कोरोना के साथ Black fungus से भी मच सकता है हाहाकार, इस से बचने मधुमेह को नियंत्रित करें, स्टेरॉयड का विवेकपूर्ण तरीके से उपयोग करें, स्वच्छता बनाए रखने की जरूरत, अपने आप दवा न लें

 0 स्वास्थ्य के मामले में लोगों को और सावधानी बढ़ाने की जरूरत

0 कोविड-19 मरीजों में पाए जा रहे फंगल संक्रमण - म्यूकोर्मिकोसिस से सुरक्षित रहने विशेष ध्यान देने की जरूरत 

0 खतरनाक बात, covid 19 से ठीक हो जाने मरीजों मे फैल रहा है इसका संक्रमण
0 स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने की जरूरत
0 कोविड-19 रोगियों के उपचार के दौरान या बाद मेंबंद नाक के मामलों को काफी गंभीरता से लेना चाहिए
नई दिल्ली छत्तीसगढ़। असल बात न्यूज़।
0 चिंतन/ विश्लेषण/ जिंदगी बचाने के लिए
0 अशोक त्रिपाठी
देश में अभी fungus से पैदा होने वाली बीमारी आम लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। इसका खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा है कि इस खतरनाक बीमारी से अत्यंत सावधान रहने की जरूरत है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों को आशंका है कि म्यूकोर्मिकोसिस  या ब्लैक फंगस, फंगल संक्रमण से पैदा होने और पहले वाली यह बीमारी कोरोना से भी अधिक घातक साबित हो सकती है। महाराष्ट्र में इसके संक्रमण से अभी तक 2000 लोगों के संक्रमित हो जाने की जानकारी मिली है और लगभग 10 लोगों ने इसकी चपेट में आकर दम तोड़ दिया है। इसकी चपेट में आने के बाद मरीजों की आंखों की रोशनी चली जा रही है।शरीर पर किसी तरह की चोट, जलने, कटने आदि के जरिए यह त्वचा में इसका संक्रमण प्रवेश करता है और त्वचा में विकसित हो सकता है।स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा कि जिसे भी मधुमेह है और जिसकी प्रतिरक्षा प्रणाली ठीक से काम नहीं कर रही है, उसे इसे लेकर सावधान रहने की जरूरत है। ध्यान देने वाली बात है कि  कोविड-19 के मरीजों के उपचार में डेक्सामेथासोन जैसी दवाओं का सेवन शामिल है, जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया पर असर डालता है और कहा जा रहा है कि इसके सेवन के बाद black fungus से ग्रसित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके इलाज में सर्जरी करने तक की नौबत आ जाती है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों में भी कोरोना से संक्रमित मरीजों मे इसके संक्रमण के फैलने की खबरें आ रही हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य में कोरोना से अभी भी चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है। कोरोना के संक्रमण की चपेट में आकर लोगों की मौत थम नहीं  रही हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण के फैलाव को रोकने, नियंत्रित करने राज्य के कई जिलों में अभी भी लाक डाउन जारी है, कई जिलों में यह लाक डाउन पिछले 1 महीने से चल रहा है। तो दूसरी तरफ ब्लैक फंगस के संक्रमण से भी मौत होने की खबरें जगह-जगह से आ रही है। ऐसे में अब जब हम खुद को कोविड-19 से बचाने और उससे लड़ने की पूरी कोशिश कर रहे हैं,फंगस से पैदा होने वाला एक और खतरा सामने आया है जिसके बारे में हमें जानना चाहिए एवं उस पर कार्रवाई करनी चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हम लोगों ने ध्यान नहीं दिया तो कोरना का जिस तरह से तेज गति से  फैलाव हुआ है वैसे ही ब्लैक फंगस का भी फैलाव हो सकता है। म्यूकोर्मिकोसिस, एक फंगल संक्रमण है जोकुछ कोविड-19 मरीजों में बीमारी से ठीक होने के दौरान या बाद में पाया जा रहा है। दो दिन पहले महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री द्वारा दिए गए एक बयान के अनुसार, राज्य में इस फंगल संक्रमण से पहले ही 2000 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं; 10 लोगों ने तो इसकी चपेट में आकर दम भी तोड़ दिया। कुछ मरीजों की आंखों की रोशनी भी चली गई। ब्लड प्रेशर शुगर वाले covid मरीजों के लिए यह संक्रमण और जानलेवा घातक साबित हो रहा है। 

म्यूकोर्मिकोसिस कैसे होता है?

म्यूकोर्मिकोसिस या ब्लैक फंगस, फंगल संक्रमण से पैदा होने वाली जटिलता है। लोग वातावरण में मौजूदफंगस के बीजाणुओं के संपर्क में आने से म्यूकोर्मिकोसिस की चपेट में आते हैं। शरीर पर किसी तरह की चोट, जलने, कटने आदि के जरिए यह त्वचा में प्रवेश करता है और त्वचा में विकसित हो सकता है।

कोविड-19 से उबर चुके हैं या ठीक हो रहे मरीजों में इस बीमारी के होने का पता चल रहा है। इसके अलावा, जिसे भी मधुमेह है और जिसकी प्रतिरक्षा प्रणाली ठीक से काम नहीं कर रही है, उसे इसे लेकर सावधान रहने की जरूरत है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा जारी किए गए एक परामर्श के अनुसार, कोविड-19 रोगियों में निम्नलिखित दशाओं से म्यूकोर्मिकोसिस संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है:

  1. अनियंत्रित मधुमेह
  2. स्टेरॉयड के उपयोग के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली का कमजोर होना
  3. लंबे समय तक आईसीयू/अस्पताल में रहना
  4. सह-रुग्णता/अंग प्रत्यारोपण के बाद/कैंसर
  5. वोरिकोनाजोल थेरेपी (गंभीर फंगल संक्रमण का इलाज करने के लिए इस्तेमाल की जाती है)

इसका कोविड-19 से क्या संबंध है?

यह बीमारी म्यूकोर्मिसेट्स नामक सूक्ष्म जीवों के एक समूह के कारण होती है, जो पर्यावरण में प्राकृतिक रूप से मौजूद होते हैं, और ज्यादातर मिट्टी में तथा पत्तियों, खाद एवं ढेरों जैसे कार्बनिक पदार्थों के क्षय में पाए जाते हैं।

सामान्य तौर पर, हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली ऐसे फंगल संक्रमण से सफलतापूर्वक लड़ती है लेकिनहम जानते हैं कि कोविड-19 हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करता है। इसके अलावा, कोविड-19 मरीजों के उपचार में डेक्सामेथासोन जैसी दवाओं का सेवन शामिल है, जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया पर असर डालता है। इन कारकों के कारण कोविड-19 मरीजों को म्यूकोर्मिसेट्स जैसे सूक्ष्म जीवों के हमले के खिलाफ लड़ाई में विफल होने के नए खतरे का सामना करना पड़ता है।

इसके अलावा, आईसीयू में ह्यूमिडिफायर का उपयोग किया जाता है, वहां ऑक्सीजन थेरेपी ले रहे कोविड मरीजों को नमी के संपर्क में आने के कारण फंगल संक्रमण का खतरा होता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर कोविड मरीज म्यूकोर्मिकोसिस से संक्रमित हो जाएगा। जिन मरीजों को मधुमेह नहीं है, उन्हें यह बीमारी होना असामान्य है लेकिन अगर तुरंत इलाज न किया जाए तो यह घातक हो सकता है। ठीक होने की संभावना बीमारी के जल्दी पता चलने और उपचार पर निर्भर करती है।

सामान्य लक्षण क्या हैं?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसके बारे में बताया है कि हमारे माथे, नाक, गाल की हड्डियों के पीछे और आंखों एवं दांतों के बीच स्थित एयर पॉकेट में त्वचा के संक्रमण के रूप में म्यूकोर्मिकोसिस दिखने लगता है। यह फिर आंखों, फेफड़ों में फैल जाता है और मस्तिष्क तक भी फैल सकता है। इससे नाक पर कालापन या रंग मलिन पड़ना, धुंधली या दोहरी दृष्टि, सीने में दर्द, सांस लेने में कठिनाई और खून की खांसी होती है।

आईसीएमआर ने सलाह दी है कि बंद नाक के सभी मामलों को बैक्टीरियल साइनसिसिस के मामलों के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, खासकर कोविड-19 रोगियों के उपचार के दौरान या बाद मेंबंद नाक के मामलों को लेकर ऐसा नहीं करना चाहिए। फंगल संक्रमण का पता लगाने के लिए चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।

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इसका इलाज कैसे किया जाता है?

जहां संक्रमण सिर्फ एक त्वचा संक्रमण से शुरू हो सकता है, यह शरीर के अन्य भागों में फैल सकता है। उपचार में सभी मृत और संक्रमित ऊतक को हटाने के लिए की जाने वाली सर्जरी शामिल है। कुछ रोगियों में, इससे ऊपरी जबड़े या कभी-कभी आंख की भी हानि हो सकती है। इलाज में अंतःशिरा एंटी-फंगल थेरेपी का चार से छह सप्ताह का कोर्स भी शामिल हो सकता है। चूंकि यह शरीर के विभिन्न हिस्सों को प्रभावित करता है, इसलिए इलाज करने के लिए सूक्ष्म जीवविज्ञानी, आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञों, न्यूरोलॉजिस्ट, ईएनटी विशेषज्ञ, नेत्र रोग विशेषज्ञ, दंत चिकित्सक, सर्जन और अन्य की एक टीम की आवश्यकता होती है।


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