का अमृतसर में व्यापार करती है। रलिया राम उसका एक साझेदार था। देश को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली। 20 सितंबर सन 1947 को रलिया राम फ्रंटियर मेल से अर्धरात्रि को मेरठ आया। उसका उद्देश्य, मेरठ में सोना चांदी व अन्य सामान को बेचना था। मामले के अनुसार जब वह चोपला बाजार से गुजर रहा था, तभी तीन पुलिस सिपाहियों ने उस को अपनी हिरासत में ले लिया। उसके सामान की तलाशी ली गई। उसको वहां के कोतवाली पुलिस स्टेशन ले जाया गया। उसको बंद कर दिया गया तथा उसके  सामान सोना वजन 103 तोला, 6 माशा एक रत्ती और चांदी वजन दो मन 6 सेर को छीन लिया गया। और वहां पुलिस की निगरानी में रख दिया गया। आज आप कल्पना कर सकते इतने सारे सोना चांदी की आज कितनी कीमत होगी। भारत देश को ऐसे ही नहीं सोने चिड़िया कहा जाता है। भारत वास्तव धनधान्य, Vaibhav , संपदा, सुख समृद्धि से अत्यंत भरपूर था। इसीलिए दूसरे देशों की आंखें हमारे देश की और लगी रहती है। रलिया राम को 21 सितंबर को जमानत पर छोड़ दिया जाता है।

जमानत पर बाहर आने के बाद रलिया राम को चांदी वापस कर दी गई। किंतु उसे सोना वापस नहीं किया गया। अपने सोने की वापसी के लिए रलिया राम ने कई बार तकाजा किया।सोना वापस नहीं मिलने पर उसने मुकदमा दायर किया जिसमें या तो जब्त सोना लौटाया जाए या उसकी कीमत व ब्याज की क्षतिपूर्ति का दावा किया गया।

Respodent ने मामले में लिखित कथन दायर किया तथा वाद का प्रतिरोध किया।प्रतिवादी की ओर से कहा गया कि वह ना तो सोना लौटाने और ना ही उसकी कीमत अदा करने के लिए जिम्मेदार है। Respondent का कहना था कि मोहम्मद अमीर हेड कांस्टेबल जिसके चार्ज में मालखाने में इस सोने के साथ बहुत सी वस्तुएं रखी गई थी उन सब को लेकर वह 17 अक्टूबर सन 1947 को पाकिस्तान चला गया था।

Respondent की ओर से बचाव में यह भी कहा गया कि पुलिस अधिकारियों की कोई असावधानी नहीं है।यदि असावधानी सिद्ध भी हो जाती है तो  राज्य सरकार इस क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मेदार नहीं है।

यह मामला देश के माननीय उच्चतम न्यायालय में गया। माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष मुख्य विचारणीय प्रश्न यह था कि क्या वह पुलिस स्टेशन जहां की सोना रखा गया था उसके पुलिस अधिकारी के प्रमाद के कारण सोने का नुकसान वैध रूप से वसूल किया जा सकता है।

मामले में गंगा प्रसाद पहला गवाह था। वह द्वितीय श्रेणी का मेरठ कोतवाली में अफसर था। उसने बयान दिया कि मोहम्मद आमिर जोकि मालखाना का इंचार्ज था वह बिना इजाजत के तथा मालखाना की चाबी दिए बिना पाकिस्तान चला गया।माल खाना की जांच पड़ताल की गई तथा यह पाया गया कि काफी संपत्ति उसमें से गायब थी। गंगा प्रसाद ने चांदी के जेवरात अपिलांट को लौटा दिए। सोना उसमें नहीं था अतः वह नहीं लौटाया जा सका।गंगा प्रसाद में बयान दिया था कि मोहम्मद आमिर के विरुद्ध माल के दुरुपयोग की जांच की गई। पुलिस अधिकारी उसको पाकिस्तान से पकड़वाने में असमर्थ रहे अतः जांच बेकार रही।इस गवाह का कथन था कि जब्त किया गया माल उसके सामने संदूक में नहीं  रखा गया और ना ही माल की कोई लिस्ट ही बनाई गई।

रलिया राम को  अर्ध रात्रि में गिरफ्तार किया गया। पुलिस को यह शक था कि वह सोना व चांदी चोरी का है जो कि वह ले जा रहा था।पता उसकी गिरफ्तारी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 541 अंतर्गत उचित  थी।

धारा 550 के अंतर्गत पुलिस अफसर किसी चीज को छीन सकते हैं। यदि उनको शक हो जाए  कि वह चोरी की है। रलिया राम सोना चांदी ले जा रहा था वह पुलिस अधिकारियों ने चोरी का समझकर धारा 500 के अंतर्गत जब्त कर ली थी । गिरफ्तारी तथा उसका सामान छीनने के बाद धारा 61 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत  पुलिस अधिकारी उस की छानबीन कर सकते हैं।धारा 523 के अनुसार वह संपत्ति जो धारा 51 के अंतर्गत जब्त की जाती है उसका विवरण तुरंत मजिस्ट्रेट को भेजा जाता है। मजिस्ट्रेट उस संपत्ति के बाबत उचित आदेश पारित कर सकता है।वह संपत्ति वास्तविक स्वामी को प्रदान कर सकता है यदि उसका पता ना लगे तो वह पुलिस निगरानी में रखने का आदेश पारित कर सकता है। समस्त संपत्ति माल खाना मोहरिर्र के कब्जे में रखी जाती थी जब तक की इसका निस्तारण हो जाए।वह सोना चांदी जो रलिया राम से जप्त किया गया था वह अलग से बक्से में ताला लगा कर रखा जाता है और उसके ताली  ट्रेजरी में रखी जाती है। इस केस में इस प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई।

राज्य में दो प्रकार के कर्मचारी होते हैं- एक तो वे जिन्हें राज्य की प्रभुसत्ता सौंपी जाती है। जैसे पुलिस अधिकारी और दूसरे वे जिन्हें सत्ता नहीं सौंपी जाती है। वे दूसरे प्रकार के कर्मचारी उसी प्रकार के होते हैं जैसे कि निजी मालिकों के कर्मचारी होते हैं। और यदि वे अपनी नौकरी के दौरान कोई दुषकृति करते हैं तो उनके लिए स्वामी के रूप में राज्य जिम्मेदार होता है।दूसरी और पहले प्रकार के कर्मचारी यदि अपनी नौकरी द्वारा प्रभुसत्ता द्वारा को सौंपी जाए वैधानिक कार्य करते हैं उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए राज्य दुस्कृती विधि के अंतर्गत जिम्मेदार नहीं होगा।इस केस में पुलिस अधिकारी ने तलाशी, जब्ती, गिरफ्तारी आदि के जो कार्य किए हैं वे कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रयोग में अपनी नौकरी के दौरान किए गए हैं अतः उनके प्रमाद नेगलिजेंस के सिद्ध हो जाने पर भी उनके लिए राज्य जिम्मेदार नहीं होगा।

मामले में न्यायिक फैसला जो भी रहा हो हम उस ओर अधिक नहीं जाना चाहते हैं। इस मामले से हमें सर्वप्रथम तो इस तथ्य का भी पता चलता है कि उस समय हमारा देश कितना अधिक समृद्ध था। लोगों के पास कितना अधिक सोना चांदी और बहुमूल्य जवाहरात होते थे। हमारे पास सोने चांदी के कितने अधिक बेशकीमती भंडार थे। नई पीढ़ी के लिए यह सब जानना बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भारत देश में न्यायिक व्यवस्था के प्रति हमेशा सबका पूर्ण भरोसा रहा है।  सब को विश्वास है कि भले देर हो जाए लेकिन यहां न्याय जरूर मिलेगा। हमने यहां जिस केस का जिक्र किया है वह law के students के पाठ्यक्रम में भी शामिल है। Leading case में अक्सर इसके सवाल पूछे जाते हैं। हम ने इस मामले से जुड़े दूसरे पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की है। इस मामले से हमें ये भी पता चलता है कि भारत देश में स्वाधीनता के समय व्यापार की प्रकृति कैसी थी ? व्यापारी सोने और चांदी जैसी बहुमूल्य चीजों का भी व्यापार किस तरह से करते थे ? उस समय सोने और चांदी जैसी चीजों की भी दुकाने संभवत कहीं भी सजाई जाती थी और उसे बेचा जाता था। परिवहन के साधनों के अभाव की वजह से सोने और चांदी जैसी चीजों को भी कहीं भी मामूली तरीके से ही लाया ले जाया जाता था।

इस मामले में एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि पुलिस के मालखाने से बहुमूल्य सोना चोरी चला गया। जिस पर आरोप लगा वह भी पुलिस का ही कर्मचारी था लेकिन वहां सामान लेकर दूसरे देश चला गया और उसे पकड़ा नहीं जा सका। आजादी के बाद जो बंटवारा हुआ उसने देश को बड़ा दर्द दिया है जिसे भूलाया नहीं जा सकता।उस दौरान देश की बहुमूल्य चीजों की लूट, हत्या, बलात्कार की अनेकानेक घटनाएं हुई। ऐसी घटनाओं की याद हमें हमेशा सालती रहेगी।

                                           जय भारत।।